गुरुवार, 24 मार्च 2016

508. फगुआ (होली के 10 हाइकु)

फगुआ  
(होली के 10 हाइकु)  

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1.  
टेसू चन्दन  
मंद-मंद मुस्काते  
फगुआ गाते !  

2.  
होली त्योहार  
बचपना लौटाए  
शर्त लगाए !  

3.  
रंगों का मेला  
खोया दर्द - झमेला,  
नया सवेरा !  

4.  
याद दिलाते  
मन के मौसम को  
रंग अबीर !  

5.  
फगुआ बुझा,  
रास्ता अगोरे बैठा  
रंग ठिठका !  

6.  
शूल चुभाता  
बेपरवाह रंग,  
बैरागी मन !  

7.  
रंज औ ग़म  
रंग में नहाकर  
भूले धरम !  

8.  
हाल न पूछा  
जाने क्या सोचा  
पावन रंग !  

9.  
रंग बिखरा  
सिमटा न मुट्ठी में  
मन बिखरा !  

10.  
रंग न सका  
होली का सुर्ख़ रंग  
फीका ये मन !  

- जेन्नी शबनम (23. 3. 2016) 

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शुक्रवार, 18 मार्च 2016

507. पगडंडी और आकाश...

पगडंडी और आकाश... 

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एक सपना बुन कर  
उड़ेल देना मुझ पर मेरे मीत  
ताकि सफ़र की कठिन घड़ी में  
कोई तराना गुनगुनाऊँ,  
साथ चलने को न कहूँगी  
पगडंडी पर तुम चल न सकोगे  
उस पर पाँव-पाँव चलना होता है  
और तुमने सिर्फ उड़ना जाना है !  
क्या तुमने कभी बटोरे हैं  
बगीचे से महुआ के फूल  
और अंजुरी भर-भर  
खुद पर उड़ेले हैं वही फूल  
क्या तुमने चखा है  
इसके मीठे-मीठे फल  
और इसकी मादक खुशबू से  
बौराया है तुम्हारा मन ?  
क्या तुमने निकाले हैं  
कपास से बिनौले  
और इसकी नर्म-नर्म रूई से  
बनाए हैं गुड्डे गुड्डी के खिलौने  
क्या तुमने बनाई है  
रूई की छोटी-छोटी पूनियाँ  
और काते हैं  
तकली से महीन-महीन सूत ?  
अबके जो मिलो तो सीख लेना मुझसे  
वह सब  
जो तुमने खोया है  
आसमान में रहकर !  
इस बार के मौसम ने बड़ा सताया है मुझको  
लकड़ी गीली हो गई  
सुलगती नहीं  
चूल्हे पर आँच नहीं  
जीवन में ताप नहीं  
अबकी जो आओ तो मैं तुमसे सीख लूँगी  
खुद को जलाकर भाप बनना  
और बिना पंख आसमान में उड़ना !  
अबकी जो आओ  
एक दूसरे का हुनर सीख लेंगे  
मेरी पगडंडी और तुम्हारा आसमान  
दोनों को मुट्ठी में भर लेंगे  
तुम मुझसे सीख लेना  
मिट्टी और महुए की सुगंध पहचानना  
मैं सीख लूँगी  
हथेली पर आसमान को उतारना  
तुम अपनी माटी को जान लेना  
और मैं उस माटी से  
बसा लूँगी एक नई दुनिया  
जहाँ पगडंडी और आकाश  
कहीं दूर जाकर मिल जाते हों !  

- जेन्नी शबनम (18. 3. 2016)  

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मंगलवार, 8 मार्च 2016

506. तू भी न कमाल करती है...

तू भी न कमाल करती है...  

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ज़िन्दगी तू भी न कमाल करती है !  
जहाँ-तहाँ भटकती फिरती  
ग़ैरों को नींद के सपने बाँटती  
पर मेरी फ़िक्र ज़रा भी नहीं  
सारी रात जागती-जागती  
तेरी बाट जोहती रहती हूँ  

तू कहती -  
फ़िक्र क्यों करती हो  
ज़िन्दगी हूँ तो जश्न मनाऊँगी ही  
मैं तेरी तरह बदन नहीं  
जिसका सारा वक्त  
अपनों की तीमारदारी में बीतता है  
तूझे सपने देखने  
और पालने की भी मोहलत नहीं  
चाहत भले हो मगर साहस नहीं  
तू बस यूँ ही  
बेमक़सद बेमतलब जिए जा  
मैं तो जश्न मनाऊँगी ही  

मैं ज़िन्दगी हूँ  
अपने मनमाफ़िक जीती हूँ  
जहाँ प्यार मिले  
वहाँ उड़ के चली जाती हूँ  
तू और तेरा दर्द  
मुझे बेचैन करता है  
तूझे कोई सपने जो दूँ  
तू उससे भी डर जाती है -  
''ये सपने कोई साज़िश तो नहीं''  
इसलिए तुझसे दूर  
बहुत दूर रहती हूँ  
कभी-कभी जो घर याद आए  
तेरे पास चली आती हूँ  

ज़िन्दगी हूँ  
मिट तो जाऊँगी ही एक दिन  
उससे पहले  
पूरी दुनिया में उड़-उड़ कर  
सपने बाँटती हूँ  
बदले में कोई मोल नहीं लेती  
सपनों को जिलाए रखने का वचन लेती हूँ  
सुकून है मैं अकारथ नहीं हूँ  

उन्मुक्त उड़ना ही ज़िन्दगी है  
मैं भी उड़ना चाहती हूँ बेफ़िक्र  
अपनी ज़िन्दगी की तरह  
हर रात तमाम रात  
सर पर सपनों की पोटली लिए  
मन चाहता है  
आसमान से एक बार में पूरी पोटली  
खेतों में उड़ेल दूँ  
सपनों के फल  
सपनों के फूल  
सपनों का घर  
सपनों का संसार  
खेतों में उग जाए  
और... मैं...  

चल तन और सपन मिल जाए  
चल ज़िन्दगी तेरे साथ हम जी आएँ  
बहुत हुई उनकी बेगारी  
जिनको मेरी परवाह नहीं  
बस अब तेरी सुनूँगी  
गीत ज़िन्दगी के गाऊँगी  

तू दुनिया सुंदर बनाती है  
सपनों को उसमें सजाती है  
जीने का हौसला बढ़ाती है  
ज़िन्दगी तू भी न कमाल करती है !  

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2016)  

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