सोमवार, 27 दिसंबर 2010

197. तुम्हारी आँखों से देखूँ दुनिया...

तुम्हारी आँखों से देखूँ दुनिया...

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चाह थी मेरी
तीन पल में
सिमट जाए दूरियाँ,
हसरत थी
तुम्हारी आँखों से
देखूँ दुनिया !

बाहें थाम
चल पड़ी साथ
जीने को खुशियाँ,
बंद सपने मचलने लगे
मानो खिल गई
सपनों की बगिया !

शिलाओं के झुरमुट में
अवशेषों की गवाही
और थाम ली तुमने बहियाँ,
जी उठी मैं फिर से सनम
जैसे तुम्हारी साँसों से
जीती हों वादियाँ !

उन अवशेषों में
छोड़ आए हम
अपनी भी कुछ निशानियाँ,
जहाँ लिखी थी इश्क की इबारत
वहाँ हमने भी
रची कहानियाँ !

मिलेंगे फिर कभी
ग़र ख्व़ाब तुम सजाओ
रहेंगी न फिर मेरी वीरानियाँ,
बिन कहे तय हुआ ये
साथ चलेंगे हम
यूँ ही जीएँगे सदियाँ !

- जेन्नी शबनम (18. 12. 2010)

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