रविवार, 6 मार्च 2011

216. क्यों होती है आहत...

क्यों होती है आहत...

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लपलपाती जुबां ने
जाने क्या कहा
थर्रा उठी वो बीच सड़क,
गुज़र गए कई लोग
बगल से मुस्कुराकर,
यूँ जैसे देख लिया हो
किसी नव यौवना का नंगा बदन
और फुरफुरी सी
दौड़ गई हो बदन में !

झुक गए सिर
ख़ामोशी से उसके,
फिर आसमान में
ताका उसने,
सुना है कि वो आसमान में रहता है
क्यों नहीं दिखता उसे?
ऐसी रोज़ की शर्मिंदगी से
क्यों नहीं बचाता उसे?
करती तो है रोज़ सज़दा
क्यों नहीं सुनता उसे?

आँखों में पाशविकता
जुबां में बेहयाई
क्या हैं वो सभी
चेतना मर चुकी है उनकी,
सोचती है वो
क्यों होती है आहत
उनके कहे पर
जो महज़ लाश हैं!

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2010)
(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर)

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