शनिवार, 24 सितंबर 2011

286. ज़िन्दगी शिकवा करती नहीं

ज़िन्दगी शिकवा करती नहीं...

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चलते-चलते मैं चलती रही, ज़िन्दगी कभी ठहरी नहीं,
ख़ुद को जब रोक के देखा, ज़िन्दगी तो बढ़ी ही नहीं !

किस्मत को कैसा रोग लगा, ज़िन्दगी कभी हँसती नहीं,
वक़्त ने कैसा ज़ख़्म दिया, ज़िन्दगी शिकवा करती नहीं !

कई भ्रम पाले जीने के वास्ते, ज़िन्दगी भ्रम से गुजरती नहीं,
रोज़-रोज़ तड़पती है मगर, ज़िन्दगी मरना चाहती नहीं !

थक-थक गई चल-चल कर, ज़िन्दगी चलती पर बढ़ती नहीं,
दम टूट-टूट जाता है मगर, ज़िन्दगी हारती पर मरती नहीं !

क्यों न करूँ सवाल तुझसे ख़ुदा, ज़िन्दगी क्या सिर्फ मेरी नहीं?
'शब' मगरूर बेवफ़ा ही सही, ज़िन्दगी क्या सिर्फ उसकी नहीं?

- जेन्नी शबनम (सितम्बर 23 , 2011)

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