Friday, March 18, 2011

आदम और हव्वा...

(होली के अवसर पर)

आदम और हव्वा...

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कुदरत की कारस्तानी है
मर्द-औरत की कहानी है,
फल खाकर आदम-हव्वा ने
की गज़ब नादानी है !

चालाकी कुदरत की या
आदम हव्वा की मेहरबानी है,
बस गई छोटी सी दुनिया जैसे
अंतरिक्ष में चूहेदानी है !

कुदरत ने बसाया ये संसार
जिसमें आदम है हव्वा है,
उन्होंने खाया एक सेब मगर
संतरे सी छोटी ये दुनिया है !

सोचती हूँ
काश...
एक दो और
आदम-हव्वा आये होते,
आदम-हव्वा ने
बस दो फल तो खाए होते,
दुनिया थोड़ी तो बड़ी होती
गहमा गहमी और बढ़ जाती !

दुनिया दोगुनी लोग दोगुने होते
हर घर में एक हीं जगह पर दो आदमी होते,
न कोई अकेला उदास होता
न कोई अनाथ होता,
न कहीं तन्हाई होती
न तन्हा मन कोई रोता !

न सुनसान इलाका होता
हर तरफ इक रौनक होती,
कहीं आदम के ठहाके तो
कहीं चूड़ी की खनक होती !

हर जगह आदम जात होती
जवानों का मदमस्त जमघट होता,
कहीं बच्चों की चहचहाती जमात होती
कहीं बुजुर्गों की ख़ुशहाल टोली होती,
कहीं श्मशान पर शवों का रंगीन कारवां होता
क्या न होता और क्या क्या होता !

सोचो ज़रा ये भी तुम
होता नहीं कोई गुमसुम,
मृत्यु पर भी लोग ग़मगीन न होते
गीत मौत का पुरलय होता,
जीवन-मृत्यु दोनों हीं जश्न होता
वहाँ ( स्वर्गलोक) के अकेलेपन का भय न होता,
कहीं कोई बिनब्याहा बेसहारा न होता
कहीं कोई निर्वंश बेचारा न होता,
एक नहीं दो डॉक्टर आते
कोई एक अगर बीमार होता !

क्या रंगीन फ़िज़ा होती
क्या हसीन समा होता,
हर जगह काफ़िला होता
हर तरफ त्यौहार होता !

सोचती हूँ
काश ...
एक और आदम होता
एक और हव्वा होती,
उन्होंने एक और फल खाया होता
दुनिया तरबूज सी बड़ी होती,
सूरज से न डरी होती
तरबूज सी बड़ी होती !

__ जेन्नी शबनम __ 16 मार्च, 2011

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