Saturday, June 4, 2011

कोई और लिख गया...

कोई और लिख गया...

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वक़्त के साथ मैं तो चलती रही
वक़्त ने जब जो कहा करती रही!
क्या जानूं क्या है जीने का फलसफा
बेवजह सी हवाओं में सांस लेती रही!
मरघट सी वीरानी थी हर जगह
और मैं ज़िंदगी को तलाशती रही!
जाने कौन दे रहा आवाज़ मुझको
मैं तो बेगानों के बीच जीती रही!
कोई मिला राह में गुजरते हुए कल
डरती झिझकती मैं साथ बढ़ती रही!
कोई और लिख गया कहानी मेरी
मैं जाने क्या समझी और पढ़ती रही!
जिसने चाहा मढ़ दिया गुनाह बेदर्दी से
''शब'' हंसकर गुनाह कबूल करती रही!

__ जेन्नी शबनम __ 4. 06. 2011

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