शनिवार, 17 नवंबर 2018

593. लौट जाऊँगी...

लौट जाऊँगी...   

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कब कहाँ खो आई ख़ुद को   
कब से तलाश रही हूँ ख़ुद को   
बात-बात पर कभी रूठती थी   
अब रूठूँ तो मनाएगा कौन   
बार-बार पुकारेगा कौन   
माँ की पुकार में दुलार का नाम   
अब भी आँखों में ला देता नमी   
ठहर गई है मन में कुछ कमी,   
अब तो यूँ जैसे मैं बेनाम हो गई   
अपने रिश्तों के परवान चढ़ गई   
कोई पुकारे तो यूँ महसूस होता है   
गर्म सीसे का ग़ुब्बारा ज़ोर से मारा है   
कभी मेरी हँसी और ठहाके गूँजते थे   
अब ख़ुद से ही बतियाते मौसम बदलते हैं   
टी वी की शौक़ीन कृषि दर्शन तक देखती थी   
अब टी वी तो चलता है मगर क्या देखा याद नहीं   
वक्त ने एक-एक कर मुझसे मुझको छीन लिया   
ख़ुद को तलाशते-तलाशते वक्त यूँ ही गुज़र गया   
सारे शिकवे शिकायत गंगा से कह आती हूँ   
आँखों का पानी सिर्फ़ गंगा ही देखती है   
वह भी ढाढ़स बँधाने बदली को भेज देती है   
मेरी आँखों-सी बदली भी जब तब बरसती है   
वो मंज़र जाने कब आएगा   
वो सुखद पल जाने कब आएगा   
सारे नातों से घिरी हुई मैं   
एक झूठ के चादर से लिपटी मैं   
सबको ख़ुशामदीद कह जाऊँगी   
तन्हा सफ़र पर लौट जाऊँगी   
खो आई थी कभी ख़ुद को   
ख़ुद से मिल कर   
ख़ुद के साथ चली जाऊँगी   
ख़ुद के साथ लौट जाऊँगी। 

- जेन्नी शबनम (16. 11. 2018)   

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बुधवार, 7 नवंबर 2018

592. रंगीली दिवाली (दिवाली पर 10 हाइकु)

रंगीली दिवाली
(दिवाली पर 10 हाइकु)

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1.
छबीला दीया
ये रंगीली दिवाली
बिखेरे छटा। 

2.
साँझ के दीप
अँधेरे से लड़ते
वीर सिपाही।

3.
दीये नाचते
ये गुलाबी मौसम
खूब सुहाते। 

4.
झूमती धरा
अमावस की रात
खूब सुहाती। 

5.
दीप-शिखाएँ
जगमग चमके
दीप मालाएँ। 

6.
धूम धड़ाका
बेजुबान है डरा
चीखे पटाखा। 

7.
ज्योत फैलाता
नन्हा बना सूरज
दिवाली रात। 

8.
धरती ने ओढ़ी
जुगनुओं की चुन्नी
रात है खिली। 

9.
सत्य की जीत
दिवाली देती सीख
समझो जरा। 

10.
पेट है भूखा
गरीब की कुटिया,
कैसी दिवाली?

- जेन्ना शबनम (7. 11. 2018)

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