रविवार, 7 अगस्त 2011

270. तुम मेरे दोस्त जो हो...

तुम मेरे दोस्त जो हो...

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मेरे लिए एक काम कर दोगे
''ज़हर ला दोगे,
बहुत थक गई हूँ
ज़िन्दगी से ऊब गई हूँ'',
जानती हूँ तुम ऐसा नहीं करोगे
कभी ज़हर नहीं ला दोगे,
मेरी मृत्यु सह नहीं सकते
फिर भी कह बैठती हूँ तुमसे !
तुम भी जानते हो
मुझमें मरने का साहस नहीं
न जीने की चाहत बची है,
पर हर बार जब-जब हारती हूँ
तुमसे ऐसा ही कहती हूँ !
तुम्हारे काँधे पे मेरा माथा
सहारा और भरोसा
तुम ही तो देते हो,
मेरे हर सवाल का जवाब भी
तुम ही देते हो,
बिना रोके बिना टोके
शायद तुम ही हो
जो मेरे गुस्से को सह लेते हो
मेरे आँसुओं को बदल देते हो !
कई बार सोचती हूँ
तुम्हारी गलती नहीं
दुनिया से नाराज़ हूँ
फिर क्यों ख़फा होती हूँ तुम पर
क्यों खीझ निकालती हूँ तुम पर,
तुम चुपचाप सब सुनते हो
मुझे राहत देते हो !
कई बार मन होता है
तुमसे अपना नाता तोड़ लूँ
अपने ज़ख़्म ख़ुद में समेट रखूँ,
पर न जाने क्यों
किश्त-किश्त में सब कह जाती हूँ तुमसे !
शायद यह भी कोई नाता है
जन्म का तो नहीं
पर जन्मों का रिश्ता है,
इसलिए बेख़ौफ़
कभी ज़हर माँगती
कभी नज़र माँगती,
कभी रूठ जाती हूँ
महज़ इस बात के लिए कि
मेरे लिए मृत्यु क्यों नहीं खरीद लाये
तुम बहुत कंजूस हो !
जानती हूँ
तुम मेरे दोस्त जो हो
मेरे लिए मौत नहीं
सदैव ज़िन्दगी लाते हो !

- जेन्नी शबनम (अगस्त 7, 2011)
( मित्रता दिवस पर)
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