शनिवार, 24 अक्तूबर 2020

693. दड़बा

दड़बा 

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ऐ लड़कियों!   
तुम सब जाओ अपने-अपने दड़बों में   
अपने-अपने परों को सम्हालो   
एक दूसरे को अपने-अपने चोंचों से लहूलुहान करो!   
कटना तो तुम सबको है, एक न एक दिन   
अपनों द्वारा या गैरों द्वारा   
सीख लो लड़ना, ख़ुद को बचाना, दूसरों को मात देना   
तुम सीखो छल-प्रपंच और प्रहार-प्रतिघात   
तुम सीखो द्वंद्ववाद और द्वंद्वयुद्ध!   
दड़बे के बाहर की दुनिया, क़ातिलों से भरी है   
जिनके पास, शब्द के भाले हैं, बोली की कटारें हैं   
जिनके देह और जिह्वा को, तुम्हारे माँस और लहू की प्यास है   
पलक झपकते ही, झपट ली जाओगी   
चीख भी न पाओगी!   
दड़बे के भीतर, कितना भी लिख लो तुम   
बहादूरी की गाथाएँ, हौसलों की कथाएँ   
पर बाहर की दुनिया, जहाँ पग-पग पर भेड़िया है   
मानव रूप धरकर, तुम्हारा इंतजार कर रहा है   
भेड़िये के सामने मेमना नहीं, खुद भेड़िया बनना है   
टक्कर सामने से देना है, बराबरी पर देना है!   
ऐ लड़कियों!   
जीवन की रीत, जीवन का संगीत, जीवन का मंत्र   
सब सीख लो तुम   
न जाने कब किस घड़ी   
समय तुमसे क्या माँगे!   

- जेन्नी शबनम (24. 10. 2020)
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बुधवार, 21 अक्तूबर 2020

692. देहाती

देहाती  

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फ़िक्रमंद हूँ, उन सभी के लिए   
जिन्होंने सूरज को हथेली में नहीं थामा   
चाँद के माथे को नहीं चूमा   
वर्षा में भींग-भींगकर न नाचा न खेला   
माटी को मुट्ठी में भरकर, बदन पर नहीं लपेटा   
दुःख होता है उनके लिए   
जिन्हें नहीं पता कि मुंडेर क्या होती है   
मूँज से चटाई कैसे बनती है   
अँगना लीपने के बाद कैसा दिखता है   
ढ़ेंकी और जाँता की आवाज़ कैसी होती है   
उन्होंने कभी देखा नहीं, गाय-बैल का रँभाना   
बाछी का पगहा तोड़ माँ के पास भागना   
भोरे-भोरे खेत में रोपनी, खलिहान में धान की ओसौनी   
आँधियों में आम के गाछी में टिकोला बटोरना   
दरी बिछाकर ककहरा पढ़ना, मास्टर साहब से छड़ी खाना   
कितने अनजान हैं वे, कितना कुछ खोया है उन्होंने   
यूँ वे सभी अति सुशिक्षित हैं, चाँद और मंगल की बातें करते हैं   
एक ऊँगली के स्पर्श से, दुनिया का ज्ञान बटोर लेते हैं   
पर, हाँ, सच ही कहते हैं वे, हम देहाती हैं   
भात को चावल नहीं कहते, रोटी को चपाती नहीं कहते   
तरकारी को सब्जी नहीं कहते, पावरोटी को ब्रेड नहीं कहते   
हम गाँव-जबार की बात करते हैं, वे अमेरिका-इंग्लैंड की बात करते हैं   
नहीं-नहीं! कोई बराबरी नहीं, हम देहाती ही भले   
पर उन सबों के लिए निराशा होती है, जो अपनी माटी को नहीं जानते   
अपनी संस्कृति और समाज को नहीं पहचानते   
तुमने बस पढ़कर सुना है सब   
हमने जीकर जाना है सब।  

- जेन्नी शबनम (20. 10. 2020)
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रविवार, 18 अक्तूबर 2020

691. चलते ही रहना (चोका - 14)

चलते ही रहना 

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जीवन जैसे   
अनसुलझी हुई   
कोई पहेली   
उलझाती है जैसे   
भूल भूलैया,   
कदम-कदम पे   
पसरे काँटें   
लहूलुहान पाँव   
मन में छाले   
फिर भी है बढ़ना   
चलते जाना,   
जब तक हैं साँसें   
तब तक है   
दुनिया का तमाशा   
खेल दिखाए   
संग-संग खेलना   
सब सहना,   
इससे पार जाना   
संभव नहीं   
सारी कोशिशें व्यर्थ   
कठिन राह   
मन है असमर्थ,   
मगर हार   
कभी मानना नहीं   
थकना नहीं   
कभी रुकना नहीं   
झुकना नहीं   
चलते ही रहना   
न घबराना   
जीवन ऐसे जीना   
जैसे तोहफ़ा   
कुदरत से मिला   
बड़े प्यार से   
बड़ी हिफाज़त से   
सँभाल कर जीना!   

- जेन्नी शबनम (18. 10. 2020)

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गुरुवार, 15 अक्तूबर 2020

690. इकीगाई

 इकीगाई 


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ज़िन्दगी चल रही थी, जिधर राह मिली मुड़ रही थी   
कहाँ जाना है क्या पाना है, कुछ भी करके बस जीना है   
न कोई पड़ाव न कोई मंज़िल, वक़्त के साथ मैं गुज़र रही थी,   

ज़िन्दगी घिसट रही थी, या यूँ कि मैं धकेल रही थी   
पर जब-जब मन भारी हुआ, जब-जब रास्ता बोझिल लगा   
अंतर्मन में हूक उठी, और पन्नों पर हर्फ पिरोती रही   
जो किसी से न कहा लिखती रही,   

सदियों बाद जाने कैसे उसका एक पन्ना उड़ गया   
जा पहुँचा वहाँ जहाँ किसी ने उसे पढ़ा   
उसने रोककर मुझे कहा -   
अरे यही तो तुम्हारी राह थी   
जिसपर तुम छुप-छुप कर रुक रही थी   
इस लिए तुम बढ़ी नहीं   
जहाँ से शुरू की वहीं पर तुम खड़ी रही   
जाओ बढ़ जाओ इस राह पर   
पन्नों को बिखरा दो क़ायनात में   
कोई झिझक न रखो अपनी बात में,   

मैं हतप्रभ, अब तक क्यों न सोचा   
मेरे लिए यही तो एक रास्ता था   
जिसपर चलकर सुकून मिलना था   
जीवन को संतुष्टि और सार्थकता का बोध होना था   
पर अब समझ गई हूँ   
पन्नो पर रची तहरीर   
मेरा इकीगाई है।  

(इकीगाई - जापानी अवधारणा - जीवन जीने की वजह या जीवन का मूल्य) 

- जेन्नी शबनम (15. 10. 2020)
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शनिवार, 10 अक्तूबर 2020

689. चार लाइन भावाभिव्यक्तियाँ

चार लाइन भावाभिव्यक्तियाँ  

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1. 
उम्र भर चले जलती धूप में   
पाँव के छाले अब क़दम है रोके   
कभी जो छाँव कोई, दमभर मिली   
तुम कहते कि एहसान तेरा हुआ!   

2. 
मेरे साथी! तुम तब थे कहाँ   
ज़ख़्मों से जब हम थे घायल हुए   
इक तीर था निशाने पे लगा   
तन-मन मेरा जब ज़ख़्मी हुआ!   

3. 
ख़्वाहिशों की लम्बी क़तारें थीं   
फफोले-से सपने फूटते रहे   
जब दर्द पर मेरे हँसती थी दुनिया   
तू कहाँ था, मेरे साथी बता!   

4. 
जब भटकते रहे थे हम दरबदर   
मंदिर-मस्ज़िद सब हमसे बेख़बर   
घाव पर नमक छिड़कती थी दुनिया   
मेरा दर्द भला क्यों पराया हुआ!   

5. 
फूल और खार दोनों बिछे थे   
सारे खार क्यों मेरे हिस्से   
दुखती रगों को छेड़कर तुमने   
हँस के थे सुनाए मेरे क़िस्से!   

6. 
लो अब ये कहानी ख़त्म हो गई   
ज़िन्दगी अब नाफ़रमानी हो गई   
गर वापस तुम आओ तो देखना   
हम तो हारे, तुमने भी कुछ न जीता।   

7. 
सीले-सीले से जीवन में नहीं रौशनी   
चाँद और सूरज भी तो तेरा ही था   
शब के रातों की नमी मेरी तक़दीर   
उजालों का सौदा तुमने ही किया!   

8. 
नफ़रतों की दीवार गहरी हुई   
ढ़ह न सकी, उम्र भले ठिठकी रही   
हो सके तो एक सुराख़ करना   
जमाने की ख़ातिर लाज रखना!   

9. 
जब-जब जीवन से हारती रही   
आँखें तुमको ही ढूँढती रही   
अपनी दुनिया में उलझे रहे तुम   
बता तेरी दुनिया में हम थे कहाँ!   

10. 
शब के आँसू आसमाँ के आँसू   
दिन के आँसू ये किसने भरे   
धुँधली नज़रें किसकी मेहरबानी   
कभी तो पूछते तुम अपनी ज़ुबानी!   

11. 
दरम्याने ज़िन्दगी ये कैसा वक़्त आया है   
ज़िन्दगी की तड़प भी और मौत की चाहत है   
लफ्ज़-लफ्ज़ बिखरे हुए, अधरों पर ख़ामोशी है   
ज्यों छिन रही हो ज़िन्दगी, मन में यूँ उदासी है!   

12. 
अब जो लौटो तुम तो हम क्या करें   
ज़ख्म सारे रिस-रिस के अब नासूर बने   
तेरे क़र्ज़ के तले है जीवन बीता   
ऐ साथी मिलेंगे कभी अलविदा-अलविदा!

- जेन्नी शबनम (10. 10. 2020) 
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शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2020

688. बापू हमारे (बापू पर 10 हाइकु)

 बापू हमारे 


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1.

एक सिपाही   

अंग्रेजों पर भारी,   

मिला स्वराज।


2.

देश की शान   

जन-जन के प्यारे   

बापू हमारे।


3.

कत्ल हो गया   

अहिंसा का पुजारी,   

अभागे हम।


4.

बापू का मान   

हमारा अभिमान,   

अब तो मानो।


5.

अस्सी थी उम्र,   

अंग्रेजों को भगाया   

निडर काया।


6.

मिली आज़ादी   

साथ मिला संताप   

शोक में बापू।


7.

माटी का पूत   

माटी में मिल गया   

दिला के जीत।


8.

निहत्था लड़ा   

अस्सी साल का बूढ़ा,   

कभी  हारा।


9.

अकेला बढ़ा   

कारवाँ साथ चला   

आख़िर जीता।


10.

सादा जीवन   

कड़ा अनुशासन   

बापू की सीख।


- जेन्नी शबनम (2. 10. 2020)

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सोमवार, 21 सितंबर 2020

687. अल्ज़ाइमर

अल्ज़ाइमर 

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सड़क पर से गुज़रती हुई   
जाने मैं किधर खो गई    
घर-रास्ता-मंज़िल, सब अनचिन्हा-सा है   
मैं बदल गई हूँ, या फिर दुनिया बदल गई है!   
धीरे-धीरे सब विस्मृत हो रहा है   
मस्तिष्क साथ छोड़ रहा है   
या मैं मस्तिष्क की ऊँगली छोड़ रही हूँ!   
कुछ भूल जाती हूँ, तो अपनों की झिड़की सुनती हूँ   
सब कहते, कि मैं भूलने का नाटक करती हूँ   
कुछ भूल न जाऊँ, लिख-लिख कर रखती हूँ   
सारे जतन के बाद भी, अक्सर भूल जाती हूँ   
अपने भूलने से, मैं सहमी रहती हूँ   
अपनी पहचान खोने के डर से, डरी रहती हूँ!   
क्यों सब कुछ भूलती हूँ, मैं पागल तो नहीं हो रही?   
मुझे कोई रोग है क्या, कोई बताता क्यों नहीं?   
यूँ ही कभी एक रोज़   
गिनती के सुख और दुखों के अंबार, भूल जाऊँगी   
ख़ुद को भूल जाऊँगी, बेख़याली में गुम हो जाऊँगी   
याद करने की जद्दोजहद में, हर रोज़ तड़पती रहूँगी   
फिर से जीने को, हर रोज़ ज़रा-ज़रा मरती रहूँगी   
मुमकिन है, मेरा जिस्म ज़िंदा तो रहे   
पर कोई एहसास, मुझमें ज़िंदा न बचे!   
मेरी ज़िंदगी अब अपनों पर बोझ बन रही है   
मेरी आवाज़ धीरे-धीरे ख़ामोश हो रही है   
मैं हर रोज़ ज़रा-ज़रा गुम हो रही हूँ   
हर रोज़ ज़रा-ज़रा कम हो रही हूँ!   
मैं सब भूल रही हूँ   
मैं धीरे-धीरे मर रही हूँ!   

- जेन्नी शबनम (21. 9. 2020)
(विश्व अल्ज़ाइमर दिवस) 
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मंगलवार, 15 सितंबर 2020

686. यादें , न आओ (यादें पर 10 हाइकु)

 यादें, न आओ

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1. 
मीठी-सी बात   
पहली मुलाक़ात   
आई है याद!   

2. 
दुखों का सर्प   
यादों में जाके बैठा   
डंक मारता!   

3. 
गहरे खुदे   
यादों की दीवार पे   
जख्मों के निशाँ!   

4. 
तुम भी भूलो,   
मत लौटना यादें,   
हमें जो भूले! 

5. 
पराए रिश्ते   
रोज़ याद दिलाते   
देते हैं टीस!   

6. 
रोज़ कहती   
यादें बचपन की -   
फिर से जी ले!   

7. 
दिल दुखाते   
छोड़ गए जो नाते,   
आती हैं याद!   

8. 
पीछा करता,   
भोर-साँझ-सा चक्र   
यादों का चक्र!   

9. 
यादों का पंछी   
दाना चुगने आता   
आवाजें देता!   

10. 
दुख की बातें,   
यादें, न आओ रोज़,   
जीने दो मुझे!   

- जेन्नी शबनम (15. 9. 2020)
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बुधवार, 9 सितंबर 2020

685. बारहमासी

बारहमासी

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रग-रग में दौड़ा मौसम   
रहा न मन अनाड़ी   
मौसम का है खेल सब   
हम ठहरे इसके खिलाड़ी।   

आँखों में भदवा लगा   
जब आया नाचते सावन   
जीवन में उगा जेठ   
जब सूखा मन का आँगन।   

आया फगुआ झूम-झूम के   
तब मन हो गया बैरागी   
मुँह चिढ़ाते कार्तिक आया   
पर जली न दीया-बाती।   

समझो बातें ऋतुओं की   
कहे पछेया बासन्ती   
मन चाहे बेरंग हो पर   
रूप धरो रंग नारंगी।   

पतझड़ हो या हरियाली   
हँसी हो बारहमासी   
मन में चाहे अमावस हो   
जोगो सदा पूरनमासी।   

- जेन्नी शबनम (9. 9. 2020) 
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गुरुवार, 3 सितंबर 2020

684. परी

परी

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दुश्वारियों से जी घबराए   
जाने क़यामत कब आ जाए   
मेरे सारे राज़, तुम छुपा लो जग से   
मेरा उजड़ा मन, बसा लो मन में ।   
पूछे कोई कि तेरे मन में है कौन   
कहना कि एक थी परी, गुलाम देश की रानी   
अपने परों से उड़कर, जो मेरे सपने में आई   
किसी से न कहना, उस परी की कहानी   
जो एक रोज़ मिली तुमको, डरती हुई   
खोकर आज़ादी तड़पती हुई ।   
लहू से लथपथ, जीवन से विरक्त   
किसी ने छला था, बड़ा उसका मन   
पंख थे दोनों उसके कतरे हुए   
आँखें थीं बंद, पर आँसू लुढ़कते रहे   
होठों पे चुप्पी और सिसकी थमती नहीं   
उफ़! बदहवास, बड़ी थी बदहाल   
उसके मन में थे ढेरों मलाल   
कह गई मुझसे वो अपना हाल   
जीवन बीता था बन कर सवाल   
ले लिया वादा कि लेना न नाम।   
परी थी वो, मगर थी गुलाम   
अपनों ने छीने थे सारे अरमान   
साँसों पर बंदिश, सपनों पर पहरे   
ऐसे में भला, कोई कैसे जीए?   
ज़ख़्मी तन और घायल मन   
फ़ना हो गई, हर राज़ कहकर   
रह गई मेरे मन में कहानी बनकर   
सच उसका, मुझे कहना नहीं   
वो दे गई, ये कैसी मज़बूरी।   
हाँ ! सच है, वो परी न थी   
न किसी के सपनों की रानी   
वह थी थकी-हारी, टूटी एक नारी   
जो सदा रही सबके लिए बेमानी   
नहीं है कोई अब उसकी निशानी।   
ओह ! उसने कहा था राज़ न खोलना   
उसकी इज़्ज़त अपने तक रखना,   
ना-ना वो थी परी, गुलाम देश की रानी   
अपने परों से उड़कर, जो मेरे सपने में आई।   

- जेन्नी शबनम (3. 9. 2020)
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रविवार, 30 अगस्त 2020

683. ज़िन्दगी के सफ़हे

ज़िन्दगी के सफ़हे 

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ज़िन्दगी के सफ़हे पर   
चिंगारी धर दी किसी ने   
जो सुलग रही है धीरे-धीरे   
मौसम प्रतिकूल है   
आँधियाँ विनाश का रूप ले चुकी हैं   
सूरज झुलस रहा है   
हवा और पानी का दम घुट रहा है   
सन्नाटों से भरे इस दश्त में   
क्या ज़िन्दगी के सफ़हे   
सफ़ेद रह पाएँगे?   
झुलस तो गए हैं   
बस राख बनने की देर है।   

- जेन्नी शबनम (30. 8. 2020) 
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गुरुवार, 20 अगस्त 2020

682. रूह (10 क्षणिकाएँ)

रूह (10 क्षणिकाएँ) 

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1. 
कील 
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मन के नाज़ुक तहों में   
कभी एक कील चुभी थी   
जो बाहर न निकल सकी   
वह बारहा टीस देती है   
जब-जब दूसरी नई कील   
उसे और अंदर बेध देती है !   

2. 
काँटे 
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तमाम उम्र जिंदगी से काँटे छाँटती रही   
ताकि जिंदगी बस फूल ही फूल हो   
बिना चुभे एक भी काँटा अलग न हुआ   
हर बार चुभता, जख्म देता, रूलाता   
धीरे-धीरे फूलों का खिलना बंद हुआ   
रह गए बस काँटे ही काँटे   
अब इसे छाँटना क्या !   

3. 
जल गए 
******* 
वक़्त की टहनी पर   
रिश्तों के फूल खिले   
कुछ टिके, कुछ झरे   
कुछ रुके, कुछ बढे   
जो टिके, वे सँभल न सके   
जो झरे, वे झुलस गए   
जिंदगी आग का दरिया है   
वक़्त के साथ सब जल गए   
वक़्त के साथ सब ढल गए !   

4. 
साथ 
******* 
हम समझते थे   
वक़्त पर साथ मेरे   
सब खड़े होंगे   
ताल्लुकात के रंग   
वक़्त ने बहुत पहले ही   
दिखा दिए !   

5. 
हिसाब 
******* 
तमाम उम्र हिसाब लगाते रहे   
क्या पाया क्या न पाया   
फ़ेहरिस्त तो बनी बड़ी लम्बी   
मगर सिर्फ़ कुछ न पाने की !   

6. 
गुजर गया 
******* 
सूखे पत्तों-सा सूखा मन   
बिखरा पड़ा, मानो पतझड़   
आस की ऊँगली थामे   
गुज़र गया, तमाम जीवन !   

7. 
परिहास 
******* 
संबंधों की पृष्ठभूमि पर   
भाव लिखूँ   
अभाव लिखूँ   
प्रभाव लिखूँ   
या तहस-नहस होते नातों पर   
परिहास लिखूँ !   

8. 
माँग 
******* 
हर लम्हा वक़्त ने है छीना   
सारी उम्र पे कब्ज़ा है   
अब कुछ भी तो शेष नहीं   
वक़्त अभी भी माँग रहा   
मैं मानूँगी आदेश नहीं   
अब कुछ भी तो शेष नहीं !   

9. 
रूह 
******* 
एक रूह की तलाश में   
कितने ही पड़ाव मिले   
पर कहीं ठौर न मिला   
कहीं ठहराव न मिला   
मन का सफ़र ख़त्म नही होता   
रूहों का नगर जाने कहाँ होता है ?   
रूहें शायद सिर्फ़ आसमान में बसती हैं !   

10. 
घात 
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सपने और साँसें   
दोनों नजरबंद हैं   
न जाने कौन   
घात लगाए बैठा हो   
जरा-सी चूक   
और सब ख़त्म ! 

- जेन्नी शबनम (20. 8. 2020) 
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गुरुवार, 13 अगस्त 2020

681. विदा

विदा 

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उम्र के बेहिसाब लम्हे   
जाने कैसे ख़र्च हो गए    
बदले में मिले ज़िन्दगी के छल   
एकांत के अनेकों कठोर पल   
जब न सुनने वाला कोई, न समझाने वाला कोई   
न पास आने वाला, न दूर जाने वाला कोई   
न संगी न साथी, न रिश्ते न रिश्तेदारी   
अपनी नीरवता में ख़ुद के साथ   
सिमटे हुए दोनों खुले हाथ   
और यूँ धीरे-धीरे   
विदा हो रही है ज़िन्दगी।   

- जेन्नी शबनम (12. 8. 2020) 
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रविवार, 26 जुलाई 2020

680. पहचाना जाएगा

पहचाना जाएगा

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वक़्त मुट्ठी से फिसलता, जीवन कैसे पहचाना जाएगा   
कौन किसको देखे यहाँ, कोई कैसे पहचाना जाएगा!   

ज़मीर कब कहाँ मरा, ये अब दिखाएगा कौन भला   
हर शीशे में कालिख पुता, चेहरा कैसे पहचाना जाएगा!   

कौन किसका है सगा, भला यह कौन किसको बताएगा   
आईने में अक्स जब, ख़ुद का ही न पहचाना जाएगा!   

टुकड़ों-टुकड़ों में ज़िन्दगी बीती, किस्त-किस्त में साँसें   
पुरसुकून जीवन भला, अब कैसे ये पहचाना जाएगा!   

रूठ गए सब अपने-पराए, हर ठोकर याद दिलाएगी   
अपने पराए का भेद अब, 'शब' से न पहचाना जाएगा! 

- जेन्नी शबनम (26. 7. 2020) 
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सोमवार, 20 जुलाई 2020

679. चिड़िया फूल या तितली होती (चोका - 13)

चिड़िया फूल या तितली होती 

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अक्सर पूछा   
खुद से ही सवाल   
जिसका हल   
नहीं किसी के पास,   
मैं ऐसी क्यों हूँ ?   
मैं चिड़िया क्यों नहीं   
या कोई फूल   
या तितली ही होती,   
यदि होती तो   
रंग-बिरंगे होते   
मेरे भी रूप   
सबको मैं लुभाती   
हवा के संग   
डाली-डाली फिरती   
खूब खिलती   
उड़ती औ नाचती,   
मन में द्वेष   
खुद पे अहंकार   
कड़वी बोली   
इन सबसे दूर   
सदा रहती   
प्रकृति का सानिध्य   
मिलता मुझे   
बेख़ौफ़ मैं भी जीती   
कभी न रोती   
बेफ़िक्री से ज़िन्दगी   
खूब जीती   
हँसती ही रहती   
कभी न मुरझाती !

- जेन्नी शबनम (20. 7. 2020)
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बुधवार, 8 जुलाई 2020

678. इतनी-सी बात इतनी-सी फ़िक्र

इतनी-सी बात इतनी-सी फ़िक्र

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दो चार फ़िक्र हैं जीवन के   
मिले गर कोई राह, चले जाओ   
बेफ़िक्री लौटा लाओ   
कह तो दिया कि दूर जाओ   
निदान के लिए सपने न देखो   
राह पर बढ़ो, बढ़ते चले जाओ   
वहाँ तक जहाँ पृथ्वी का अंत है   
वहाँ तक जहाँ कोई दुष्ट है या संत है   
बस इंसान नहीं है, प्यार से कोई पहचान नहीं है   
या वहाँ जहाँ क्षितिज पर आकाश से मिलती है धरा   
या वहाँ जहाँ गुम हो जाए पहचान, न हो कोई अपना   
मत सोचो देस परदेस   
भूल जाओ सब तीज-त्योहार   
बिसरा दो सब प्यार-दुलार   
लौट न पाओ कभी   
मिल न पाओ अपनों से कभी   
यह पीर मन में बसा कर रखना   
पर हिम्मत कभी न हारना   
यायावर-सा न भटकना तुम   
दिग्भ्रमित न होना तुम   
अकारण और नहीं रोना तुम   
एक ठोस ठौर ढूँढ कर   
सपनों में हमको सजा लेना   
मन में लेकर अपनों की यादें   
पूरी करना बुनियादी जरूरतें   
आस तो रहेगी तुम्हें   
अपने उपवन की झलक पाने की   
कुटुम्बों संग जीवन बीताने की   
वंशबेल को देखने की   
प्रियतमा के संग-साथ की   
मिलन की किसी रात की   
पर समय की दरकार है   
तकदीर की यही पुकार है   
कोई उम्मीद नहीं कोई आस नहीं   
किसी पल पर कोई विश्वास नहीं   
रहा सहा सब पिछले जन्म का भाग्य है   
इस जनम का इतना ही इंतजाम है   
बाकी सब अगले जन्म का ख्वाब है   
निपट जाए जीवन-भँवर   
बस इतना ही हिसाब है   
चार दिन का जीवन   
दो जून की रोटी   
बदन पर दो टुक चीर   
फूस का अक्षत छप्पर   
बस इतनी-सी दरकार है   
बस इतनी-सी तो बात है।   

- जेन्नी शबनम (7. 7. 2020) 
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बुधवार, 1 जुलाई 2020

677. सँवरने नहीं देती

सँवरने नहीं देती

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दर्द की ज़ुबान मीठी है बहकने नहीं देती   
लहू में डूबी है ज़िन्दगी सँवरने नहीं देती !   

इक रूह है जो जिस्म में तड़पती रहती है   
कमबख्त साँस हैं जो निकलने नहीं देती !   

मसला तो हल न हुआ बस चलते ही रहे   
थक गए पर ये ज़िन्दगी थमने नहीं देती !   

वक़्त के ताखे पे रखी रही उम्र की बाती   
किस्मत गुनहगार ज़िन्दगी जलने नहीं देती !   

अब रूसवाई क्या और भला किससे करना   
चाक-चाक दिल मगर आँसू बहने नहीं देती !   

मेरे वास्ते अपनों की भीड़ ने कजा को पुकारा   
शब से रूठी है कजा उसको मरने नहीं देती !   

- जेन्नी शबनम (1. 7. 2020) 
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शुक्रवार, 26 जून 2020

676. रीसेट

रीसेट

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हयात के लम्हात, दर्द में सने थे   
मेरे सारे दिन-रात, आँसू से बने थे   
नाकामियों, नादानियों और मायूसियों के तूफ़ान   
मन में लिए बैठे थे   
वक़्त से सुधारने की गुहार लगाते-लगाते   
बेज़ार जिए जा रहे थे   
हम थे पागल, जो माजी से प्यार किए जा रहे थे   
कल वक़्त ने कान में चुपके से कहा -   
सारे कल मिटा के, नए आज भर लो   
वक़्त अब भी बचा है, ज़िन्दगी को रीसेट कर लो   
जितनी बची है, उतनी ज़िन्दगी भरपूर जी लो   
दर्द को खा लो, आँसू को पी लो   
सारे कल मिटा के, नए आज भर लो   
वक़्त अब भी बचा है, ज़िन्दगी को रीसेट कर लो !   

- जेन्नी शबनम (26. 6. 2020) 
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मंगलवार, 23 जून 2020

675. ईनार

ईनार

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मन के किसी कोने में   
अब भी गूँजती हैं कुछ धुनें   
रस्सी का एक छोर पकड़   
छपाक से कूदती हुई बाल्टी   
ईनार पर लगी हुई चकरी से   
एक सुर में धीरे-धीरे ऊपर चढ़ती बाल्टी   
टन-टन करती बड़ी बाल्टी छोटी बाल्टी   
लोटा-कटोरा और बाल्टी-बटलोही   
सब करते रहते खूब बतकही   
दाँत माँजना बर्तन माँजना   
कपड़ा फींचना दुख-सुख गुनना   
ननद-भौजाई की हँसी ठिठोली   
सास-पतोह की नोक झोंक   
बाबा-दादी के आते ही   
घूँघट काढ़ करती हड़बड़ी   
चिल्ल-पों करते बच्चों का नहाना   
तुरहा-तुरहिन का आकर साँसे भरना   
प्यासे बटोही की अँजुरी में   
बाल्टी से पानी उड़ेल-उड़ेल पिलाना   
लोटा में पानी भरकर सूरज को अर्घ्य देना   
रोज-रोज वही दृश्य पर ईनार चहकता हर दिन   
भोर से साँझ प्यार लुटाता रुके बिन   
एक सामूहिक सहज जीवन   
समय के साथ बदला मन   
दुख-सुख का साथी ईनार, अब मर गया है   
चापाकल घर-घर आ गया है   
परिवर्तन जीवन का नियम है   
पर कुछ बदलाव टीस दे जाता है   
आज भी ईनार बहुत याद आता है। 

- जेन्नी शबनम (23. 6. 2020) 
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रविवार, 21 जून 2020

674. बोनसाई

बोनसाई 

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हज़ारों बोनसाई उग गए हैं   
जो छोटे-छोटे ख़्वाबों की पौध हैं 
ये पौधे अब दरख़्तों में तब्दील हो चुकें हैं 
ये सदा हरे भरे नहीं रहते 
मुरझा जाने को होते ही हैं 
कि रहम की ज़रा-सी बदली बरसती है 
वे ज़रा-ज़रा हरियाने लगते हैं 
फिर कुनमुना कर सब जीने लगते हैं   
वे अक्सर अपने बौनेपन का प्रश्न करते हैं   
आख़िर वे सामान्य क्यों न हुए, क्यों बोनसाई बन गए   
ये कैसा रहस्य है   
ये ऐसे दरख़्त क्यों हुए, जो किसी को छाँव नहीं दे सकते   
फलने-फूलने-जीने के लिए हज़ार मिन्नतें करते हैं   
फिर मौसम को तरस आता है   
वे ज़रा-सी धूप और पानी दे देते हैं 
आख़िर ऐसा क्यों है   
क्यों बिन माँगे मौसम उन्हें कुछ न देता   
क्यों लोग हँसते हैं उसके ठिगनेपन पर   
बोनसाई होना उनकी चाहत तो न थी   
सब तक़दीर के तमाशे हैं   
जो वे भुगतते हैं   
रोज़ मर-मर कर जीते है   
पर ख़्वाबों के ये बोनसाई 
कभी-कभी तन्हाई में हँसते भी हैं!   

- जेन्नी शबनम (21. 6. 2020) 
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मंगलवार, 16 जून 2020

673. ख़ाली हाथ जाना है

ख़ाली हाथ जाना है 

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ख़ाली हाथ हम आए थे   
ख़ाली हाथ ही जाना है !  

तन्हा-तन्हा रातें गुज़री   
तन्हा दिन भी बिताना है !  

समझ-समझ के समझे क्यों   
समझ से दिल कब माना है !  

कतरा-कतरा जीवन छूटा   
कतरा-कतरा सब पाना है !  

बूँद-बूँद बिखरा लहू   
बूँद-बूँद मिट आना है !  

झम-झम बरसी आँखें उसकी   
झम-झम जल ये चखाना है !  

'शब' को याद मत करो तुम   
उसका गया जमाना है !  

- जेन्नी शबनम (16. 6. 2020)
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मंगलवार, 9 जून 2020

672. आईना और परछाई

आईना और परछाई 

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आईना मेरा सखा   
जो मुझसे कभी झूठ नहीं बोलता   
परछाई मेरी सखी   
जो मेरा साथ कभी नहीं छोड़ती   
इन दोनों के साथ मैं   
जीवन के धूप-छाँव का खेल खेलती   
आईना मेरे आँसू पोछता   
बिना थके मुझे सदा हँसाता   
परछाई मेरे संग-संग घूमती   
अँधियारे से मैं जब-जब डरती   
मेरा हाथ पकड़ वो रोशनी में भागती   
हाँ ! यह अलग बात   
आजकल आईना मुझसे रूठा है   
मैं उससे मिलने नहीं जाती   
उसका सच मैं देखना नहीं चाहती   
आजकल मेरी परछाई मुझसे लड़ती है   
मैं अँधेरों से बाहर नहीं निकलती   
जाने क्यों रोशनी मुझे नहीं सुहाती।   
जानती हूँ, ये दोनों साथी   
मेरे हर वक्त के राज़दार हैं   
मेरा आईना मेरा मन   
मेरी परछाई मेरी साँसें   
ये कभी न छोड़ेंगे मेरा दामन । 

- जेन्नी शबनम (9. 6. 2020) 
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शुक्रवार, 5 जून 2020

671. फूलवारी

फूलवारी 

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जब भी मिलने जाती हूँ   
कसकर मेरी बाँहें पकड़, कहती है मुझसे -   
अब जो आई हो, तो यहीं रह जाओ   
याद करो, जब अपने नन्हे-नन्हे हाथों से   
तुमने रोपा था, हम सब को   
देखो कितनी खिली हुई है बगिया   
पर तुम्हारे बिना अच्छा नहीं लगता   
बहुत याद आती हो तुम   
शहर में न तो फूल है न फूलवारी   
रूक जाओ न यहीं पर   
बचपन के दिनों सी बौराई फिरना।  

- जेन्नी शबनम (5. 6. 2020) 
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मंगलवार, 2 जून 2020

670. रंग

रंग

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बेरंग जीवन बेनूर न हो   
कर्ज में माँग लायी मौसम से ढ़ेरों रंग   
लाल पीले हरे नीले नारंगी बैगनी जामुनी   
छोटी-छोटी पोटली में बड़े सलीके से लेकर आई   
और खुद पर उड़ेल कर ओढ़ लिया मैंने इंद्रधनुषी रंग   
अब चाहती हूँ   
रंगों का कर्ज चुकाने, मैं मौसम बन जाऊँ   
मैं रंगों की खेती करूँ और खूब सारे रंग मुफ़्त में बाँटूँ   
उन सभी को जिनके जीवन में मेरी ही तरह रंग नहीं है   
जिन्होंने न रोटी का रंग देखा न प्रेम का   
न जमीन का न आसमान का   
चाहती हूँ   
अपने-अपने शाख से बिछुड़े पेट की आग का रंग ढूँढते-ढूँढते   
बेरंग सपनों में जीने वाले   
अब रंगों से होली खेलें रंगों से ही दिवाली भी   
रंगों के सपने हों रंगों की ही हकीकत हो   
रंग रंग रंग !   
क़र्ज़ क़र्ज़ क़र्ज़ !   
ओह ! मौसम ! नहीं चुकाऊँगी उधारी   
कितना भी तगादा करो चाहे न निभाओ यारी   
तुम्हारी उधारी तब तक   
जब तक मैं मौसम न बन जाऊँ।   

- जेन्नी शबनम (2. 6. 2020) 
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सोमवार, 1 जून 2020

669. सीता की पीर

सीता की पीर 

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1. 
राह अगोरे  
शबरी-सा ये मन,  
कब आओगे?  

2. 
अहल्या बनी  
कोई राम न आया  
पाषाण रही।  

3. 
चीर-हरण,  
द्रौपदी का वो कृष्ण  
आता न अब।  

4. 
शुचि द्रौपदी  
पाँच वरों में बँटी,  
किसका दोष?  

5. 
कर्ण का दान  
कवच व कुंडल,  
कुंती बेकल।  

6. 
सीता है स्तब्ध  
राम का तिरस्कार  
भूमि की गोद।  

7. 
सीता की पीर  
माँ धरा ने समेटी  
दो फाँक हुई।  

8. 
स्पंदित धरा  
फटा धरा का सीना  
समाई सीता।  

9. 
त्रिदेव शिशु,  
सती अनसूइया  
आखिर हारे।  

10. 
सती का कुंड  
अब भी प्रज्वलित,  
कोई न शिव।  

- जेन्नी शबनम (31. 5. 2020)
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शनिवार, 30 मई 2020

668. नीरवता

नीरवता 

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मन के भीतर   
एक विशाल जंगल बस गया है 
जहाँ मेरे शब्द चीखते चिल्लाते हैं 
ऊँचे वृक्षों-सा मेरा अस्तित्व 
थककर एक छाँव ढूँढता है 
लेकिन छाँव कहीं नहीं है   
मैंने ख़ुद वृक्षों का क़त्ल किया था,   
इस बीहड़ जंगल से अब मन डरने लगा है   
ढूँढती हूँ पुकारती हूँ   
पर कहीं कोई नहीं है   
मैंने इस जंगल में आने का न्योता   
कभी किसी को दिया ही नहीं था,   
मन में ये कैसा कोलाहल ठहर गया है?   
जानवरों के जमावड़े का ऊधम है या मेरे सपने टकरा रहे हैं?   
कभी मैंने अपनी सभी ख़्वाहिशों को   
ताक़त के रूप में बाँटकर, आपस में लड़ा दिया था   
और जो बच गए थे, उन्हें आग में जला डाला   
अब तो सब लुप्त हो चुके हैं   
मगर शोर है कि थमता ही नहीं,   
मन का यह जंगल, न आग लगने से जलता है   
न आँधियों में उजड़ता है   
नीरवता व्याप्त है, जंगल थरथरा रहा है   
अब कयामत आने को है।  

- जेन्नी शबनम (30. 5. 2020)
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सोमवार, 25 मई 2020

667. मंत्र

मंत्र

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अपनी पीर छुपाकर जीना   
मीठे कह के आँसू पीना   
ये दस्तूर निभाऊँ कैसे   
जिस्म है घायल छलनी सीना   
रिश्ते नाते अब निभते कहाँ   
शिकवे शिकायत किससे भला   
गली चौबारे खुद में सिमटे   
दरख़्त भी हुए टुकड़े-टुकड़े   
संवेदनाओं की बली चढ़ाकर   
मतलबपरस्त हो गई दुनिया   
खिदमत में मिट जाओ भी गर   
किस्मत सोई कहेगी दुनिया   
साथ नहीं कोई ब्रह्म बाबा   
पीर-पैगम्बर का नहीं सहारा   
पीर पराई समझे कब कोई   
मर-मर कर जीना छोड़े हर कोई   
खतम न हो ताल्लुकात सारा   
जीने का यह मंत्र दोहराना।  

- जेन्नी शबनम (25. 5. 2020) 
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शुक्रवार, 22 मई 2020

666. स्वाद / बेस्वाद (10 क्षणिकाएँ)

स्वाद / बेस्वाद

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1. 
तेरे इश्क का स्वाद   
मीठे पानी के झरने-सा   
प्यास से तड़पते राही को   
इक घूँट भर भी मिल जाए   
पीर-पैगंबर की दुआ   
कुबूल हो जाए।   

2. 
एक घूँट इश्क   
और तेरा स्वाद   
अस्थि-मज्जा में जा घुला   
जिसके बिना   
जीवन नामुमकिन।   

3. 
उस रोज़ नथुनों में समा गई   
रजनीगंधा की खुश्बू   
जो तेरे बदन को छूती हुई   
मुझसे आकर लिपट गई थी   
और मेरी साँसों में तू ठहर गया था   
रजनीगंधा की खुश्बू अब भी आती है   
और मुझे छूकर गुजर जाती है   
पर कोई और खुश्बू अब मुझे भाती नहीं   
तेरा स्वाद मेरे मन ने   
एक बार चख जो लिया है।   

4. 
तेरी बातें तेरी मर्जी   
तेरी दीद तेरी मनमर्जी   
तेरी मर्जी तेरी मनमर्जी   
इसमें कहाँ मेरी मर्जी   
तेरी मर्जी का स्वाद   
बड़ा ही तीखा   
भा गई मुझको तेरी मर्जी   
अब तेरी मर्जी मेरी मर्जी।   

5. 
जीवन का स्वाद   
मैंने घूँट-घूँट पीकर लिया   
एक घूँट तेरे वास्ते बचा कर रखा है   
गर मिलो कभी तुम   
वह घूँट तुम पी लेना   
मेरी ज़िन्दगी की कड़वाहट   
तुम भी जी लेना।   

6. 
कुछ खट्टी कुछ मीठी   
स्वाद से भरी मेरी ज़िन्दगी   
थोड़ी नरम थोड़ी गरम   
गुलगुले-सी मेरी ज़िन्दगी   
आओ थोड़ा तुम भी चख लो   
एक और स्वाद का मजा ले लो।   

7. 
तेरा स्वाद बदन में घुल गया था   
जब इश्क का जाम पिया मैंने   
अब सब बेस्वाद हो गया है   
जब से तेरा इश्क   
कहीं और आबाद हुआ है।   

8. 
झामे से खुरच-खुरच कर   
पूरे बदन को छील दिया है   
कि रिसते लहू के साथ   
तेरे इश्क का स्वाद बह जाए।   

9. 
तेरे इश्क का स्वाद   
कितना कसैला है   
जब-जब तेरी याद आई   
उबकाई-सी आती है।   

10. 
कैसी कसक थी   
झिझक में जीती रही   
कहने की बेताबी   
मगर कभी कह न सकी   
दर्दे ए एहसास नहीं रेशमी   
मेरे अल्फ़ाज़ हो गए कागजी   
जाने किस चूल्हे पर पकी किस्मत   
जो ज़िन्दगी का स्वाद कसैला हुआ।   

- जेन्नी शबनम (22. 5. 2020) 
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बुधवार, 20 मई 2020

665. कहा-सुनी जारी है

कहा-सुनी जारी है

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पल-पल समय के साथ, कहा-सुनी जारी है   
वो कहता रहता है, मैं सुनती रहती हूँ,   
अरेब-फरेब, जो उसका मन, बोलता रहता है   
कान में पिघलता सीसा, उड़ेलता रहता है   
मैं हूंकार भरती रहती हूँ, मुस्कुराती रहती हूँ   
अपना अपनापा दिखाती रहती हूँ,   
नहीं याद क्या-क्या सुनती रहती हूँ   
नहीं याद क्या-क्या बिसराती जाती हूँ   
जितना मेरा मन किया, उतना ही सुनती हूँ   
बहुत कुछ अनसुना करती हूँ,   
न उसे पता कि मैंने क्या-क्या न सुना   
न मुझे पता कि उसने मुझे कितना-कितना धिक्कारा   
कितना-कितना दुत्कारा,   
फिर भी सब कहते हैं   
हमारे बीच बड़ा प्यारा संबंध है   
न हम लड़ते-झगड़ते दिखते हैं   
न कभी कहा-सुनी होती है   
बहुत प्यार से हम जीते हैं,   
यह हर कोई जानता है   
कहासुनी में दोनों को बोलना पड़ता है   
अपना-अपना कहना होता है   
दूसरों का सुनना होता है,   
पर मेरे और समय के बीच   
अजब-सा नाता है   
वो कहता जाता है, मै सुनती जाती हूँ   
और कहा-सुनी जारी रहती है,   
कहा-सुनी जारी है। 

 - जेन्नी शबनम (20. 5. 2020) 
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शुक्रवार, 15 मई 2020

664. लॉकडाउन

लॉकडाउन

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लॉकडाउन से जब शहर हुए हैं वीरान   
बढ़ चुकी है मन के लॉकडाउन की भी मियाद   
अनजाने भय से मन वैसे ही भयभीत रहता है 
जैसे आज महामारी से पूरी दुनिया डरी हुई है   
मन को हजारों सवाल बेहिसाब तंग करते हैं   
जैसे टी वी पर चीखते खबरनवीसों के कुतर्क असहनीय लगते हैं   
कितना कुछ बदल दिया इस नन्हे-से विषाणु ने   
मानव को उसकी औक़ात बता दी, इस अनजान शत्रु ने,   
आज ताकत के भूखे नरभक्षी, अपने बनाए गढ्ढे में दफ़न हो रहे हैं   
भात-छत के मसले, वोटों की गिनती में जुट रहे हैं   
सैकड़ों कोस चल-चल कर, कोई बेदम हो टूट रहा है   
बदहवास लोगों के ज़ख्मों पर, कोई अपनी रोटी सेंक रहा है   
पेट-पाँव झुलस रहे हैं, आत्माएँ सड़कों पर बिलख रही हैं   
रूह कँपाती खबरें हैं, पर अधिपतियों को व्याकुल नहीं कर रही हैं   
अफ़वाहों के शोर में, घर-घर पक रहे हैं तोहमतों के पकवान   
दिल दिमाग दोनों त्रस्त हैं, चारों तरफ है त्राहि-त्राहि कोहराम,   
मन की धारणाएँ लगातार चहलक़दमी कर रही हैं   
मंदिर-मस्ज़िद के देवता लम्बी छुट्टी पर विश्राम कर रहे हैं   
इस लॉकडाउन में मन को सुकून देती पक्षियों की चहचहाहट है   
जो सदियों से दब गई थी मानव की चिल्ला-चिल्ली में   
खुला-खुला आसमान, खिली-खिली धरती है   
सन्न-सन्न दौड़ती हवा की लहरें हैं   
आकाश को पी-पीकर ये नदियाँ नीली हो गई हैं   
संवेदनाएँ चौक-चौराहों पर भूखे का पेट भर रही हैं   
ढेरों ख़ुदा आसमान से धरती पर उतर आए हैं अस्पतालों में   
ख़ाकी अपने स्वभाव के विपरीत मानवीय हो रही है   
सालों से बंद घर फिर से चहक रहा है   
अपनी-अपनी माटी का नशा नसों में बहक रहा है,   
बहुत कुछ भला-भला-सा है, फिर भी मन बुझा-बुझा-सा है   
आँखें सब देख रहीं हैं, पर मन अपनी ही परछाइयों से घबरा रहा है   
आसमाँ में कहकशाँ हँस रही है, पर मन है कि अँधेरों से निकलता नहीं   
जाने यह उदासियों का मौसम कभी जाएगा कि नहीं,   
तय है, शहर का लॉकडाउन टूटेगा   
साथ ही लौटेंगी बेकाबू भीड़, बदहवास चीखें   
लौटेगा प्रदूषण, आसमान फिर ओझल होगा   
फिर से कैद होंगी पशु-पक्षियों की जमातें,   
हाँ, लॉकडाउन तो टूटेगा, पर अब नहीं लौटेगी पुरानी बहार   
नहीं लौटेंगे वे जिन्होंने खो दिया अपना संसार   
सन्नाटों के शहर में अब सब कुछ बदल जाएगा   
शहर का सारा तिलिस्म मिट जाएगा   
जीने का हर तरीका बदल जाएगा   
रिश्ते, नाते, प्रेम, मोहब्बत का सलीका बदल जाएगा,   
यह लॉकडाउन बहुत-बहुत बुरा है   
पर थोड़ा-थोड़ा अच्छा है   
यह भाग-दौड़ से कुछ दिन आराम दे रहा है   
चिन्ताओं को ज़रा-सा विश्राम दे रहा है,   
यह समय कुदरत के स्कूल का एक पाठ्यक्रम है   
जीवन और संवेदनाओं को समझने का पाठ पढ़ा रहा है!   

- जेन्नी शबनम (15. 5. 2020) 
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बुधवार, 13 मई 2020

663. अलविदा

अलविदा  

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तपती रेत पर  
पाँव के नहीं, जलते पाँव के ज़ख्म के निशान हैं  
मंजिल दूर, बहुत दूर दिख रही है  
पर पाँव थक चुके हैं, पाँव और मन जल चुके हैं  
हौसला देने वाला कोई नहीं  
साँसें सँभालने वाला कोई नहीं  
यह तय है ज़िन्दगी वहाँ तक नहीं पहुँचेगी  
जहाँ पाँव-पाँव चले थे, जहाँ सपनों को पंख लगे थे  
जहाँ से ज़िन्दगी को सींचने, बहुत दूर निकल पड़े थे  
आह! अब और सहन नहीं होता  
तलवे ही नहीं आँतें भी जल गई हैं  
जल की एक बूँद भी नहीं  
जिससे अंतिम क्षण में तालू तर हो सके  
उम्मीद की अंतिम तीली बुझने को है  
आखिरी साँस अब थमने को है  
सलाम उन सबको जिनके पाँव ने साथ दिया  
उन सपनों, उन अपनों, उन यादों को अलविदा। 

- जेन्नी शबनम (12. 5. 2020) 
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शुक्रवार, 8 मई 2020

662. अनुभूतियों का सफर

अनुभूतियों का सफर

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अनुभूतियों के सफ़र में   
संभावनाओं को ज़मीन न मिली   
हताश हूँ, परेशान हूँ   
मगर हार की स्वीकृति मन को नहीं सुहाती   
फिर-फिर उगने और उड़ने के लिए   
पुरज़ोर कोशिश करती हूँ   
कड़वे कसैले से कुछ अल्फ़ाज़ मन को बेधते हैं   
फिर-फिर जीने की तमन्ना में   
हौसलों की बाग़वानी करती हूँ   
सँभलने और स्थिरता की मियाद   
पूरी नहीं होती, कि सब ध्वस्त हो जाता है।   
जाने कौन सा गुनाह था, या किसी जन्म का शाप   
अनुभूतियों के सफ़र में महज़ कुछ फूल मिले   
शेष काँटें ही काँटें   
जो वक़्त बेवक्त चुभते रहे, मन को बेधते रहे।   
पर अब, संभावनाओं को जिलाना होगा   
उसे ज़मीन में उगाना होगा   
थके हों क़दम मगर चलना होगा   
आसमान छिन जाए मगर   
ज़मीन को पकड़ना होगा।   
जीवन की अनुभूतियाँ संबल है और   
जीवन की संभावना भी।  

- जेन्नी शबनम (7. 5. 2020) 
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मंगलवार, 5 मई 2020

661. सरेआम मिलना (तुकबंदी)

सरेआम मिलना 

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अकेले मिलना अब हो नहीं सकता  
जब भी मिलना है सरेआम मिलना   

मेरे रंजों ग़म उन्हें भाते नहीं
फिर क्या मिलना और क्योंकर मिलना   

नहीं होती है रुतबे से यारी
इनसे दूरी भली फ़िज़ूल मिलना   

कब मिटते हैं नाते उम्र भर के
कभी आना अगर तो जीभर मिलना।   

काश! ऐसा मिलना कभी हो जाए
ख़ुद से मिलना और ख़ुदा से मिलना।   

ऐसा मिलना कभी तो हम सीखेंगे  
रूह से मिलना और दिल से मिलना   

ऐसा हुनर अब भी नहीं हम सीख पाए  
जो चुभाए नश्तर उससे अदब से मिलना   

रोज़ गुम होते रहे भीड़ में हम  
आसान नहीं होता ख़ुद से मिलना।   

जीस्त की यादें अब सोने नहीं देती  
यूँ जाग-जाग कर किससे मिलना?   

सच्ची बातें हैं चुभती बर्छी-सी  
'शब' तुम चुप रहना किसी से न मिलना।  

- जेन्नी शबनम (5. 5. 2020) 

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शुक्रवार, 1 मई 2020

660. गँवारू लड़की

गँवारू लड़की

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एक गाँव की लड़की   
शहर में पनाह ढूँढती रही   
अपना नाम बता के अपना पता पूछती रही   
अपने हिस्से के कुछ किस्से लेकर   
सबके मन के द्वार खटखटाती थी   
थोड़ा अपनापन माँगती थी, मुट्ठी भर जमीन चाहती थी  
कभी किसी ने उसकी परवाह न की   
पर अब वह खुद भी बेपरवाह हो चुकी है   
न घर मिला न मन मिला न मान मिला   
न ठौर न ठिकाना मिला   
सबने कहा वह गँवारू है किसी काम की नहीं   
न शहर के लायक न किसी घर के लायक   
पर अब वह उदास नहीं रहती, अब उसकी चुप्पी टूट चुकी है   
वह पलायन न करेगी, ढ़ीठ होकर बढ़ेगी   
वह देसी बोली बोलती है, उसे गर्व है अपनी बोली पर   
वह गाँव की गँवार है, उसे गर्व है अपने गँवारूपन पर   
कमसे कम उसने सोंधी मिट्टी को तो चूमा है   
अपनी बोली में सपनों को पाला है   
शहर आ के भी जो गाँव से लाई थी, सब सँभाला है   
पेड़ पौधों को दुलराया है   
वह हाथ से खाती है, तो अन्न को पहचानती है   
धड़कनों से बात करती है, तो मन को पहचानती है   
खेतों डरेरों पर कूदती फाँदती, पशु पक्षियों से यारी निभाई है   
वो सारे रिश्ते जी के शहर आई है   
हाँ वह शहरी नहीं शहर के लिए पराई है   
पर वो बहुत प्यारे गाँव से आई है   
शायद इसलिए वह अबतक कंक्रीट पहन नहीं पाई   
मोम को ओढ़ के बैठी है, पत्थर बन नहीं पाई   
इस जंगल में खो नहीं पाई   
अच्छा है शहर की हो नहीं पाई   
वह गाँव की लड़की गँवारू है   
मगर अब शहर की नब्ज और शहरियों का शातिरपना पहचान गई है   
खुद को समझने लगी है शहर को जान गई है।   

- जेन्नी शबनम (1. 5. 2020)  
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सोमवार, 27 अप्रैल 2020

659. निपटाया जाएगा

निपटाया जाएगा  

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विरोध के स्वर को कुछ यूँ दबाया जाएगा  
होश में जो हो उसे पागल बताया जाएगा !  

काट छाँट कर बाँट-बाँट कर यह संसार चलेगा  
रोटी और बेटी का मसला यूँ निपटाया जाएगा !  

क्रूरता और पाश्विकता कई खेमों में बँटे  
चौक चौराहों पर टँगा जिस्म दिखाया जाएगा !  

हदों की परवाह किसे बेहद से हम सब गुज़रे  
मुट्ठियों का इंक्लाब अब बेदम कराया जाएगा !  

नहीं परवाह सबको ज़माने के बदख्याली की  
नफ़रतों में अमन का पौधा खिलाया जाएगा !  

बाट जोहकर समय जब हथेलियों से फिसल जाएगा  
बद्दुआएँ 'शब' को देकर फिर ख़ूब पछताया जाएगा ! 

- जेन्नी शबनम (27. 4. 2020) 

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रविवार, 26 अप्रैल 2020

658. झरोखा

झरोखा

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समय का यह दौर   
जीवन की अहमियत, जीवन की ज़रुरत सिखा रहा है,   
मुश्किल के इस रंगमहल में   
आशाओं का एक झरोखा, जिसे पत्थर का महल बनाने में   
सदियों पहले बंद किया था हमने   
अब खोलने का वक़्त आ गया है,   
ताकि एक बार फिर लौट सके, सपनों का सुन्दर संसार   
सूरज की किरणों की बौछार   
बारिश की बूंदों की फुहार,   
हो सके चाँदनी की आवाजाही   
आ सके हवाएँ झूमती-नाचती-गाती,   
हम ताक सकें आसमान में चाँद-तारों की बैठक   
आकृतियाँ गढ़ती बादलों की जमात   
पक्षियों का कलरव   
रास्ते से गुजरता इंसानी रेला   
हमारी ज़रूरतों के सामानों का ठेला,   
हम सुन सकें हवाओं का नशीला राग   
बादलों की गड़गड़ाहट   
धूल मिट्टी की थाप   
प्रार्थना की गुहार   
पड़ोसी की पुकार   
रँभाते मवेशियों की तान   
गोधूलि में पशुओं के खुरों और घंटियों की धुन,   
हम मिला सकें कोयल के साथ कूउउ-कूउउ   
हम चिढ़ा सके कौओं को काँव-काँव,   
हम कर सकें कोई ऐसी चित्रकारी   
जिसमें खूबसूरत नीला आसमान, गेरुआ रंग धारण कर लेता है   
पौधों की हरियाली में रंग-बिरंगे फूल खिलते हैं   
कोई बच्चा लाड़ दुलार से माँ की गोद में जा सिमटता है,   
हम बसा सकें सपनों के बड़े-बड़े चौबारे पर   
कोई अचम्भित करने वाली कामनाएँ,   
ओह! कितना कुछ था जिसे खोया है हमने   
मन के झरोखों को बंदकर   
कृत्रिमता से लिपटकर   
पत्थर के आशियाने में सिमटकर, 
अब समझ आ गया है   
जीवन की क्षणभंगुरता, कायनात की शिक्षा,   
खोल ही दो सबको   
आने दो झरोखे से वह सब   
जिसे हमने ख़ुद ही गँवाया था,   
खोल दो झरोखा।   

- जेन्नी शबनम (26. 4. 2020) 
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सोमवार, 20 अप्रैल 2020

657. 10 क्षणिकाएँ

1. 
सच  
***  

न कोई कल था  
न कोई आज है  
जो पाया, सब खोया  
जीवन का यही सच है।  
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2. 
हुनर  
***  

छोटी-छोटी डिब्बियों में भर कर  
सीलबंद कर दिए मैंने अपने सारे हुनर  
यूँ इसके पहले भी बेशऊर कहलाती थी  
पर अब संतोष है  
मेरा सारा हुनर ओझल है सबसे  
अब उसका अपमान नहीं होता।  
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3. 
संवेदना  
***  

संवेदनाओं को  
ज़मीन नहीं मिलती  
आकाश चाहिए नहीं  
फिर क्या?  
यूँ ही घुट-घुटकर मर जाए !  
जल सूखता जाता है, नदी उतरती है  
संवेदनशून्यता यूँ ही तो बढ़ती है।  
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4. 
काश !  
***  

ढ़ेरों काश इकठ्ठा हो गए हैं  
पर मन है कि ठहरता नहीं  
काश! यह किया होता, काश! वह कर पाते  
इकत्रित काश के साथ, भविष्य के और काश न जुड़े  
मन को समझना होगा  
मन को रुकना होगा या मरना होगा  
या फिर सन्यस्त होना होगा।  
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5. 
नींद  
***  

दिल को जलाया है  
दिल मेरा खाली है  
कोई नहीं जो सुकून दे  
मेरी तल्खियों को नींद दे  
आ जाओ ऐ फरिश्ते  
दिल में एक ख्वाब उगा दो  
रूह को जरा सा चैन दे दो  
आज बस सुला दो।  
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6. 
करवट  
***  

यादों के बिस्तर पर करवट ही करवट है  
हर करवट में टूटते दिल की सलवट है  
सलवटें तो मिट जाएँगी  
करवटें नींद में समा जाएगी  
पर यादें?  
कितने फूल कितने शूल  
हँसता दिल जख्मी सीना  
क्या ये यादों से दूर जा पाएँगे?  
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7. 
शर्त  
***  

बेशर्त ज़िन्दगी चलती नहीं  
शर्तें मन को फबती नहीं  
इसी उधेड़बुन में ठहरी रही  
करूँ तो अब मैं क्या करूँ  
शर्तें मानूँ या ज़िन्दगी मिटा लूँ  
अपनी बचाऊँ कि साँसें सँभालूँ।  
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8. 
भूल जाते हैं  
***  

चलो आज सारी रात जागते हैं  
आधा आसमान तुम्हारा आधा मेरा  
तुम तारे गिनो  
हम आधे आसमान में  
चाँद को सजाते हैं  
दिन भी निकलेगा भूल जाते हैं।  
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9. 
मुबारक  
***  

अँधेरों का सैलाब बढ़ता जा रहा है  
रोशनी का एक तिनका भी नहीं, सब डूब रहा है  
हाथ थामने को कुछ नहीं सूझ रहा है  
सूरज ने अँधेरों को थामने से मना कर दिया है  
वह रोशनी भेजने को तैयार नहीं है  
मेरे लिए कुछ भी न इस पार है न उस पार है  
उसने कहा - तुम्हें अँधेरे पसंद थे न  
लो, तुम्हें अँधेरे मुबारक।  
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10. 
मेरा घर  
*******  

रात के सीने में  
हजारों चमकते कोने हैं  
पर वहाँ एक महफूज़ कोना भी है  
जहाँ सबका प्रवेश वर्जित है  
वहाँ अँधेरा ही अँधेरा है  
बस वहीं, घर मेरा है।  
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- जेन्नी शबनम (20. 4. 2020)  
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गुरुवार, 9 अप्रैल 2020

656. फूल यूँ खिले (10 हाइकु)

फूल यूँ खिले 
(10 हाइकु) 

*******  

1.  
फूल यूँ खिले,  
गलबहियाँ डाले  
बैठे हों बच्चे !  

2.  
अम्बर रोया,  
ज्यों बच्चे से छिना  
प्यारा खिलौना !  

3.  
सूरज ने की  
किरणों की बिदाई  
शाम जो आई !  

4.  
फसलें हँसी,  
ज्यों धरा ने पहना  
ढ़ेरों गहना !  

5.  
नाम तुम्हारा  
मन की रेत पर  
गहरा लिखा !  

6.  
देख गगन  
चिहुँकती है धरा  
हो कोई सगा !  

7.  
रूठा है सूर्य  
कैकेयी-सा, जा बैठा  
कोप-भवन !  

8.  
मन झरना  
कल-कल बहता  
पा के अपना !  

9.  
मिश्री-सी बोली  
बहुत ही मँहगी,  
ताले में बंद !  

10.  
चुभता रहा  
खुरदरा-सा रिश्ता  
फिर भी जिया !  

- जेन्नी शबनम (27. 1. 2020)  
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बुधवार, 8 अप्रैल 2020

655. 10 क्षणिकाएँ

10 क्षणिकाएँ 

*******  

1. 
परत
***  
मेरे मौसम में अब कोई नहीं  
न मेरे मिजाज में कोई शामिल है  
मेरे मन पर जो एक नरम परत लिपटा था  
समय की ताप से पककर  
वह अब लोहे का हो गया है।  
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2.
यारी
***  
फूल तो सबको प्रिय, मैंने काँटों से यारी की  
इस यारी में लाचारी थी, मेरी नहीं मनमानी थी  
नसीब का लेखा जोखा है, सब कुदरत का धोखा है  
यह किस्मत की साज़िश है, नहीं कोई गुंजाइश है  
काँटों की कलम से चाक-चाक, सीना मेरा छलनी है  
दर्द भले पुराना है, लेकिन मेरी कथा बहुत नयी है।  
____________________________________  

3.  
ज़ख्म  
***  
काँटों ने चुभाकर, जब भी ज़ख्म दिए  
एक संतोष-सा मन में ठहर गया  
काँटों ने जख्म दिए हैं, तन छलनी हुआ तो क्या हुआ  
गर फूलों ने जख्म दिया होता, तो मन छलनी होता  
घाव तो भर जाएँगे  
मन तो साबुत रहेगा।
__________________________

4.  
पुल  
***  
ढेरों इल्जामों की तरह एक और  
ढेरों कटु वचनों की तरह एक और  
फ़र्क नहीं पड़ता अब दुर्भावनाओं से  
न ही असर होता है, इल्जामों की इन गिनतियों से  
वह जो एक पुल था, हमारे दरम्यान  
उसे वक्त ने ढ़हा दिया है।  
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5.  
चेहरा  
***  
चेहरे तो कई ओढ़े कई उतारे  
कब कौन पहना अब याद नहीं  
सबसे सच्चा वाला चेहरा  
जो गुम हो चुका है, इन चेहरों की भीड़ में  
अब कभी नहीं पहन पाऊँगी  
पर एक टीस तो उठेगी  
जब-जब आईना निहारूँगी।  
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6.  
बेजान सड़क  
***  
बेजान सड़क में जैसे जान आ जाती है
और मेरे पाँव में पहिया पहना देती है
फिर मुझे पहुँचा आती है वहाँ-वहाँ
जहाँ भीड़ में मैं अक्सर गुम हो जाती हूँ
फिर कोई अनजाना हाथ मुझे थाम लेता है
मगर कुछ कदम के फ़ासले पर चलता है
सड़क को सब पता है
कहाँ मेरा सुकून है, कहाँ मेरी मंज़िल
और कहाँ थामने वाले हाथ।  
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7.  
समय चक्र  
***  
समय चक्र और जीवन चक्र  
दोनों घूम रहे हैं  
उन्हें रोकने की कोशिशों में  
मेरे दोनों हाथ छिल चुके हैं  
मैं उन्हें न रोक पाई न साथ चल पाई  
सदा नाकाम रही  
उसी तरह जिस तरह  
खुद को अपने साथ रखने में नाकाम होती हूँ  
मुझे खुद नहीं पता कि मैं कहाँ होती हूँ।
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8.  
तस्वीर  
***  
काश कि अतीत विस्मृत हो जाए  
ज़ेहन में तस्वीर कुछ ताज़ी आ जाए  
दर्द की ढ़ेरों तहरीर और रिसते ज़ख़्मों के धब्बे हैं  
रिश्तों की ग़ुलामी और अनजीए पहलू की सरगोशी है  
सब बिसरा कर नई तस्वीर बसाना चाहती हूँ  
कुछ नए फूल खिलाना चाहती हूँ  
एक नई ज़िन्दगी जीना चाहती हूँ।  
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9.  
जुर्रत  
***  
लुंज पुंज से वक्त में, जिंदगी की अफरा तफरी में
इश्क करने की मोहलत मिल गई
समय संजीदा हुआ, पूछा - ऐसी जुर्रत क्यों की?
अब इसका क्या जवाब
जुर्रत तो हो गई
अब हो गई तो हो गई।  
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10.
दवा-दुआ  
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उम्र के इस दौर में, तन्हाइयों के इस ठौर में  
न दवा काम आती है न दुआ काम आती है  
बस किसी अपने की यादें साथ रह जाती हैं  
यूँ सच है खोखले रिश्तों के बेजान शहर में  
कौन किसके वास्ते दुआ करे, करे तो क्यों करे  
कोई किसी को अपना मान ले  
आख़िरी पलों में बस इतना ही काफी है।  
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- जेन्नी शबनम (8. 4. 2020)  

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रविवार, 5 अप्रैल 2020

654. मन का दीया (दीया पर 5 हाइकु)

मन का दीया  
(दीया पर 5 हाइकु)

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1.  
आस्था का दीया  
बुझने मत देना  
ख़ुद के प्रति !  

2. 
देता सन्देश  
जल-जल के दीया -  
रोशनी देना !  

3.  
मन का दीया  
जल ही नहीं पाता  
किसी आग से !  

4.  
नन्हा दीपक  
बिन थके जलता  
हिम्मत देता !  

5.  
दीपक जला  
मन खिलखिलाया  
उजास फैला !  

- जेन्नी शबनम (5. 4. 2020)

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