गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

236. लम्बी सदी बीत रही है...

लम्बी सदी बीत रही है...

*******

सीली-सीली-सी पत्तियाँ
सुलग रही हैं
जैसे दर्द की एक लम्बी सदी
धीरे-धीरे गुज़र रही है,
तपन जेठ की
झुलसाती गर्म हवाएँ
फिर भी पत्तियाँ सील गईं
ज़िन्दगी भी ऐसे ही सील गई,
धीरे-धीरे सुलगते-सुलगते
ज़िन्दगी अब राख बन रही है
दर्द की एक लम्बी सदी
जैसे बीत रही है !

_ जेन्नी शबनम (अप्रैल 27, 2011)

_________________________________