गुरुवार, 31 दिसंबर 2020

705. मुट्ठी से फिसल गया

मुट्ठी से फिसल गया 


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निःसंदेह, बीता कल नहीं लौटेगा   
जो बिछड़ गया, अब नहीं मिलेगा   
फिर भी रोज़-रोज़ बढ़ती है आस   
कि शायद मिल जाए वापस   
जो जाने अनजाने, बंद मुट्ठी से फिसल गया।   
खुशियों की ख़्वाहिश. गो दुखों की है फ़रमाइश   
पर मन समझता नहीं, हर पल ख़ुद से उलझता है   
हर रोज़ की यही व्यथा   
कौन सुने इतनी कथा?   
वक़्त को दोष देकर   
कोई कैसे ख़ुद को निर्दोष कहेगा?   
क्यों दूसरों का लोर-भात एक करेगा?   
बहाने क्यों?   
कह दो कि बीता कल शातिर खेल था   
क्योंकि अवांछित संबंधों का मेल था   
जो था सब बेकार था, अविश्वास का भण्डार था   
अच्छा हुआ कि बंद मुट्ठी से फिसल गया।   
अमिट दूरियों का अंतहीन सिलसिला है   
उम्मीदों के सफ़र में आसमान-सा सन्नाटा है   
पर अतीत के अवसाद में कोई कबतक जिए   
कितने-कितने पीर मन में लेके फिरे,   
वक़्त भी वही उसकी चाल भी वही   
बरजोरी से उससे छीननी होगी खुशियाँ।   
नहीं करना है अब शोक, कि साथ चलते-चलते   
चंद क़दमों का फ़ासला, मीलों में बढ़ गया   
रिश्ते-नाते नेह-बंधन मन की देहरी में ढह गया   
देखते-देखते सब, बंद मुट्ठी से फिसल गया।   

- जेन्नी शबनम (31. 12. 2020)
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रविवार, 20 दिसंबर 2020

704. तकरार

तकरार 

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आत्मा और बदन में 
तकरार जारी है,   
बदन छोड़कर जाने को आत्मा उतावली है   
पर बदन हार नहीं मान रहा   
आत्मा को मुट्ठी से कसके भींचे हुए है   
थक गया, मगर राह रोके हुए है।   
मैं मूकदर्शक-सी   
दोनों की हाथापाई देखती रहती हूँ,   
कभी-कभी गुस्सा होती हूँ   
तो कभी ख़ामोश रह जाती हूँ,   
कभी आत्मा को रोकती हूँ   
तो कभी बदन को टोकती हूँ,   
पर मेरा कहा दोनों नहीं सुनते   
और मैं बेबसी से उनको ताकती रह जाती हूँ।   
कब कौन किससे नाता तोड़ ले   
कब किसी और जहाँ से नाता जोड़ ले,   
कौन बेपरवाह हो जाए, कौन लाचार हो जाए   
कौन हार जाए, कौन जीत जाए,   
कब सारे ताल्लुकात मुझसे छूट जाए   
कब हर बंधन टूट जाए।   
कुछ नहीं पता, अज्ञात से डरती हूँ,   
जाने क्या होगा, डर से काँपती हूँ।   
आत्मा और बदन साथ नहीं   
तो मैं कहाँ?   
तकरार जारी है,   
पर मिटने के लिए   
मैं अभी राजी नहीं।   

- जेन्नी शबनम (20. 12. 2020) 

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शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020

703. गंगा (20 हाइकु)

 गंगा 


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1. 
चल पड़ी हूँ   
सागर से मिलने   
गंगा के संग।   

2. 
जीवन गंगा   
सागर यूँ ज्यों कज़ा   
अंतिम सत्य।   

3. 
मुक्ति है देती   
पाप पुण्य का भाव   
गंगा है न्यारी।   

4. 
सब समाया   
जीवन और मृत्यु   
गंगा की गोद।   

5. 
हम हैं पापी   
गंगा को दुःख देते   
कर दूषित।   

6. 
निश्छल प्यार   
सबका बेड़ा पार   
गंगा है माँ-सी।   

7. 
पावनी गंगा   
कल-कल बहती   
जीवन देती।   

8. 
बसा जीवन   
सदियों का ये नाता   
गंगा के तीरे।   

9. 
गंगा की बाहें   
सबको समेटती   
भलें हों पापी।   

10. 
जीवन बाद   
गंगा में प्रवाहित   
अंतिम लक्ष्य।   

11. 
गंगा है हारी   
वो जीवनदायिनी   
मानव पापी।   

12. 
गंगा की पीर   
गंदगी को पी-पीके   
हो गई मैली।   

13. 
क्रूर मानव   
अनदेखा करता   
गंगा का मन।   

14. 
प्रचंड गंगा   
बहुत बौखलाई   
बाढ़ है लाई।   

15. 
गंगा से सीखो   
सब सहकरके   
धरना धीर।   

16. 
हमें बुलाती   
कल-कल बहती   
गंगा हमारी।   

17. 
गंगा प्रचंड   
रौद्र रूप दिखाती   
जब गुस्साती।   

18. 
गंगा है प्यासी   
उपेक्षित होके भी   
प्यास बुझाती।   

19. 
पावनी गंगा   
जग के पाप धोके   
हुई लाचार।   

20. 
किरणें छूतीं   
पाके सूर्य का प्यार   
गंगा मुस्काती।   

- जेन्नी शबनम (17. 12. 2020)
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रविवार, 13 दिसंबर 2020

702. पत्थर या पानी

पत्थर या पानी 

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मेरे अस्तित्व का प्रश्न है -   
मैं पत्थर बन चुकी या पानी हूँ?   
पत्थरों से घिरी मैं, जीवन भूल चुकी हूँ   
शायद पत्थर बन चुकी हूँ   
फिर हर पीड़ा, मुझे रूलाती क्यो है?   
हर बार पत्थरों को धकेलकर   
जिधर राह मिले, बह जाती हूँ   
शायद पानी बन चुकी हूँ   
फिर अपनी प्यास से तड़पती क्यों हूँ?   
हर बार बार-बार   
पत्थर और पानी में बदलती मैं   
नहीं जानती, मैं कौन हूँ।   

- जेन्नी शबनम 12. 12. 2020)
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बुधवार, 2 दिसंबर 2020

701. स्त्री हूँ (10 क्षणिकाएँ)

स्त्री हूँ 

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1. 
अकेली   
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रह जाती हूँ   
बार-बार   
हर बार   
बस अपने साथ   
मैं, नितांत अकेली!   


2. 
भूल जाओ 
*** 
सपने तो बहुत देखे   
पर उसे उगाने के लिए   
न ज़मीन मिली   
न मैंने माँगी   
सपने तो सपने हैं   
सच कहाँ होते हैं,   
बस देखो और भूल जाओ!   


3.
छलाँग 
*** 
आसमान की चाहत में   
एक ऊँची छलाँग लगाई मैंने   
भर गया आसमान मुट्ठी में   
पाँव के नीचे लेकिन   
ज़मीं ना रही!   


4. 
ज़िन्दगी जी ली 
*** 
ज़िंदा रहने के लिए   
सपनों का मर जाना   
बेहद ख़तरनाक है   
मालूम है   
फिर भी एक-एक कर   
सारे सपनों को मार दिया,   
ख़ुद ही पाँव पर कुल्हाड़ी मारी   
और ज़िन्दगी जी ली मैंने!   


5.  
हँस पड़ी वह 
*** 
वह हँसी, वह बोली   
इतना दंभ, इतनी हिमाक़त   
उसे मर्यादित होना चाहिए   
उसे क्षमाशील होना चाहिए   
उसकी जाति का यही धर्म है,   
पर अब अधर्मी होना स्वीकार है   
यही एक विकल्प है   
आज फिर हँस पड़ी मैं!   


6.
जर्जर 
*** 
आख़िरकार मैं घबराकर   
घुस गई कमरे के भीतर   
तूफ़ान आता, कभी जलजला   
हर बार ढहती रही, बिखरती रही   
पर जब भी खिड़की से बाहर झाँका   
साबुत होने के दंभ के साथ,   
खंडहर नहीं छुपा सकता, काल के चक्र को   
अंततः सबने देखा झरोखे से झाँकती, जवान काया   
जो अब डरावनी और जर्जर है!   


7. 
बाँझ 
*** 
मन में अब कुछ नहीं उपजता   
न स्वप्न न कामना   
किसी अपने ने पीछे से वार किया   
हर रोज़ बार-बार हज़ार बार,   
कोमल मन   
खंजर की वार से बंजर हो गया है   
मेरा मन अब बाँझ है!   


8.
जीना चाहती हूँ 
*** 
स्त्री हूँ, वजूद तलाशती   
अपना एक कोना ढूँढती   
अपनों का ताना-बाना जोड़ती   
यायावरता मेरी पहचान बन गई है,   
शनै-शनै मैं खो रही हूँ मिट रही हूँ   
पर मिटना नहीं चाहती   
स्त्री हूँ, स्त्री बनकर जीना चाहती हूँ!   


9.
खुदाई 
*** 
जाने क्यों ज़माना, बार-बार खुदाई करता है   
गहरी खुदाई पर, मन ने हरकत कर ही दी   
दिल पर खुदी दर्द की तहरीर   
ज़माने ने पढ़ ली और अट्टहास किया   
जाने कितनी सदियों से, सब कुछ दबा था   
अँधेरी गुफ़ाओं में, तहख़ाने के भीतर,   
अब आँसुओं का सैलाब है   
जो झील बन चुका है!   


10.
जबरन 
*** 
अतीत की बेवक़ूफ़ियाँ   
मन का पछतावापन   
गाहे-बगाहे, चाहे  चाहे   
वक़्त पाते ही बेधड़क घुस आता है   
उन सभासदों की तरह जबरन   
जिनका उस क्षेत्र में प्रवेश पर निषेध है,   
 हँसने देता है  रोने देता है   
और झिंझोड़कर रख देता है   
पूरा का पूरा वजूद!   

 - जेन्नी शबनम (2. 12. 2020)

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