Friday, April 1, 2011

विध्वंस होने को आतुर...

विध्वंस होने को आतुर...

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चेतन अशांत है
अचेतन में कोहराम है,
अवचेतन में धधक रहा
जैसे कोई ताप है !

अकारण नहीं संताप
मिटना तो निश्चित है,
नष्ट हो जाना ही
जैसे अंतिम परिणाम है !

विक्षिप्तता की स्थिति
क्रूरता का चरमोत्कर्ष है,
विध्वंस होने को आतुर
जैसे अब हर इंसान है !

विभीषिका बढ़ती जा रही
स्वयं मिटे अब दूसरों की बारी है,
चल रहा कोई महायुद्ध
जैसे सदियों से अविराम है !

- जेन्नी शबनम (28 . 3 . 2011)

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