शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

265. मैं भी इंसान हूँ...

मैं भी इंसान हूँ...

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मैं, एक शब्द नही
एहसास हूँ, अरमान हूँ
साँसे भरती हाड़-मांस की
मैं भी जीवित इंसान हूँ ।  

दर्द में आँसू निकलते हैं
काटो तो रक्त बहता है
ठोकर लगे तो पीड़ा होती है
दगा मिले तो दिल तड़पता है । 

कुछ बंधन बन गए
कुछ चारदीवारी बन गई
पर ख़ुद में, मैं अब भी जी रही । 

कई चेहरे ओढ़ लिए, कुछ दुनिया पहन ली
पर कुछ बचपन ले, मैं आज भी जी रही । 
मेरे सपने, आज भी मचलते हैं
मेरे ज़ज्बात, मुझसे अब, रिहाई माँगते हैं । 

कब, कहाँ, कैसे-से कुछ प्रश्न
यूँ ही पनपते हैं, और ये प्रश्न
मेरी ज़िन्दगी उलझाते हैं । 

हाँ, मैं सिर्फ एक शब्द नहीं
साँसे भरती हाड़-मांस की
मैं भी जीवित इंसान हूँ ।   

- जेन्नी शबनम (22. 1. 2009)

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