गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

लम्बी सदी बीत रही है...

लम्बी सदी बीत रही है...

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सीली-सीली पत्तियाँ
सुलग रही है
जैसे दर्द की एक लम्बी सदी
धीरे-धीरे
गुज़र रही है,
तपन जेठ की
झुलसाती गर्म हवाएँ
फिर भी पत्तियाँ सील गईं
ज़िन्दगी भी ऐसे ही सील गई,
धीरे-धीरे सुलगते-सुलगते
ज़िन्दगी
अब राख बन रही है
दर्द की एक लम्बी सदी
जैसे बीत रही है|

_ जेन्नी शबनम (अप्रैल 27, 2011)

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