Saturday, September 24, 2011

ज़िन्दगी शिकवा करती नहीं...

ज़िन्दगी शिकवा करती नहीं...

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चलते चलते मैं चलती रही
ज़िन्दगी कभी ठहरी नहीं,
ख़ुद को जब रोक के देखा
ज़िन्दगी तो बढ़ी हीं नहीं !

किस्मत को कैसा रोग लगा
ज़िन्दगी कभी हँसती नहीं,
वक़्त ने कैसा ज़ख़्म दिया
ज़िन्दगी शिकवा करती नहीं !

कई भ्रम पाले जीने के वास्ते
ज़िन्दगी भ्रम से गुजरती नहीं,
रोज़ रोज़ तड़पती है मगर
ज़िन्दगी मरना चाहती नहीं !

थक थक गई चल चल कर
ज़िन्दगी चलती पर बढ़ती नहीं,
दम टूट टूट जाता है मगर
ज़िन्दगी हारती पर मरती नहीं !

क्यों न करूँ सवाल तुझसे ख़ुदा
ज़िन्दगी क्या सिर्फ मेरी नहीं?
'शब' मगरूर बेवफ़ा हीं सही
ज़िन्दगी क्या सिर्फ उसकी नहीं?

- जेन्नी शबनम (सितम्बर 23 , 2011)

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