Sunday, March 3, 2013

387. ज़िन्दगी स्वाहा...

ज़िन्दगी स्वाहा...

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कब तक आखिर मेढ़क बन कर रहें
आओ संग-संग
एक बड़ी छलाँग लगा ही लें 
पार कर गए तो 
मंजिल
गिर पड़े तो
वही दुनिया
वही कुआँ
वही कुआँ के मेढक...
टर्र-टर्र करते 
एक दूसरे को ताकते
ज़िन्दगी स्वाहा...!

- जेन्नी शबनम (3. 3. 2013)

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