Friday, July 15, 2011

मैं इंसान हूँ...

मैं इंसान हूँ...

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मैं, एक शब्द नही
एहसास हूँ
अरमान हूँ
साँसे भरती हाड़-मांस की
जीवित इंसान हूँ ।  

दर्द में आँसू निकलते हैं
काटो तो रक्त बहता है
ठोकर लगे तो पीड़ा होती है
दगा मिले तो दिल तड़पता है । 

कुछ बंधन बन गए
कुछ चारदीवारी बन गई
पर ख़ुद में
मैं अब भी जी रही । 

कई चेहरे ओढ़ लिए
कुछ दुनिया पहन ली
पर कुछ बचपन ले
मैं आज भी जी रही । 

मेरे सपने
आज भी मचलते हैं
मेरे ज़ज्बात
मुझसे अब
रिहाई माँगते हैं । 

कब, कहाँ, कैसे से कुछ प्रश्न
यूँ हीं पनपते हैं
और ये प्रश्न
मेरी ज़िन्दगी उलझाते हैं । 

हाँ, मैं
सिर्फ एक शब्द नहीं
एहसास हूँ
अरमान हूँ
साँसे भरती हाड़-मांस की
जीवित इंसान हूँ । 

- जेन्नी शबनम (जनवरी 22, 2009)
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