शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

273. फिर से मात...

फिर से मात...

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बेअख्तियार-सी हैं करवटें, बहुत भारी है आज की रात,
कह दिया यूँ तल्ख़ी से उसने, तन्हाई है ज़िन्दगी की बात !

साथ रहने की वो गुज़ारिश, बन चली आँखों में बरसात,
ख़त्म होने को है जिंदगानी, पर ख़त्म नहीं होते जज़्बात !

सपने पलते रहे आसमान के, छूटी ज़मीन बने ऐसे हालात,
वक़्त से करते रहे थे शिकवा, वक़्त ही था बैठा लगाए घात !

शिद्दत से जिसे चाहा था कभी, मिले हैं ऐसे कुछ लम्हे सौगात.
अभी जाओ ओ समंदर के थपेड़ों, आना कभी फिर होगी मुलाक़ात !

दोराहे पर है ठिठकी ज़िन्दगी, कदम-कदम पर खड़ा आघात.
देखो सब हँस पड़े किस्मत पर, 'शब' ने खाई है फिर से मात !

- जेन्नी शबनम (11. 8. 2011 )

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