सोमवार, 29 अगस्त 2011

277. शेष न हो...

शेष न हो...

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सवाल भी ख़त्म और जवाब भी
शायद ऐसे ही ख़त्म होते हैं रिश्ते,
जब सामने कोई हो
और कहने को कुछ भी शेष न हो !

- जेन्नी शबनम (27. 8. 2011)

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रविवार, 28 अगस्त 2011

276. इन्द्रधनुष खिला (बरसात पर 10 हाइकु)

इन्द्रधनुष खिला
(बरसात पर 10 हाइकु)

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1.
आकाश दिखा
इन्द्रधनुष खिला
मचले जिया !

2.
हुलसे जिया
घिर आए बदरा
जल्दी बरसे !

3.
धरती गीली
चहुँ ओर है पानी
हिम पिघला !

4.
भींगा अनाज
कुलबुलाये पेट
छत टपकी !

5.
बिजली कौंधी
कहीं जब वो गिरी
खेत झुलसे !

6.
धरती ओढ़े
बादलों की छतरी
सूरज छुपा !

7.
मेघ गरजा
रिमझिम बरसा
मन हरसा !

8.
कारे बदरा
टिप-टिप बरसे
मन हरसे !

9.
इन्द्र देवता
हुए धरा से रुष्ट
लोग पुकारे !

10.
ठिठके खेत
कर जोड़ पुकारे
बरसो मेघ !

- जेन्नी शबनम (18. 8. 2011)

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शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

275. राखी के धागे (राखी पर 11 हाइकु)

राखी के धागे
(राखी पर 11 हाइकु)

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1.   
राखी का पर्व   
पूर्णमासी का दिन   
सावन माह !   

2.   
राखी-त्योहार   
सब हों ख़ुशहाल   
भाई-बहन !   

3.   
बहना आई   
राखी लेकर प्यारी   
भाई को बाँधी !   

4.   
रक्षा बंधन   
प्यार का है बंधन   
पवित्र धागा !   

5.   
रक्षा का वादा   
है भाई का वचन   
बहन ख़ुश !   

6.   
भैया विदेश   
राखी किसको बाँधे   
राह निहारे !   

7.   
राह अगोरे   
भइया नहीं आए   
राखी का दिन !   

8.   
सजेगी राखी   
भैया की कलाई पे   
रंग-बिरंगी !   

9.   
राखी की धूम   
दिखे जो चहुँ ओर   
मनवा झूमे !   

10.   
रक्षा-बंधन   
याद रखना भैया   
प्यारी बहना !   

11.   
अटूट रिश्ता   
जोड़े भाई-बहन   
रक्षा बंधन !   

- जेन्नी शबनम (13. 8. 2011)   

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सोमवार, 22 अगस्त 2011

274. दुनिया बहुत रुलाती है...

दुनिया बहुत रुलाती है...

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प्रेम की चाहत कभी कम नहीं होती
ज़िन्दगी बस दुनियादारी में कटती है,
कमबख्त ये दुनिया बहुत रुलाती है.

_ जेन्नी शबनम (21. 8. 2011 )

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शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

273. फिर से मात...

फिर से मात...

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बेअख्तियार-सी हैं करवटें, बहुत भारी है आज की रात,
कह दिया यूँ तल्ख़ी से उसने, तन्हाई है ज़िन्दगी की बात !

साथ रहने की वो गुज़ारिश, बन चली आँखों में बरसात,
ख़त्म होने को है जिंदगानी, पर ख़त्म नहीं होते जज़्बात !

सपने पलते रहे आसमान के, छूटी ज़मीन बने ऐसे हालात,
वक़्त से करते रहे थे शिकवा, वक़्त ही था बैठा लगाए घात !

शिद्दत से जिसे चाहा था कभी, मिले हैं ऐसे कुछ लम्हे सौगात.
अभी जाओ ओ समंदर के थपेड़ों, आना कभी फिर होगी मुलाक़ात !

दोराहे पर है ठिठकी ज़िन्दगी, कदम-कदम पर खड़ा आघात.
देखो सब हँस पड़े किस्मत पर, 'शब' ने खाई है फिर से मात !

- जेन्नी शबनम (11. 8. 2011 )

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सोमवार, 15 अगस्त 2011

राम नाम सत्य है...

राम नाम सत्य है...

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कोई तो पुकार सुनो
कोई तो साहस करो,
चीख नहीं निकलती
पर दम निकल रहा है उनका 
वो अपने दर्द में ऐसे टूटे हैं
कि ज़ख़्म दिखाने से भी कतराते हैं,
उनकी सिसकी मुँह तक नहीं आती
गले में ही अटक जाती है,
करुणा नहीं चाहते
मेहनत से जीने का अधिकार चाहते हैं
जो उन्हें मिलता नहीं,
और छीन लेने का साहस नहीं
क्योंकि
बहुत तोड़ा गया
वर्षों वर्ष उनको,
दम टूट जाए पर ज़ुबान चुप रहे
इसी कोशिश में
रोज़ रोज़ मरते हैं 
चिथड़ों में लिपटे बच्चों की
ज़ुबान भी चुप हो गई है,
रोने केलिए
पेट में अनाज तो हो
देह में जान तो हो,
लहलहाती फसलें
प्रकृति लील गई
देह की ताकत
खाली पेट की मजूरी
तोड़ गई,
हाथ अकेला
भँवर बड़ा
उफ्फ्फ्...
इससे तो अच्छा है
जीवन का अंत,
एक साथ सब बोलो
राम नाम सत्य है...!

_ जेन्नी शबनम (अगस्त 15, 2011)

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गुरुवार, 11 अगस्त 2011

अलविदा कहती हूँ...

अलविदा कहती हूँ...

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ख्वाहिशें ऐसे ही दम तोड़ेंगी
जानते हुए भी
नए-नए ख्व़ाब देखती हूँ,
दामन से छूटते जाते
जाने कितने पल
फिर भी वक़्त को समेटती हूँ,
शमा फिर भी जलेगी
रातें फिर भी होंगी
साथ तुम्हारे
बस एक रात आख़िरी चाहती हूँ,
चाह कर टूटना
या टूट कर चाहना
दोनों हाल में
मैं ही तो हारती हूँ,
दूरियाँ और भी
बढ़ जाती है
मैं जब-जब पास आती हूँ,
पास आऊँ या दूर जाऊँ
सिर्फ मैं ही
मात खाती हूँ,
न आए कोई आँच तुमपर
तुमसे दूर
चली जाती हूँ,
एक वचन देती हूँ प्रिय
ख़ुद से नाता
तोड़ती हूँ,
'शब' की हँसी
गूँज रही
महफ़िल में सन्नाटा है
रूख़सत होने की बारी है
अब मैं
अलविदा कहती हूँ!

- जेन्नी शबनम (अगस्त 10, 2011)

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रविवार, 7 अगस्त 2011

तुम मेरे दोस्त जो हो...

तुम मेरे दोस्त जो हो...

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मेरे लिए एक काम कर दोगे
''ज़हर ला दोगे,
बहुत थक गई हूँ
ज़िन्दगी से उब गई हूँ'',
जानती हूँ तुम ऐसा नहीं करोगे
कभी ज़हर नहीं ला दोगे,
मेरी मृत्यु सह नहीं सकते
फिर भी कह बैठती हूँ तुमसे|
तुम भी जानते हो
मुझमें मरने का साहस नहीं
न जीने की चाहत बची है,
पर हर बार जब जब हारती हूँ
तुमसे ऐसा ही कहती हूँ|
तुम्हारे काँधे पे मेरा माथा
सहारा और भरोसा
तुम ही तो देते हो,
मेरे हर सवाल का जवाब भी
तुम ही देते हो,
बिना रोके बिना टोके
शायद तुम ही हो
जो मेरे गुस्से को सह लेते हो
मेरे आँसुओं को बदल देते हो|
कई बार सोचती हूँ
तुम्हारी गलती नहीं
दुनिया से नाराज़ हूँ
फिर क्यों ख़फा होती हूँ तुमपर
क्यों खीझ निकालती हूँ तुमपर,
तुम चुपचाप सब सुनते हो
मुझे राहत देते हो|
कई बार मन होता है
तुमसे अपना नाता तोड़ लूँ
अपने ज़ख़्म ख़ुद में समेट रखूँ,
पर न जाने क्यों
किश्त-किश्त में सब कह जाती तुमसे|
शायद ये भी कोई नाता है
जन्म का तो नहीं
पर जन्मों का रिश्ता है,
इसलिए बेख़ौफ़
कभी ज़हर माँगती
कभी नज़र माँगती,
कभी रूठ जाती हूँ
महज़ इस बात केलिए कि
मेरे लिए मृत्यु क्यों नहीं खरीद लाये
तुम बहुत कंजूस हो|
जानती हूँ
तुम मेरे दोस्त जो हो
मेरे लिए मौत नहीं
सदैव ज़िन्दगी लाते हो!

- जेन्नी शबनम (अगस्त 7, 2011)
( मित्रता दिवस पर)
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शनिवार, 6 अगस्त 2011

उन्हीं दिनों की तरह...

उन्हीं दिनों की तरह...

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चौंक कर उसने कहा
''जाओ लौट जाओ
क्यों आई हो यहाँ
क्या सिर्फ वक़्त बिताना चाहती हो यहाँ?
हमने तो सर्वस्व अपनाया था तुम्हें
क्यों छोड़ गई थी हमें?''
मैं अवाक्
निरुत्तर!
फिर भी कह उठी
उस समय भी कहाँ मेरी मर्ज़ी चली थी
गवाह तो थे न तुम,
जीवन की दशा और दिशा को
तुमने ही तो बदला था,
सब जानते तो थे तुम
तब भी और अब भी!
सच है
तुम भी बदल गए हो
वो न रहे
जैसा उन दिनों छोड़ गई थी मैं,
एक भूलभुलैया
या फिर अपरिचित-सी फ़िज़ा
जाने क्यों लग रही है मुझे?
तुम न समझो  पर अपना-सा लग रहा है मुझे
थोड़ा-थोड़ा ही सही,
आस है
शायद तुम वापस अपना लो मुझे
उसी चिर परिचित अपनेपन के साथ
जब मैं पहली बार मिली थी तुमसे
और तुमने बेझिझक
सहारा दिया था मुझे
यह जानते हुए कि मैं असमर्थ और निर्भर हूँ
और हमेशा रहूँगी,
तुमने मेरी समस्त दुश्वारियाँ समेट ली थी
और मैं बेफ़िक्र
ज़िन्दगी के नए रूप देख रही थी
सही मायने में ज़िन्दगी जी रही थी!
सब कुछ बदल गया है
वक़्त के साथ
जानती हूँ
पर उन यादों को जी तो सकती हूँ!
ज़रा-ज़रा पहचानो मुझे
एक बार फिर उसी दौर से गुज़र रही हूँ,
फ़र्क सिर्फ वज़ह का है
एक बार फिर मेरी ज़िन्दगी तटस्थ हो चली है
मैं असमर्थ और निर्भर हो चली हूँ!
तनिक सुकून दे दो
फिर लौट जाना है मुझे
उसी तरह उस गुमनाम दुनिया में
जिस तरह एक बार ले जाई गई थी
तुमसे दूर
जहाँ अपनी समस्त पहचान खोकर भी
अब तक जीवित हूँ!
मत कहो
''जाओ लौट जाओ'',
एक बार कह दो -
''शब, तुम वही हो
मैं भी वही
फिर आना
कुछ वक़्त निकालकर
एक बार साथ-साथ जिएँगे
फिर से
उन्हीं दिनों की तरह
कुछ पल!''

- जेन्नी शबनम (जुलाई 17, 2011)
( 20 साल बाद शान्तिनिकेतन आने पर )
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बुधवार, 3 अगस्त 2011

कह न पाउँगी कभी...

कह न पाउँगी कभी...

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अपने जीवन का सत्य
कह न पाऊँगी
किसी से कभी,
अपने पराए का भेद
समझती हूँ,
पर जानती हूँ
कह न पाऊँगी
किसी से कभी 

न जाने कब कौन
अपना बनकर
जाल बिछा रहा हो,
किसी तरह फँसकर
उसके जलसे का
मैं बस हिस्सा रह जाऊँ 

बहुत घुटन होती है
जब-जब भरोसा टूटता है,
किसी अपने के सीने से
लिपट जाने का
मन करता है 

समय-चक्र और नियति
कहाँ कौन जान पाया है ?
किसी पराए की प्रीत
शायद प्राण दे जाए
जीवन का कारण बन जाए,
पर पराए का अपनापन
कैसे किसी को समझाएँ ?

अपनों का छल
बड़ा घाव देता है,
पराए से अपना कोई नहीं
मन जानता है,
पर जानती हूँ
कह न पाऊँगी
किसी से कभी । 

- जेन्नी शबनम ( जुलाई 19, 2011)

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सोमवार, 1 अगस्त 2011

कुछ तो था मेरा अपना...

कुछ तो था मेरा अपना...

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जी चाहता है
सब कुछ छोड़ कर
वापस लौट जाऊँ
अपने उसी अँधेरे कोने में
जहाँ कभी किसी दिन
दुबकी हुई मैं
मिली थी तुम्हें,
और तुम खींच लाए थे उजाले में
चहकने के लिए|
खिली-खिली मैं
जाने कैसे सब भूल गई
वो सब यादें विस्मृत कर दी
जो टीस देती थी मुझे,
और मैं
तुम्हारे साथ
सतरंगी सपने देखने लगी थी|
जानते हुए कि
बीते हुए कल के अँधेरे साथ नहीं छोड़ेंगे
और एक दिन तुम भी छोड़ जाओगे,
मैंने एक भ्रम लपेट लिया था कि
सब कुछ अच्छा है
जो बीता वो कल था
आज का सपना
सब सच्चा है|
अब तो जो शेष है
बस मेरे साथ
मेरा ही अवशेष है,
जी चाहता है
वापस लौट जाऊँ
अपने उसी अँधेरे कोने में
अपने सच के साथ,
जहाँ कुछ तो था
मेरा अपना...

- जेन्नी शबनम ( अगस्त 1, 2011)

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