Thursday, November 4, 2010

जागता सा कोई एक पहर ज़ारी है...

जागता सा कोई एक पहर ज़ारी है...

*******

रात बीती और तमन्ना जागने लगी, ये दहर ज़ारी है
क़यामत से कब हो सामना, सोच में वो क़हर ज़ारी है !

मुख़ातिब होते रहे हर रोज़ फिर भी, हँस न सके हम
ज़ख़्म घुला तड़पते रहे, फैलता बदन में ज़हर ज़ारी है !

शिकायत की उम्र बीती, अब सुनाने से क्या फायदा
जल जल कर दहकता है मन, ताव की लहर ज़ारी है !

उजाला चहुँ ओर पसरा, जाने आफ़ताब है या बिजली
रात या दिन पहचान नहीं हमें, जलता शहर ज़ारी है !

ख़ामोशी की जुबां न समझे जो, उससे क्या कहे ''शब''
शेष नहीं फिर भी, जागता सा कोई एक पहर ज़ारी है !

...............................
दहर - ज़िन्दगी/ संसार
...............................

__ जेन्नी शबनम __ ४. ११. २०१०

____________________________________________________