Wednesday, June 2, 2010

146. अपना न कोई ज़िक्र की / apna na koi zikra ki

अपना न कोई ज़िक्र की

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चाँदनी है मगर, रात जैसे हिज़्र की
ढ़ल तो जायेगी, बात नहीं फ़िक्र की !

छाया घना कोहरा, सबब क्या बताएँ
बात तो होगी मगर, नहीं मेरे मित्र की !

यादों को यूँ सहेजना, सीने में हमदम
पिरामिड में स्थित, ज्यों रानी मिस्र की !

हुए वो बेगाने, पर गंध ठहर गई मुझमें
ख़ुशबू मिलेगी सबको, महज़ उनके इत्र की !

जाने कब बन गई थी, 'शब' एक नज़्म
मिली तो मगर, अपना न कोई ज़िक्र की !

- जेन्नी शबनम (23. 5. 2010)

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apna na koi zikra ki

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chaandni hai magar, raat jaise hizra ki
dhal to jayegi, baat nahin fikra ki.

chhaya ghana kohra, sabab kya batayen
baat to hogi magar, nahin mere mitra ki.

yaadon ko yun sahejna, seene mein humdam
piraamid mein sthit, jyon raani misra ki.

hue wo begaane, par gandh thahar gai mujhmein
khushboo milegi sabko, mahaz unke itra ki.

jaane kab ban gai thee, 'shab' ek nazm
mili to magar, apna na koi zikra ki.

- Jenny Shabnam (23. 5. 2010)

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