Tuesday, January 26, 2016

503. आज का सच...

आज का सच...

*******

थोप देते हो    
अपनी हर वो बात     
जो तुम चाहते हो कि मानी जाए   
बिना ना नुकुर  
बिना कोई बहस    
और यह भी चाहते हो कि सभी मान लें    
तुम हमेशा सही हो  
बिलकुल परफेक्ट   
तुम गलत हो ही नहीं सकते    
तुम्हारे सारे समीकरण   
सही हैं   
न भी हों तो कर दिए जाते हैं   
किसका मजाल जो तुम्हें गलत कह सके   
आख़िर  
मिल्कियत तुम्हारी  
हुकूमत तुम्हारी  
हर शै गुलाम  
पंचतत्व तुम्हारे अधीन   
हवा, पानी, मिट्टी, आग, आकाश   
सब तुम्हारी मुट्ठी में  
इतना भ्रम  
इतना अहंकार  
मन करता है   
तुम्हें तुम्हारा सच बताऊँ     
जान न भी बख्शो तो भी  
कह ही दूँ -  
जो है सब झूठ  
बस एक ही सच 
आज का सच  
''जिसकी लाठी उसकी भैंस !''    

- जेन्नी शबनम (26. 1. 2016)

_______________________________

Sunday, January 17, 2016

502. सब जानते हो तुम...

सब जानते हो तुम...

*******

तुम्हें याद है 
हर शाम क्षितिज पर   
जब एक गोल नारंगी फूल टँगे देखती  
रोज़ कहती -   
ला दो न   
और एक दिन तुम वाटर कलर से बड़े से कागज पे  
मुस्कुराता सूरज बना हाथों में थमा दिए,  
एक रोज़ तुमसे कहा - 
आसमान से चाँद-तारे तोड़ के ला दो 
प्रेम करने वाले तो कुछ भी करने का दावा करते हैं,  
और तुम  
आसमानी साड़ी खरीद कर लाये  
जिसमें छोटे-छोटे चाँद तारे टँके हुए थे 
मानो आसमान मेरे बदन पर उतर आया हो, 
और उस दिन तो मैंने हद कर दी   
तुमसे कहा - 
अभी के अभी आओ 
छुट्टी लो भले तनख्वाह कटे   
तुम गाड़ी चलाओगे मुझे जाना है   
कहीं दूर  
बस यूँ ही  
बेमकसद 
और एक छोटे से ढाबे पे रुक कर  
मिट्टी की प्याली में दो-दो कप चाय  
और एक-एक कर पाँच गुलाबजामुन चट कर डाली, 
कैसे घूर रहा था ढाबे का मालिक ! 
तुम भी गज़ब हो 
क्यों मान लेते हो मेरी हर ज़िद ? 
शायद पागल समझते हो न मुझे ? 
हाँ, पागल ही तो हूँ  
उस रोज़ नाराज़ हो गई  
और तुम्हें बता भी दिया कि क्यों नाराज़ हूँ  
तुम्हारी बेरुखी  
या किसी और के साथ तुम्हारा होना मुझे सहन नहीं, 
मुझे मनाना भी तो खूब आता है तुम्हें 
नकली सूरज हो या  
असली रँग  
सब जानते हो तुम !   

- जेन्नी शबनम (16. 1. 2016)

____________________________