शुक्रवार, 7 जून 2019

615. नहीं आता

नहीं आता   

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ग़ज़ल नहीं कहती   
यूँ कि मुझे कहना नहीं आता   
चाहती तो हूँ मगर   
मन का भेद खोलना नहीं आता।   

बसर तो करनी है पर   
शहर की आवो हवा बेगानी लगती   
रूकती हूँ समझती हूँ   
पर दम भर कर रोना नहीं आता।   

सफर में अब जो भी मिले   
मुमकिन है मंजिल मिले न मिले   
परवाह नहीं पाँव छिल गए   
दमभर भी हमें ठहरना नहीं आता।   

मायूसी मन में पलती रही   
अपनों से जख्म जब भी गहरे मिले   
कोशिश की थी कि तन्हा चलूँ   
पर अपने साथ जीना नहीं आता।   

यादों के जंजाल में उलझ के   
बिसुराते रहे हम अपने आज को   
हँस-हँस के गम को पीना होता   
पर 'शब' को यूँ हँसना नहीं आता।   

- जेन्नी शबनम (7. 6. 2019)   

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