Tuesday, January 4, 2011

हर लम्हा सबने उसे

हर लम्हा सबने उसे

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मुद्दतों की तमन्नाओं को, मरते देखा
मानों आसमां से तारा कोई, गिरते देखा !

मिलती नहीं राह मुकम्मल, जिधर जाएँ
बेअदबी का इल्ज़ाम, ख़ुद को लुटते देखा !

हर इम्तहान से गुज़र गये, तो क्या हुआ
इबादत में झुका सिर, उसे भी कटते देखा !

इश्क की बाबत कहा, हर ख़ुदा के बन्दे ने
फिर क्यों हुए रुसवा, इश्क को मिटते देखा !

अपनों के खोने का दर्द, तन्हा दिल ही जाने है
रुखसत हो गए जो, अक्सर याद में रोते देखा !

मान लिया सबने, वो नामुराद ही है फिर भी
रूह सँभाले, उसे मर-मर कर बस जीते देखा !

'शब' की दर्द-ए-दास्तान, न पूछो मेरे मीत
हर लम्हा सबने उसे, बस यूँ ही हँसते देखा !

- जेन्नी शबनम (1. 1. 2011)

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