गुरुवार, 4 नवंबर 2010

186. जागता सा कोई एक पहर ज़ारी है

जागता सा कोई एक पहर ज़ारी है

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रात बीती और तमन्ना जागने लगी, ये दहर ज़ारी है
क़यामत से कब हो सामना, सोच में, वो क़हर ज़ारी है !

मुख़ातिब होते रहे, हर रोज़, फिर भी, हँस न सके हम
ज़ख़्म घुला तड़पते रहे, फैलता बदन में ज़हर ज़ारी है !

शिकायत की उम्र बीती, अब सुनाने से क्या फ़ायदा
जल-जल कर दहकता है मन, ताव की लहर ज़ारी है !

उजाला चहुँ ओर पसरा, जाने आफ़ताब है या बिजली
रात या दिन पहचान नहीं हमें, जलता शहर ज़ारी है !

ख़ामोशी की जुबां न समझे जो, उससे क्या कहे 'शब'
शेष नहीं फिर भी, जागता सा कोई एक पहर ज़ारी है !

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दहर - ज़िन्दगी / संसार
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- जेन्नी शबनम (4. 11. 2010)

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