गुरुवार, 7 जुलाई 2011

263. स्तब्ध खड़ी हूँ...

स्तब्ध खड़ी हूँ...

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ख़्वाबों के गलियारे में, स्तब्ध, मैं हूँ खड़ी,
आँखों से ओझल, ख़ामोश, पास तुम भी हो खड़े,
साँसे हैं घबराई-सी, वक्त भी है परेशान खड़ा !
जाने कौन सी विवशता है, वक्त ठिठका है,
जाने कौन सा तूफ़ान थामे, वक्त ठहरा है !

मेरी सदियों की पुकार तुम तक नहीं पहुँचती,
तुम्हारी ख़ामोशी व्यथित कर रही है मुझे !
अपनी आँखों से अपने बदन का लहू पी रही,
और जिस्म को आँसुओं से सहेज रही हूँ !

मैं, तुम और वक्त
सदियों से सदियों का तमाशा देख रहे हैं !
न हम तीनों थके न सदियाँ थकी,
शायद एक और इतिहास रचने वाला है,
या शायद एक और बवंडर आने वाला है !

_ जेन्नी शबनम ( जनवरी 23, 2009)

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