गुरुवार, 13 अक्तूबर 2011

292. क़र्ज़ अदाएगी...

क़र्ज़ अदाएगी...

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तुमने कभी स्पष्ट कहा नहीं
शायद संकोच हो
या फिर
सवालों से घिर जाने का भय
जो मेरी बेदख़ली पर तुमसे किये जाएँगे -
जो इतनी नज़दीक
वो ग़ैर कैसे ?
पर हर बार तुम्हारी बेरुखी
इशारा करती है कि
ख़ुद अपनी राह बदल लूँ
तुम्हारे लिए मुश्किल न बनूँ,
अगर कभी मिलूँ भी तो उस दोस्त की तरह
जिससे महज़ फ़र्ज़ अदायगी-सा वास्ता हो
या कोई ऐसी परिचित
जिससे सिर्फ दुआ सलाम का नाता हो !
जानती हूँ
दूर जाना ही होगा मुझे
क्योंकि यही मेरी क़र्ज़ अदायगी है,
थोड़े पल और कुछ सपने
उधार दिए थे तुमने
दान नहीं !

- जेन्नी शबनम ( अक्टूबर 10, 2011)

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