Saturday, June 25, 2011

बस धड़कनें चलेंगी...

बस धड़कनें चलेंगी...

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भला ऐसा भी होता है
न जीते बनता है
न कोई रास्ता मिलता है,
साथ चलते तो हैं
लेकिन
कुछ दूरी बनाए रहना होता है,
मन में बहुत कुछ
अनबोला रहता है
बहुत कुछ अनजीया रहता है,
मन तो चाहता है
सब कह दें
जो जी चाहता
सब कर लें,
कई शर्तें भी साथ होती हैं
जिन्हें मानना अपरिहार्य है
न मानो तो
अनर्थ हो जाए
ऐसा भी हो सकता है,
संसार के दांव पेंच
मन बहुत घबराता है,
बेहतर है
अपने कुआँ के मेढ़क रहो
या अपने चारों तरफ
काँटों के बाड़ लगा लो,
न कोई आएगा
न कोई भाव उपजेंगे
न मन में कोई कामना जागेगी,
मृत्यु की प्रतीक्षा में
बस धड़कनें चलेंगी!

- जेन्नी शबनम (जून 20, 2011)

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