Wednesday, August 31, 2016

527. शबनम...

शबनम...   

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रात चाँदनी में पिघलकर   
यूँ मिटी शबनम   
सहर को ये ख़बर नहीं थी   
कब मिटी शबनम !   

दर्द की मिट्टी का घर   
फूलों से सँवरा   
दर्द को ढ़कती रही पर   
दर्द बनी शबनम !   

अपनों के शहर में   
है कोई अपना नहीं   
ठुकराया आसमां और   
उफ़्फ़ कही शबनम !   

चाँद तारों के नगर में   
हुई जो तकरार   
आसमान से टूटकर   
तब ही गिरी शबनम !   

शब व सहर की दौड़ से   
थकी तो बहुत मगर   
वक्त के साथ चली   
अब भी है वही शबनम !   

- जेन्नी शबनम (31. 8. 2016)   

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