मंगलवार, 31 मार्च 2009

47. बीती यादें...

बीती यादें...

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याद आता है वो लम्हा बार-बार
जब तुमने
अपने दिल की बात कही थी

मैंने तुम्हें सिर्फ देखा
उत्तर न तो 'ना' था
न ही कोई बोल फूटा था

तुम मौन की भाषा समझ गए
मौन स्वीकृति का प्रतीक है
यह तुम भी जान गए थे

निर्विरोध मौन गूँजता रहा
तुम सही थे
इसे मैंने भी समझा था

और हमारे बीच
वो विचित्र बंधन बँध गया
जो देव-दुर्लभ दिव्य अनुभूति बन
सदा के लिए हमारे मन-प्राण को
सिक्त कर गया । 

- जेन्नी शबनम (दिसंबर 2007)

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46. चुनाव... नेता...

चुनाव... नेता...

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राजनीति का दामन थामे, चलते कूटनीति की चाल
बड़ा कठिन है समझना इनको, चलते ऐसी-ऐसी चाल । 

पूरे औरत-मर्द और आधे औरत-मर्द से अलग
एक नई बनी आदमी की जात,
हो जिनको दाँव-पेंच में महारत हासिल
ये हैं वो राजनीति के पंडित जात । 

सिंहासन के पीछे-पीछे, नेता जी ऐसे भागते बदहवास
जैसे लाल कपड़ों के पीछे, सरपट भागे भड़का साँड़,
मज़हब-मज़हब, देश-देश का खेलते घृणित खेल
जैसे भूखे शेर और मेमनों के बीच होता खूंखार खेल । 

हँसुआ से गेहूँ की बाली काटे, एक अकेला बेचारा हाथ
अपने कीचड़ से गँदले होते, सारे कमल एक साथ,
करो सवारी साइकिल पर, या हाथी पर हो सवार
लालटेन युग में आ पहुँचे, अब कैसे कटे सबकी रात । 

हर पाँचवें वर्ष का है ये महोत्सव, बोली लगती जनता की
बिल में से निकल-निकल नेता जी, अब हाथ जोड़ते जनता की । 
अब चाहे जो झपट ले गद्दी, बचेगी न मुल्क की आन
हर चिह्न आजमा के हारी, अब तो इससे भली लगती, वही अंग्रेजी राज । 

- जेन्नी शबनम (2005)

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सोमवार, 30 मार्च 2009

45. कामना...

कामना...

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चाहती हूँ तुम देखो ज़िन्दगी
मेरी नज़रों से
मेरी चाहतों से
मेरी समस्त कामनाओं से 

समझ सकोगे तुम कैसे ?
तुम पुरुष हो
ख़ुदा हुए भी तो क्या
तुम बेबस हो 

तुम्हें वो आँखें न मिली
जो मेरे सपनों को देख सके
वो दिल न पाया
जो मेरे एहसासों को समझ सके 

तुम लाचार हो
मन से अपाहिज हो,
नहीं सँभाल सकते
एक औरत की कामना 

- जेन्नी शबनम (दिसंबर 2008)

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शुक्रवार, 27 मार्च 2009

44. हँसी, ख़ुशी और ज़िन्दगी बेकार है पड़ी...

हँसी, ख़ुशी और ज़िन्दगी बेकार है पड़ी...

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हँसी बेकार पड़ी है, यूँ ही कोने में कहीं
ख़ुशी ग़मगीन रखी है, ज़ीने में कहीं
ज़िन्दगी गुमसुम खड़ी है, अँगने में कहीं,
अपने इस्तेमाल की आस लगाए
ठिठके सहमे से हैं सभी 

सब कहते
सच ही कहते
कंजूस हैं हम, कायर हैं हम
सहेज सँभाल रखते, ख़र्च नहीं करते हम
अपनी हँसी, ख़ुशी और ज़िन्दगी 

हमने सोचा था
जब ज़रूरत हो, इस्तेमाल कर लेंगे
वरना सँभाल रखेंगे, जन्म-जन्मान्तर तक
कहीं ख़र्च न हो जाए, फ़िजूल ये सभी 

आज ज़रूरत पड़ी
चाहा कि सब उठा लाएँ
डूब जाएँ उसमें
ख़ूब जी जाएँ 

पर ये क्या हुआ ?
हँसी रूठ गई, ख़ुशी डर गई
ज़िन्दगी मुरझा गई,
सब बेकाम हो गई
बेइस्तेमाल स्वतः नष्ट हो गई 

सचमुच, हम कायर हैं, कंजूस हैं
यूँ ही पड़े-पड़े बर्बाद हो गई
हमारी हँसी, ख़ुशी और ज़िन्दगी 

अब जाना
संरक्षित नहीं होती
न ही सदियाँ ठहरती हैं
हँसी, ख़ुशी और ज़िन्दगी 
सहेजते, सँभालते और सँजोते
सब विदा हो रही !

जब वक़्त था तो जिया नहीं
अब चाहा तो कुछ बचा नहीं,
हँसी, ख़ुशी और ज़िन्दगी
यूँ ही बेकार, अब है पड़ी 

- जेन्नी शबनम (जून 2006)

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बुधवार, 25 मार्च 2009

43. अपंगता...

अपंगता...

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एक अपंगता होती तन की
जिसे मिलती, बहुत करुणा, जग की 
एक अपंगता होती मन की
जिसे नहीं मिलती संवेदना, जग की 

तन की व्यथा दुनिया जाने
मन की व्यथा कौन पहचाने ?
तन की दुर्बलता का, है समाधान
विकल्प भी हैं मौज़ूद हज़ार,
मन की दुर्बलता का, नहीं कोई विकल्प
बस एक समाधान...
प्यार, प्यार और प्यार !

- जेन्नी शबनम (अक्टूबर, 2006)

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मंगलवार, 24 मार्च 2009

42. दुआ...

दुआ...

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कोई शख्स ज़ख्म देता
कुरेद कर नासूर बनाता,
फिर कहता -
या अल्लाह !
उसे ज़न्नत बख्श दो !
क्या कहूँ उसे
अज़ीज़ या रक़ीब ?
जिसे जहन्नुम भी जन्नत-सा लगे,
क्या कहूँ उस ज़ालिम को ?
जिसे गैरों के दर्द में आराम मिले 
जाने ये कौन सी दुआ है ?
जो दोज़ख की आग में झोंकती है
और कहती कि
जाओ जन्नत पाओ
सुकून पाओ !

- जेन्नी शबनम (मार्च 23, 2009)

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सोमवार, 23 मार्च 2009

41. यकीन...

यकीन...

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चाहती हूँ, यकीन कर लूँ
तुम पर, और अपने आप पर,
ख़ुदा की गवाही का भ्रम
और तुमसे बाबस्ता
मेरी ज़िन्दगी
दोनों ही तकदीर है 
हँसूँ या रोऊँ
कैसे समझाऊँ दिल को ?
एक कशमकश-सी है ज़िन्दगी
एक प्रश्नचिह्न-सा है जीवन 
हर लम्हा
सारे ज़ज्बात
कैदी हैं,
ज़ंजीरें टूट गईं
पर आज़ादी कहाँ ?
कैसे यकीन करूँ
खुद पर
और तुम पर,
तुम भी सच हो
और ज़िन्दगी भी 

- जेन्नी शबनम (मार्च 22, 2009)

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रविवार, 22 मार्च 2009

40. बुत और काया...

बुत और काया...

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ख़्यालों के बुत ने
अरमान के होंठों को चूम लिया,
काले लिबास-सी वो रात
तमन्नाओं की रौशनी में नहा गई 

बुत की रूह और काया
पल भर को साथ मिले,
आँखों में शरारत हुई
हाथों से हाथ मिले,
प्रेम की अगन जली
क़यामत-सी बात हुई,
फिर मिलने के वादे हुए
याद रखने के इरादे हुए 

बिछुड़ने का वक़्त जब आया
दोनों के हाथ दुआ को उठे,
चेहरे पे उदासी छाई
आँखों में नमी पिघली,
दर्द मुस्कान बन उभरा
चुप-सी रात ज़रा-सी ठिठकी,
एक दूसरे के सीने में छुप
वे आँसू छुपाए गम भुलाए 

फिर बुत के अरमान
उसकी अपनी रूह
बुत की काया में समा गई,
फिर कभी न मिलने के लिए 

- जेन्नी शबनम (मार्च 21, 2009)

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39. अवैध सम्बन्ध...

अवैध सम्बन्ध...

[वर्षों पूर्व इसे लिखा था, आज साझा कर रही हूँ । कानून और समाज में वैधता-अवैधता की परिभाषा चाहे जो भी हो, मेरी नज़र में हम सभी ख़ुद में एक अवैध रिश्ता जीते हैं, क्योंकि मन के ख़िलाफ़ जीना सबसे बड़ी अवैधता है, और हम सभी किसी न किसी रूप में ऐसे जीने को विवश हैं ।] 

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मेरी आत्मा और मेरा वज़ूद
दो स्वतंत्र अस्तित्व है
और शायद दोनों में अवैध सम्बन्ध है 
नहीं, शायद मेरा ही मुझसे अवैध सम्बन्ध है 

मेरी आत्मा मेरे वज़ूद को
सहन नहीं कर पाती
और मेरा वज़ूद सदैव
मेरी आत्मा का तिरस्कार करता है 

दो विपरीत अस्तित्व एक साथ मुझमें बस गए
आत्मा और वज़ूद के झगड़े में उलझ गए,
एक साथ दोनों जीवन जी रही
आत्मा और वज़ूद को एक साथ ढ़ो रही 

मेरा मैं
न तो पूर्णतः आत्मा को प्राप्त है
न ही वज़ूद का एकाधिकार है
और बस यही मेरा मुझसे अवैध सम्बन्ध है 

एक द्वंद्व, एक समझौता
जीवन जीने का अथक प्रयास,
कानून-समाज की नज़र में
यही तो वैध सम्बन्ध है 

दो वैध रिश्तों का
कैसा ये अवैध सम्बन्ध है ?
स्वयं मेरी नज़र में
मेरा मुझसे अवैध सम्बन्ध है 

- जेन्नी शबनम (नवम्बर, 1992)

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गुरुवार, 19 मार्च 2009

38. हम अब भी जीते हैं

हम अब भी जीते हैं

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इश्क की हद, पूछते हैं आप, बारहा हमसे
क्या पता, हम तो हर सरहदों के पार, जीते हैं । 

इश्क की रस्म से अनजान, आप भी तो नहीं
क्या कहें, हम कहाँ कभी ख्वाबों में, जीते हैं । 

इश्क की इन्तेहा, देख लीजिए आप भी
क्या हुआ गर, जो हम फिर भी, जीते हैं । 

इश्क में मिट जाने का, अब और क्या अंदाज़ हो
क्या ये कम नहीं, कि हम, अब भी जीते हैं । 

- जेन्नी शबनम (मार्च 19, 2009)

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37. ख़ुद को बचा लाई हूँ (क्षणिका)

ख़ुद को बचा लाई हूँ (क्षणिका)

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कुछ टुकड़े हैं, अतीत के
रेहन रख आई हूँ
ख़ुद को, बचा लाई हूँ । 

साबुत माँगते हो, मुझसे मुझको
लो, सँभाल लो अब
ख़ुद को, जितना बचा पाई हूँ । 

- जेन्नी शबनम (मार्च 18, 2009)

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रविवार, 8 मार्च 2009

36. एक गीत तुम गाओ न...

एक गीत तुम गाओ न...

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एक गीत तुम गाओ न
एक ऐसा गीत गाओ कि -

मेरे पाँव उठ चल पड़े, घायल पड़े हैं कब से
हाथों में ताकत आ जाए, छीन लिए गए हैं बल से
पंख फिर उग जाए, क़तर दिए गए हैं छल से
सपनों को ज़मीं मिल जाए, उजाड़े गए हैं सदियों से
आत्मा जी जाए, मारी गई है युगों से । 

तुम ऐसा गीत गाओगे न ?
एक ऐसा गीत ज़रूर गाना !

मैं रहूँ न रहूँ
पर तुम्हारे गीत से जब भी कोई जी उठे -

मैं उसके मन में जन्मूँगी
तुम्हारे गीत गुनगुनाऊँगी
स्वछंद आकाश में उडूँगी
प्रेम का जहां बसाऊँगी
युगों से बेजान थी, सदियों तक जीऊँगी । 

तुम गाओगे न ऐसा एक गीत ?
मेरे लिए गा दो न एक गीत ! 

- जेन्नी शबनम (मार्च 8, 2009)
(महिला दिवस पर)

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35. कल रात...

कल रात...

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कल तमाम रात
मैंने तुमसे बातें की थी । 

तुम सुनो कि न सुनो, ये मैंने सोचा नहीं
तुम जवाब न दोगे, ये भी मैंने सोचा नहीं,
तुम मेरे पास न थे, तुम मेरे साथ तो थे । 

कल हमारे साथ, रात भी जागी थी
वक़्त भी जागा, और रूह भी जागी थी,
कल तमाम रात, मैंने तुमसे बातें की थी । 

कितना खुशगवार मौसम था
रात की स्याह चादर में
चाँदनी लिपट आई थी
और तारे खिल गए थे । 

हमारी रूहों के बीच
ख़्यालों का काफ़िला था
सवालों जवाबों की, लम्बी फ़ेहरिस्त थी
चाहतों की, लम्बी कतार थी । 

तुम्हारे शब्द ख़ामोश थे
तुम सुन रहे थे न
जो मैंने तुमसे कहा था !

कल तमाम रात
मैंने तुमसे बातें की थी । 

तुम्हें हो कि न हो याद
पर, मेरे तसव्वुर में बस गई
कल की हमारी हर बात
कल की हमारी रात । 

कल तमाम रात
मैंने तुमसे बातें की थी । 

- जेन्नी शबनम (मार्च 1, 2009)

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34. कुछ पता नहीं...

कुछ पता नहीं...

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बेइंतेहा जीने के जुनून में
ज़िन्दगी कब कहाँ छूट गई
कुछ होश नहीं । 

कारवाँ आता रहा, जाता रहा
कोई अपना, कब बिछुड़ा
कुछ ख़बर नहीं । 

न मेरी ज़िद की बात थी, न तुम्हारी ज़िद की
ज़िन्दगी कब, ज़िल्लत बन गई
कुछ समझ नहीं । 

सागर के दो किनारों की तरह
ज़िन्दगी बँट गई
रोक सकूँ, दम नहीं । 

तूफ़ानों की गर्द
हमारे दिलों में, कब बस गई
हमें एहसास भी नहीं । 

हम भटक गए, कब, क्यों, भटक गए
कोई अंदाजा नहीं
कुछ पता नहीं । 

ज़िन्दगी रूठ गई, बस रूठ गई
दर्द है, शिकवा है, खुद से है
कुछ तुमसे नहीं । 

तुम्हें हो कि न हो, मुझे है
गिला है, शिकायत है,
क्या तुम्हें कुछ नहीं ?

- जेन्नी शबनम (मार्च 7, 2009)

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शुक्रवार, 6 मार्च 2009

33. खुशनसीबी की हँसी (क्षणिका)

खुशनसीबी की हँसी (क्षणिका)

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चोट जब दिल पर लगती है
एक आह-सी, उठती है
एक चिंगारी, दहकती है
चुपके से, दिल रोता है
और एक हँसी गूँजती है । 

सब पूछते - बहुत खुश हो, क्यों ?
मैं कहती - ये खुशनसीबी की हँसी है
और चुपचाप एक आँसू
दिल में उतरता है ।  

- जेन्नी शबनम (नवम्बर 1995)

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रविवार, 1 मार्च 2009

32. अपनी हर बात कही

अपनी हर बात कही

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समेट ख़ुद को सीने में उसके, अपने सारे हालात कही
तर कर उसका सीना, अपना मन, अपनी हर बात कही । 

शाया किया अपने सुख-दुःख, उसके ईमान पर
पढ़ ले मेरा हर ग़म, बिना शब्द, अपनी हर बात कही । 

आस भरी नज़रें उठीं जब, उसकी बाहें थामने को
थी तन्हा, अपने सीने से लिपटी, ख़ुद से ही थी अपनी हर बात कही । 

अच्छा है कोई न जाना, ये मेरा अपना संसार है
आस-पास नहीं कहीं कोई, ख़ुद से ही अपनी हर बात कही । 

बिन सरोकार सुने क्यों कोई, बस एक उम्र की ही तो बात नहीं
जवाब से परे हर सवाल है, फिर भी अपनी हर बात कही । 

जन्मों का हिसाब है करना, जाने क्या-क्या और है कहना
रोज़ लिपटती, रोज़ सुबकती, रोज़ ख़ुद से ही अपनी हर बात कही । 

- जेन्नी शबनम (सितम्बर 17, 2008)

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