बुधवार, 29 दिसंबर 2010

198. एक टुकड़ा पल...

एक टुकड़ा पल...

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उस मुलाक़ात में
तुम दे गए
अपने वक़्त का एक टुकड़ा
और ले गए
मेरे वक़्त का एक टुकड़ा !

तुम्हारा वो टुकड़ा
मुझमें 'मैं' बनकर
समाहित हो गया
जो हर पहर मुझे
छुपाये रखता है
अपने सीने में !

ज़रा देर को भी वो
मुझसे अलग हो तो
मैं रो देती हूँ,
एक वही है जो
जीना सिखाता है,
तुम तो जानते हो न ये
और वो सब भी
जो मैं अपने साथ करती हूँ
या जो मेरे साथ होता है !

पर तुम वो मेरा टुकड़ा
कहाँ छोड़ आए हो ?
जानती हूँ वो मूल्यवान नहीं
न ही तुमको इसकी ज़रूरत होगी,
पर मेरे जीवन का
सबसे अनमोल है
मेरे वक़्त का वो टुकड़ा !

याद है तुमको
वो वक़्त
जो हमने जिया
अंतिम निवाला जो तुमने
अपने हाथों से खिलाया था
और उस ऊँचे टीले से उतरने में
मैं बेख़ौफ़ तुम्हारा हाथ थाम
कूद गई थी !

आलिंगन की इजाज़त
न मैंने माँगी
न तुमने चाही,
हमारी साँसें और वक़्त
दोनो ही तेज़ी से दौड़ गए
और हम देखते रहे,
वो तुम्हारी गाड़ी की सीट पर
आलिंगनबद्ध मुस्कुरा रहे थे !

जानती हूँ
वो सब बन गया है
तुम्हारा अतीत,
पर इसे
विस्मृत न करना मीत,
मेरे वक़्त को साथ न रखो
पर दूर न करना
खुद से कभी,
जब मिलो किसी महफ़िल में
तब साथ उसे भी ले आना
वहीं होगा
तुम्हारा वक़्त मेरे साथ !

हमारे वक़्त के टुकड़े
गलबहियाँ किए वहीं होंगे,
मैं सिफ टुकुर-टुकुर देखूँगी
तुम भले न देखना,
पर वापसी में मेरे वक़्त को
ले जाना अपने साथ,
अगली मुलाक़ात के इंतज़ार में
मैं रहूँगी
तुम्हारे उसी
वक़्त के टुकड़े के साथ !

- जेन्नी शबनम (29. 12. 2010)

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