Sunday, May 1, 2011

तुम अपना ख़याल रखना...

तुम अपना ख़याल रखना...

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उस सफ़र की दास्तान
तुम बता भी न पाओगे
न मैं पूछ सकुंगी
जहाँ चल दिए तुम अकेले अकेले
यूँ मुझे छोड़ कर
जानते हुए कि
तुम्हारे बिना जीना
नहीं आता मुझको
कठिन डगर को पार करने का
सलीका भी नहीं आता मुझको,
तन्हा जीना
न मुझे सिखाया
न सीखा तुमने
और चल दिए
बिना कुछ बताये,
जबकि वादा था तुम्हारा
हमसफ़र रहोगे सदा
अंतिम सफ़र में हाथ थामे
बेख़ौफ़ पार करेंगे रास्ता|

बहुत शिकायत है तुमसे
पर कहूँ भी अब तुमसे कैसे?
जाने तुम मुझे सुन पाते हो कि नहीं?
उस जहां में मैं तुम्हारे साथ हूँ कि नहीं?

सब कहते हैं
तुम अब भी मेरे साथ हो
जानती हूँ ये सच नहीं
तुम महज़ एहसास में हो
यथार्थ में नहीं,
धीरे धीरे मेरे बदन से
तुम्हारी निशानी कम हो रही
अब मेरे जेहन में रहोगे
मगर ज़िन्दगी अधूरी होगी
मेरी यादों में जिओगे
साथ नहीं मगर मेरे साथ साथ रहोगे|

अब चल रही हूँ मैं तन्हा तन्हा
अँधेरी राहों से घबराई हुई
तुम्हें देखने महसूस करने की तड़प
अपने मन में लिए
तुम तक पहुँच पाने केलिए
अपना सफ़र जारी रखते हुए
तुम्हारे सपने पूरे करने के लिए
कठोर चट्टान बन कर
जिसे सिर्फ तुम डिगा सकते हो
नियति नहीं|

मेरा इंतज़ार न करना
तुहारा सपना पूरा कर के हीं
मैं आ सकती हूँ,
छोड़ कर तुम गए
अब तुम भी
मेरे बिना
सीख लेना वहाँ जीना,
थोड़ा वक़्त लगेगा मुझे आने में
तबतक तुम अपना ख़याल रखना|

__ जेन्नी शबनम __ 1. 5. 2011

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