बुधवार, 13 मई 2020

663. अलविदा

अलविदा  

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तपती रेत पर  
पाँव के नहीं, जलते पाँव के ज़ख्म के निशान हैं  
मंजिल दूर, बहुत दूर दिख रही है  
पर पाँव थक चुके हैं, पाँव और मन जल चुके हैं  
हौसला देने वाला कोई नहीं  
साँसें सँभालने वाला कोई नहीं  
यह तय है ज़िन्दगी वहाँ तक नहीं पहुँचेगी  
जहाँ पाँव-पाँव चले थे, जहाँ सपनों को पंख लगे थे  
जहाँ से ज़िन्दगी को सींचने, बहुत दूर निकल पड़े थे  
आह! अब और सहन नहीं होता  
तलवे ही नहीं आँतें भी जल गई हैं  
जल की एक बूँद भी नहीं  
जिससे अंतिम क्षण में तालू तर हो सके  
उम्मीद की अंतिम तीली बुझने को है  
आखिरी साँस अब थमने को है  
सलाम उन सबको जिनके पाँव ने साथ दिया  
उन सपनों, उन अपनों, उन यादों को अलविदा। 

- जेन्नी शबनम (12. 5. 2020) 
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