Monday, February 14, 2011

ये सब इत्तेफ़ाक़ नहीं...

ये सब इत्तेफ़ाक़ नहीं...

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कई लम्हे जो चुपके से
मेरे हवाले किये तुमने
और कुछ पल चुरा लिए
ज़माने से हमने !
इतना जानती हूँ
ये सब इत्तेफ़ाक़ नहीं
तकदीर का कोई रहस्य है
जो समझ से परे है !
बेहतर भी है
कि न जानूं,
जानना भी नहीं चाहती
क्यों हुआ ये इत्तेफ़ाक़?
क्या है रहस्य?
किसी आशंका से
भयभीत हो
उन एहसासों को
खोना नहीं चाहती
जो तुमसे पायी हूँ !
जानती हूँ
कोई मंज़िल नहीं
न मिलनी है कभी मुझे,
फिर भी हर बार
एक नयी ख़्वाहिश
पाल लेती हूँ
और थोड़ा थोड़ा जी लेती हूँ !
जीवन के वो सभी पल
मुमकिन है
अब दोबारा न मिल पाए,
फिर भी
उम्मीद है
शायद...
एक बार फिर...!
अब बस
जीना चाहती हूँ
आँखें मूंद
उन पलों के साथ
जिनमें
तुम्हें न देख रही थी
न सुन रही थी
सिर्फ तुम्हें जी रही थी !

__ जेन्नी शबनम __ 14 . 2 . 2011

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