Wednesday, December 29, 2010

एक टुकड़ा पल...

एक टुकड़ा पल...

*******

उस मुलाक़ात में
अपने वक़्त का एक टुकड़ा
तुम दे गए,
और ले गए
मेरे वक़्त का
एक टुकड़ा !

तुम्हारा वो टुकड़ा
मुझमें 'मैं' बनकर
समाहित हो गया,
जो हर पहर मुझे
छुपाये रखता है
अपने सीने में !

ज़रा देर को भी वो
मुझसे अलग हो तो
मैं रो देती हूँ,
एक वही है जो
जीना सिखाता है,
तुम तो जानते हो न ये
और वो सब भी
जो मैं अपने साथ करती हूँ
या जो मेरे साथ होता है !

पर तुम वो मेरा टुकड़ा
कहाँ छोड़ आये हो ?
जानती हूँ वो मूल्यवान नहीं
न ही तुमको इसकी ज़रूरत होगी,
पर मेरे जीवन का
सबसे अनमोल है
मेरे वक़्त का वो टुकड़ा !

याद है तुमको
वो वक़्त
जो हमने जिया,
अंतिम निवाला जो तुमने
अपने हाथों से खिलाया था,
और उस ऊँचे टीले से उतरने में
मैं बेख़ौफ़ तुम्हारा हाथ थाम
कूद गई थी !

आलिंगन की इजाज़त
न मैंने मांगी
न तुमने चाही,
हमारी सांसें और वक़्त
दोनो ही
तेज़ी से दौड़ गए
और हम देखते रहे,
वो तुम्हारी गाड़ी की सीट पर
आलिंगनबद्ध मुस्कुरा रहे थे !

जानती हूँ वो सब
बन गया है
तुम्हारा अतीत,
पर इसे
विस्मृत न करना मीत,
मेरे वक़्त को साथ न रखो
पर दूर न करना
खुद से कभी,
जब मिलो किसी महफ़िल में
तब साथ उसे भी ले आना
वहीं होगा
तुम्हारा वक़्त मेरे साथ !

हमारे वक़्त के टुकड़े
गलबहियां किये वहीं होंगे,
मैं सिफ टुकुर टुकुर देखूंगी
तुम भले न देखना,
पर वापसी में मेरे वक़्त को
ले जाना अपने साथ,
अगली मुलाक़ात के
इंतज़ार में
मैं रहूंगी
तुम्हारे उसी
वक़्त के टुकड़े के साथ !

__ जेन्नी शबनम __ २९. १२. २०१०

____________________________________________

Monday, December 27, 2010

तुम्हारी आँखों से देखूँ दुनिया...

तुम्हारी आँखों से देखूँ दुनिया...

*******

चाह थी मेरी
तीन पल में
सिमट जाए दूरियाँ,
हसरत थी
तुम्हारी आँखों से
देखूँ दुनिया !

बाहें थाम
चल पड़ी साथ
जीने को खुशियाँ,
बंद सपने मचलने लगे
मानो खिल गई
सपनों की बगिया !

शिलाओं के झुरमुट में
अवशेषों की गवाही
और थाम ली तुमने बहियाँ,
जी उठी मैं फिर से सनम
जैसे तुम्हारी साँसों से
जीती हों वादियाँ !

उन अवशेषों में
छोड़ आये हम
अपनी भी कुछ निशानियाँ,
जहाँ लिखी थी इश्क की इबारत
वहाँ हमने भी
रची कहानियाँ !

मिलेंगे फिर कभी
ग़र ख्व़ाब तुम सजाओ
रहेंगी न फिर मेरी वीरानियाँ,
बिन कहे तय हुआ ये
साथ चलेंगे हम
यूँ हीं जियेंगे सदियाँ !

__ जेन्नी शबनम __ १८. १२. २०१०

_________________________________________

Saturday, December 18, 2010

जादू की एक अदृश्य छड़ी...

जादू की एक अदृश्य छड़ी...

*******

तुम्हारे हाथों में रहती है
जादू की एक अदृश्य छड़ी,
जिसे घुमा कर
करते हो
अपनी मनचाही
हर कामना पूरी,
और रचते हो
अपने लिए
स्वप्निल संसार !

उसी छड़ी से छू कर
बना दो मुझे
वो पवित्र परी,
जिसे तुम अपनी
कल्पनाओं में देखते हो
और अपने स्पर्श से
प्राण फूंकते हो !

फिर मैं भी
हिस्सा बन जाऊँगी
तुम्हारे संसार का,
और जाना न होगा मुझे
उस मृत वन में
जहाँ हर पहर ढूंढ़ती हूँ मैं
अपने प्राण !

__ जेन्नी शबनम __ १३. १२. २०१०

_______________________________________________

Sunday, December 12, 2010

मेरे साथ-साथ चलो...

मेरे साथ-साथ चलो...

*******

तुम कहते हो तो चलो
पर एक कदम फासले पे नहीं
मेरे साथ-साथ चलो,
मुझे भी देखनी है
वो दुनिया
जहाँ तुम पूर्णता से रहते हो !

तुमने तो महसूस किया है
जलते सूरज की नर्म किरणें
तपते चाँद की शीतल चाँदनी,
तुमने तो सुना है
हवाओं का प्रेम गीत
नदियों का कलरव,
तुमने तो देखा है
फूलों की मादक मुस्कान
जीवन का इन्द्रधनुष !

तुम तो जानते हो
शब्दों को कैसे जगाते हैं और
मनभावन कविता कैसे रचते हैं,
ये भी जान लो मेरे मीत
जो बातें अनकहे
मैं तुमसे कहती हूँ
और जिन सपनों की
मैं ख़्वाहिश मंद हूँ !

मैं भी जीना चाहती हूँ
उन सभी एहसासों को
जिन्हें तुम जीते हो
और मेरे लिए चाहते हो,
पर एक कदम फासले पे नहीं
मेरे साथ-साथ चलो !

- जेन्नी शबनम (12. 12. 2010)

________________________________________

हर हार मुझे और हराती है...

हर हार मुझे और हराती है...

*******

आज मैं खाली खाली सी हूँ
अपने अतीत को टटोल रही,
तमाम चेष्टा के बाद भी
सब बिखरने से रोक न पायी !
नहीं मालूम जीने का हुनर
क्यों न आया ?
अपने सपनों को पालना
क्यों न आया ?
जानती हूँ मेरी विफलता का आरोप
मुझपर ही है,
मेरी हार का
दंश मुझे ही झेलना है !
पर मेरे सपनों की परिणति
पीड़ा तो देती है न,
हर हार मुझे
और हराती है !

- जेन्नी शबनम (9. 12. 2010)

______________________________________

Thursday, December 9, 2010

तुम्हारा कहा क्या टाला मैंने...

तुम्हारा कहा क्या टाला मैंने...

*******

तुम कहते हो हँसती रहा करो
दुनिया खूबसूरत है जिया करो,
कभी आकर देख भी जाओ
तुम्हारा कहा क्या टाला मैंने !

हँसती ही रहती हूँ हर मुनासिब वक़्त
सभी पूछते हैं मैं क्यों इतना हँसती हूँ,
नहीं देखा किसी ने मुझे मुर्झाए हुए
किसी भी दर्द पर रोते हुए !

पर अब थक गई हूँ
अक्सर आँखें नम हो जाती हैं,
शायद हँसी की सीमा ख़त्म हो रही या
ख़ुद को भ्रमित करने का साहस नहीं रहा !

पर तुम्हारा कहा अब तक जिया मैंने
हर वादा अब तक निभाया मैंने,
एक बार आ कर देख जाओ
तुम्हारा कहा क्या टाला मैंने !

- जेन्नी शबनम (8. 12. 2010)

________________________________________________

Tuesday, December 7, 2010

चहारदीवारी का चोर दरवाज़ा...

चहारदीवारी का चोर दरवाज़ा...

*******

ज़िन्दगी और सपनों के चारों तरफ
ऊँची चहारदीवारी
जन्म लेते ही
तोहफ़े में मिलती है,
तमाम उम्र
उसी में कैद रहना
शायद मुनासिब भी है
और ज़रूरत भी,
पिता भाई और
पति पुत्र का कड़ा पहरा
फिर भी असुरक्षित
अपने ही किले में!

चहारदीवारी में एक मज़बूत दरवाज़ा होता
जिससे सभी अपने और रिश्ते
ससम्मान साधिकार प्रवेश पाते,
लेकिन उनमें कइयों की आँखें
निर्वस्त्र कर जाती सबके सामने,
कुछ को बस मौका मिला
और ज़रा-सा छू कर तृप्त,
कइयों की आँखें लपलपाती
और भेड़िये सा टूट पड़ते,
ख़ुद को शर्मसार होने का भय
फिर स्वतः कैद
हो जाती ज़िन्दगी!

पर उन चहारदीवारी में
एक चोर दरवाज़ा भी होता
जहाँ से मन का राही प्रवेश पाता,
कई बार वही पहला साथी
सबसे बड़ा शिकारी निकलता,
प्रेम की आड़ में भूख़ मिटा
भाग खड़ा होता,
ठगे जाने का दर्द छुपाये
कब तक तन्हा जिए,
वक़्त का मरहम
दर्द को ज़रा कम करता
फिर कोई राही प्रवेश करता,
कदम-कदम फूँक कर
चलना सीख जाने पर भी,
नया आया हमदर्द
बासी गोश्त कह
छोड़ चला जाता!
यकीं टूटता पर
सपने फिर सँवरने लगते,
चोर दरवाज़े पर
उम्मीद भरी नज़र टिकी होती,
फिर कोई आता और रिश्तों में बाँध
तमाम उम्र को साथ ले जाता,
नहीं मालूम क्या बनेगी
महज़ एक साधन जो
जिस्म, रिश्ता और रिवाज़ का फ़र्ज़ निभाएगी,
या फिर चोर दरवाज़े पर टकटकी लगाए
अपने सपनों को उसी राह
वापस करती रहेगी,
या कभी कोई और प्रवेश कर जाए
तो उम्मीद से ताकती
नहीं मालूम
वो गोश्त रह जायेगी या जिस्म,
फिर एक और दर्द
और चोर दरवाज़ा जोर से
सदा के लिए बंद!

चहारदीवारी के भीतर भी
जिस्म से ज्यादा
और कुछ नहीं,
चोर दरवाज़े से भी
कोई रूह तक नहीं पहुँचता,
क्यों आख़िर?  

- जेन्नी शबनम (नवम्बर 1990)

________________________________________

Friday, December 3, 2010

न आओ तुम सपनों में...

न आओ तुम सपनों में...

*******

क्यों आते हो सपनों में बार बार
जानते हो न मेरी नियति,
क्यों बढ़ाते हो मेरी मुश्किलें
जानते हो न मेरी स्थिति !

विषमताएं मैंने ख़ुद
नहीं ओढ़ी जानेमन,
न कभी चाहा कि
ऐसा जीवन पाऊं,
मैंने तो अपनी परछाई से भी
नाता तोड़ लिया,
जीवन के हर रंग से
मूँह मोड़ लिया !

कुछ सवाल होते हैं
पर अनपूछे,
जवाब भी होते हैं
पर अनकहे,
समझ जाओ न मेरी बात
बिन कहे मेरी हर बात !

न दिखाओ दुनिया की रंगीनी
रहने दो मुझे मेरे जागते जीवन में,
मुमकिन नहीं कि तुम्हें सपने में देखूँ
न आया करो मेरे हमदम मेरे सपनों में !

__ जेन्नी शबनम __ ३. १२. २०१०

_________________________________________________________

Wednesday, December 1, 2010

अपनों का अजनबी बनना...

अपनों का अजनबी बनना...

*******

समीप की दो समानान्तर राहें
कहीं न कहीं किसी मोड़ पर
मिल जाती हैं,
दो अजनबी साथ हों तो
कभी न कभी
अपने बन जाते हैं !

जब दो राह
दो अलग अलग दिशाओं में
चल पड़े फिर?
दो अपने
साथ रह कर
दो अजनबी बन जाए फिर?

संभावनाओं को नष्ट कर
नहीं मिलती कोई राह,
कठिन नहीं होता
अजनबी का अपना बनना,
कठिन होता है
अपनों का अजनबी बनना !

एक घर में दो अजनबी
नहीं होती महज़
एक पल की घटना,
पल भर में अजनबी
अपना बन जाता,
लेकिन अपनों का
अजनबी बनना
धीमे धीमे होता !

व्यथा की
छोटी छोटी
कहानी होती,
पल पल में
दूरी बढ़ती,
बेगानापन
पनपता,
फिक्र
मिट जाती,
कोई चाहत
नहीं ठहरती !

असंभव हो जाता है
ऐसे अजनबी को
फिर अपना मानना !

__ जेन्नी शबनम __ १. १२. २०१०

________________________________________________________

Sunday, November 14, 2010

जाने कैसा लगता होगा...

..........................................................................
बाल दिवस पर एक यतीम बालिका की मनोदशा...
..........................................................................

जाने कैसा लगता होगा...

*******

कैसा लगता होगा
जब किसी घर में
अम्माँ-बाबा संग
बिटिया रहती है,
कैसा लगता होगा
जब अम्माँ कौर-कौर
बिटिया को खिलाती है,
कैसा लगता होगा
जब बाबा की गोद में
बिटिया इतराती है!

क्या जानूँ वो एहसास
जाने कैसा लगता होगा,
पर सोचती हूँ हमेशा
बड़ा प्यारा लगता होगा,
अम्माँ-बाबा की बिटिया का
सब कुछ वहाँ कितना
अपना-अपना-सा होता होगा!

बहुत मन करता है
एक छोटी बच्ची बन जाऊँ,
खूब दौडूँ-उछलूँ-नाचूँ   
बेफ़िक्र हो शरारत करूँ,
ज़रा-सी चोट पर
अम्माँ-बाबा की गोद में
जा चिपक उनको चिढ़ाऊँ!

सोचती हूँ
अगर ये चमत्कार
हुआ तो...
बन भी जाऊँ   
बच्ची तो...
अम्माँ-बाबा
कहाँ से लाऊँ?
जाने कैसे थे
कहाँ गए वो?
कोई नहीं बताता
क्यों छोड़ गए वो?

सब यतीम यहाँ
कौन किसको समझाए,
आज तो बहुत मिला
प्यार सबका,
रोज़-रोज़ कौन
जतलाये?
यही है जीवन समझ में अब
आ ही जाए!

न मैं बच्ची बनी
न बनूँगी किसी की अपनी,
हर शब यूँ ही तन्हा
इसी दर पर गुज़र जाएगी,
रहम से देखती आँखें सबकी
मेरी खाली हथेली की दुआ ले जायेगी!

- जेन्नी शबनम (14. 11. 2010)

__________________________________

Saturday, November 13, 2010

रचती हूँ अपनी कविता...

रचती हूँ अपनी कविता...  

*******  

दर्द का आलम  
यूँ ही नहीं होता लिखना  
ज़ख़्म को नासूर बना  
होता है दर्द जीना,  
कैसे कहूँ कि कब  
किसके दर्द को जीया  
या अपने ही  
ज़ख़्म को छील  
नासूर बनाया,  
ज़िन्दगी हो  
या कि मन की  
परम अवस्था  
स्वयं में पूर्ण समा  
फिर रचती हूँ  
अपनी कविता!  

- जेन्नी शबनम - (12. 11. 2010)
___________________________

Wednesday, November 10, 2010

आदमी और जानवर की बात...

आदमी और जानवर की बात...

*******

रौशन शहर, चहकते लोग
आदमी की भीड़, अपार शोर,
शुभ आगमन की, तैयारी पूरी
रात्रि पहर, घर आएगी समृद्धि !

पर जाने क्या हुआ, कल रात
वो रोते-भौंकते रहे, सारी रात,
बेदम होते रहे, कौन समझे उनकी बात
आदमी तो नहीं, जो कह सके अपनी बात !

कल के दिन, न मिले कोई अशुभ सन्देश
शुभ दिन में श्वान का रोना, है अशुभ संकेत,
पास की कोठी का मालिक, झल्लाता रहा पूरी रात
जाने कैसी विपत्ति आए, हे प्रभु, करना तुम निदान !

पेट के लिए हो जाए, आज का कुछ तो जुगाड़
सुबह से सब शांत, वो निकल पड़े लिए आस,
कोठी का मालिक, अब जाकर हुआ संतुष्ट
शायद आपदा किसी और के लिए, है बड़ा ख़ुश !

अमावास की रात, सजी दीपों की कतार
हर तरफ पटाखों की, गूँजती आवाज़,
भय से आक्रान्त, वो लगे चीखने-भौंकने
नहीं समझ, वो किससे अपना डर कहें !

जा दुबके, उसी बुढ़िया के बिस्तर में
जहाँ वो मिल बाँट, खाते-सोते वर्षों से,
दुलार से रोज़ उनको, सहलाती थी बुढ़िया
सुन पटाखे की तेज़ गूँज, कल ही मर गई थी बुढ़िया !

कौन आज उनको, चुप कराए
कौन आज कुछ भी, खाने को दे,
आज, कचरा भी तो नहीं कहीं
खाली पेट, चलो आज यूँ ही सही !

ममतामयी हाथ, कल से निढ़ाल पसरा
खौफ़ है, पर उस खोह में मातम पसरा,
आदमी नहीं, वो थी उनकी-सी ही, उनकी जात
वो समझती थी, आदमी और जानवर की बात !

जब कोई पत्थर मार, उनको करता ज़ख़्मी
एक दो पत्थर खा, पगली बुढ़िया उनको बचाती,
अब तो सब ख़त्म, कल ले जाएँगे यहाँ से आदमी उसको
वो मरें तो जहाँ फेंकते उनको, वहाँ ही कल फेंक देंगे बुढ़िया को !

- जेन्नी शबनम (5. 11. 2010)

___________________________________________________

Thursday, November 4, 2010

जागता सा कोई एक पहर ज़ारी है...

जागता सा कोई एक पहर ज़ारी है...

*******

रात बीती और तमन्ना जागने लगी, ये दहर ज़ारी है
क़यामत से कब हो सामना, सोच में वो क़हर ज़ारी है !

मुख़ातिब होते रहे हर रोज़ फिर भी, हँस न सके हम
ज़ख़्म घुला तड़पते रहे, फैलता बदन में ज़हर ज़ारी है !

शिकायत की उम्र बीती, अब सुनाने से क्या फायदा
जल जल कर दहकता है मन, ताव की लहर ज़ारी है !

उजाला चहुँ ओर पसरा, जाने आफ़ताब है या बिजली
रात या दिन पहचान नहीं हमें, जलता शहर ज़ारी है !

ख़ामोशी की जुबां न समझे जो, उससे क्या कहे ''शब''
शेष नहीं फिर भी, जागता सा कोई एक पहर ज़ारी है !

...............................
दहर - ज़िन्दगी/ संसार
...............................

__ जेन्नी शबनम __ ४. ११. २०१०

____________________________________________________

Friday, October 29, 2010

किसी बोल ने चीर तड़पाया...

किसी बोल ने चीर तड़पाया...

*******

पोर पोर में पीर समाया
किसने है ये तीर चुभाया !

मन का हाल नहीं पूछा और
पूछा किसने धीर चुराया !

गूंगी इच्छा का मोल हीं क्या
गंगा का बस नीर बताया !

नहीं कभी कोई रांझा उसका
फिर भी सबने हीर बुलाया !

न भूली शब्दों की भाषा ''शब''
किसी बोल ने चीर तड़पाया !

................................................

चीर का अर्थ यहाँ - चीरना (दिल चीर देना)
बोल का अर्थ यहाँ - किसी के कहे हुए शब्द
.................................................

__ जेन्नी शबनम __ २९. १०. २०१०

_______________________________________________________

Thursday, October 28, 2010

पहला और आख़िरी वरदान...

पहला और आख़िरी वरदान...

*******

वो हठी ये क्या कर गया
विष माँगी मैं
वो अमृत चखा गया,
एक बूंद अमृत
हलक में उतार गया,
आह... ये कैसा
ज़ुल्म कर गया !

उस दिन कहा था वो
वक़्त को ललकारा तुमने
मृत्यु माँगी असमय तुमने,
इसलिए है ये शाप -
सदा जीवित तुम रहो अब
अमरता का है वरदान तुमको !

अब तो निर्भय जीवन
अविराम चलायमान जीवन,
जीवित रहना है
जाने कितनी सदी और,
कभी नहीं होगी मृत्यु
कभी नहीं होगी मुक्ति,
तड़प-तड़प कर जीना
शायद तबतक
जबतक नष्ट न हो
समस्त कायनात !

लाख़ करूँ प्रार्थना
नहीं होता कोई तोड़,
चख भी लो जो अमृत
मुमकिन नहीं
होना कभी मृत !

खौफ़ बढ़ता जा रहा
ये मैं क्या कर ली ?
क्या करूँ अब ?
क्यों उसके छल में आ गई ?
क्यों चख लिया अमृत ?
क्यों माँगा था विष ?
क्यों वक़्त से पहले मृत्यु चाही ?
क्यों क्यों क्यों ???

जानती थी कि वो देवदूत है
दे रहा मेरा पहला और
आख़िरी वरदान है,
फिर क्यों अपने लिए
ज़िन्दगी नहीं
मौत माँग ली !

माँगना था तो
प्रेमपूर्ण दुनिया माँगती,
जबतक जियूँ
बेफिक्र जियूँ,
सभी अपनों का प्रेम पाऊँ
कहीं कोई दुखी न हो
सर्वत्र सुख हो
आनंद हो !

चूक मेरी
भूल मेरी,
ज़िन्दगी नहीं मौत की
चाह की,
अब मौत नहीं बस
जीना है,
कोई न होगा मेरा
सब चले जाएँगे,
मैं कभी
शाप मुक्त न हूँगी,
न शाप मुक्त करने वाला
कोई होगा !

- जेन्नी शबनम (28. 10. 2010)

_______________________________________

Wednesday, October 20, 2010

183. देव...

देव...

*******

देव देव देव...
तुम कहाँ हो?
क्यों चले गए ?
एक क्षण को न ठिठके
तुम्हारे पाँव,
अबोध शिशु पर
क्या ममत्व न उमड़ा,
क्या इतनी भी सुध नहीं
कैसे रहेगी ये अपूर्ण नारी,
कैसे जियेगी
कैसे सहन करेगी संताप
अपनी व्यथा किससे कहेगी,
शिशु जब जागेगा
उसके प्रश्नों का
क्या उत्तर देगी,
वो तो फिर भी बहल जाएगा
अपने निर्जीव खिलौनों में रम जाएगा !

बताओ न देव
क्या कमी थी मुझमें,
किस धर्म का पालन न किया
स्त्री का हर धर्म निभाया
तुम्हारे वंश को भी बढ़ाया,
फिर क्यों देव
यूँ छोड़ गए ?
अपनी व्यथा
अपनी पीड़ा
किससे कहूँ देव?
किससे?
बीती हर रात्रि की याद
क्या नाग-सी न डसेगी,
जब तुम बिन
ये अभागिन तड़पेगी?

जाना था चले जाते
मैं राह नहीं रोकती देव,
बस जगा कर
कह कर जाते,
एक अंतिम आलिंगन
एक अंतिम प्रेम-शब्द,
अंतिम बार तुमको
छू तो लेती,
एक अंतिम बार
अर्धांगनी तुम्हारी
तुमसे लिपट तो लेती,
उन क्षणों के साथ
सम्पूर्ण जीवन
सुख से जी लेती !

आह...
देव...
एक बार बस
कह कर तो देखते
साथ चल देती
छोड़ सब कुछ संग तुम्हारे,
तुम्हारी ही तरह
मैं भी बन जाती एक भिक्षुणी !

ओह देव
अब जो आओगे
मैं तुम्हारी प्रेम-प्रिया नहीं रहूँगी
न तुम आलिंगन  करोगे
मैं अपनी पीड़ा में समाहित
एक अभागिन परित्यक्ता
तुम्हारे चरणों में लोटती
एक असहाय नारी !

संसार के लिए तुम
बन जाओगे महान
लेकिन नहीं समझ पाए
एक स्त्री की वेदना,
चूक गए तुम
पुरुष धर्म से,
सुन रहे हो न
देव देव देव...!

- जेन्नी शबनम (20. 10. 2010)
________________________________________

Friday, October 15, 2010

182. नहीं होता अभिनन्दन.../ nahin hota abhinandan...

नहीं होता अभिनन्दन...

*******

सहज जीवन
मन का बंधन,
पार होने की चाह
निराशा और क्रंदन,
अनवरत प्रयास
विफलता और रुदन,
असह्य प्रतिफल
नहीं होता अभिनन्दन !

__ जेन्नी शबनम __ १५. १०. २०१०

_________________________________

nahin hota abhinandan...

*******

sahaj jivan
mann ka bandhan,
paar hone kee chaah
niraasha aur krandan,
anwarat prayaas
vifalta aur rudan,
asahya pratifal
nahin hota abhinandan.

__ jenny shabnam __ 15. 10. 2010

*******************************************************

Sunday, October 10, 2010

181. जीवन के बाद रूह का सफ़र...

जीवन के बाद रूह का सफ़र...

*******

इस जीवन के बाद
एक और जीवन की चाह,
रूहानी इश्क का ख्व़ाब
है न अज़ब ये ख़याल !

क्या पता क्या हो
रूह हो या कि
सब समाप्त हो,
कहीं ऐसा न हो
शरीर ख़त्म हो
रूह भी मिट जाए,
या फिर ऐसा हो
शरीर नष्ट हो
रूह रह जाए
महज़ वायु समान,
एहसास तो
मुकम्मल हो
पर रूह
बेअख्तियार हो !

कैसी तड़प होगी
जब सब दिखे
पर हों असमर्थ,
सामने प्रियतम हो
पर हों छूने में विफल,
कितनी छटपटाहट होगी
तड़प बढ़ेगी और
रूह होगी विह्वल !

बारिश हो और भींग न पाएँ
भूख़ हो और खा न पाएँ
इश्क हो और कह न पाएँ
जाने क्या क्या न कर पाएँ !

सशक्त शरीर
पर होते हम असफल,
रूह तो यूँ भी
होती है निर्बल,
जो है अभी हीं
कर लें पूर्ण,
किसी शायद पर
नहीं यकीन सम्पूर्ण !

फिर भी जो न मिल सका
उम्मीद से जीवन लें सजा,
शायद हो इस जन्म के बाद
रूह के सफ़र की नयी शुरुआत !

__ जेन्नी शबनम __ १०. १०. १०

____________________________________________________

Friday, October 8, 2010

180. अपने पाँव... / apne paanv...

अपने पाँव...

*******

क्या बस इतना ही
और सब ख़त्म... !
एक कदम भी नहीं
और सफ़र का अंत... !

उम्मीद नहीं
अब चल पाऊँगी
पहुँच पाऊँगी
दुनिया के उस
अंतिम छोर तक
जिसे निहारती रही
अनवरत वर्षों,
सोचती थी
कभी तो फ़ुर्सत मिलेगी
और जा पहुँचूँगी
अपने पाँव से
वहाँ उस छोर पर
जहाँ सीमा समाप्त होती है
दुनिया की !

अब
नहीं जा सकूँगी कभी
बस निहारती रहूँगी
धुँधली नज़रों से
जहाँ तक भी जाए
निगाह
चाहे समतल ज़मीन हो
या फिर
स्वप्निल आकाश !

कदम तो न बढ़ेंगे
पर नज़र थम-थम कर
साफ़ हो जायेगी,
फिर शायद
निहारूँ
उस जहां को
जहाँ कभी नहीं पहुँच सकूँगी
न चल सकूँगी कभी
अपने पाँव !

- जेन्नी शबनम (8. 10. 2010)

_________________________________

apne paanv...

*******

kya bas itna hi
aur sab khatm... !
ek kadam bhi nahin
aur safar ka ant... !

ummid nahin
ab chal paaungi
pahunch paaungi
duniya ke us
antim chhor tak
jise niharati rahi
anavarat varshon,
sochti thee
kabhi to fursat milegi
aur ja pahunchungi
apne paanv se
vahaan us chhor par
jahaan seema samaapt hotee hai
duniya kee !

ab
nahin ja sakungi kabhi
bas nihaarti rahungi
dhundhli nazron se
jahaan tak bhi jaaye
nigaah
chaahe samtal zameen ho
ya phir
svapnil aakaash !

kadam to na badhenge
par nazar tham-tham kar
saaf ho jaayegi,
fir shaayad
nihaarun
us jahaan ko
jahan kabhi nahi pahunch sakungi
na chal sakungi kabhi
apne paanv !

- jenny shabnam (8. 10. 2010)

____________________________________

Tuesday, October 5, 2010

179. स्याह अँधेरों में न जाना तुम... / syaah andheron mein na jana tum...

स्याह अँधेरों में न जाना तुम...

*******

वो कहता
जाने क्यों कहता ?
स्याह अँधेरों में
न जाना तुम
उदासी कभी भी
न ओढ़ना तुम
भोर की लालिमा सी
सदा दमकना तुम !

कैसे समझाएँ ?
क्या बतलाएँ ?
उजाले से
दिल कितना घबराता है
चेहरे की चुप्पी में
हर अनकहा दिख जाता है
ख़ुशी ठहरती नहीं
मन तो बहुत चाहता है !

मैंने कोई वादा न किया
उसने कसम क्यों न दिया ?
अब तय किया है
तकदीर के किस्से
उजालों में दफ़न होंगे
दिल में हों अँधेरे मगर
कतार दीयों के सजेंगे
उजाले ही उजाले चहुँ ओर
'शब' के अँधेरे
किसी को न दिखेंगे !

- जेन्नी शबनम (21. 9. 2010)

________________________________

syaah andheron mein na jana tum...

*******

wo kahta
jaane kyon kahta ?
syaah andheron mein
na jana tum
udaasi kabhi bhi
na odhna tum
bhor ki laalima si
sada damakna tum !

kaise samjhaayen ?
kya batlaayen ?
ujaale se
dil kitana ghabraata hai,
chehre ki chuppi mein
har ankaha dikh jata hai,
khushi thaharti nahin
mann to bahut chaahta hai !

maine koi vada na kiya
usne kasam kyon na diya ?
ab taye kiya hai
par takdir ke kisse
ujaalon mein dafan honge
dil mein hon andhere magar
kataar diyon ke sajenge
ujaale hi ujaale chahun ore
'shab' ke andhere
kisi ko na dikhenge !

- jenny shabnam (21. 9. 2010)

______________________________________

Wednesday, September 29, 2010

178. हँसी... / Hansi...

जिस दिन ऑरकुट पर अपनी दूसरी प्रोफाइल बनाई उसी समय ये रचना लिखी  यूँ कहें कि मैं बोलती गई और मेरा बेटा टाइप करता गया, क्योंकि एक शब्द भी टाइप करने में मैं बहुत वक़्त ले रही थी; मैं अपने बेटे से ऑरकुट और टाइपिंग दोनों सीख रही थी  पहली प्रोफाइल पर एक ऐसी घटना हुई कि उसे हटाना पड़ा लेकिन इस त्वरित (instant) कविता का जन्म हुआ  अब लिखती तो शायद कुछ परिवर्तन ज़रुर होता पर उस दिन त्वरित (instant) कविता पहली बार लिखी तो उसमें बदलाव करने का मन नहीं किया  शब्द भाव यथावत प्रस्तुत है...

हँसी...

*******

हँसी पे मत जाओ
बड़ी मुसीबत होती है,
एक हँसी के वास्ते आँसुओं से मिन्नत
हज़ार करनी होती है !

जज़्ब न हो जाते आँसू जबतक
बड़ी मुश्किल होती है,
एक हँसी के वास्ते तरकीबें
हज़ार करनी होती हैं !

दिखे न मुस्कुराहट जबतक
बड़ी जद्दोज़हद करनी होती है,
एक हँसी के वास्ते हँसी की ओट में ग़म
हज़ार छुपानी होती है !

खिलखिलाती हँसी भी अजीब होती है
बड़ी दिक्कत से टिकी होती है,
एक हँसी के वास्ते रब से दुआएँ
हज़ार करनी होती है !

हँसी पे मत जाओ
बड़ी ख़तरनाक भी होती है,
एक हँसी के वास्ते जंग सौ
हज़ार गुनाह कराती है !

हँसी पे मत जाओ
बहुत रुलाती बड़ी बेवफा होती है,
एक हँसी के वास्ते मौत
हज़ार मरनी होती है !

हँसी ख़ुदा की नेमत होती है
जिसे मिलती बड़ी तकदीर होती है,
एक हँसी के वास्ते सौ फूल खिलाती
हज़ार ग़म भूलाती है !

- जेन्नी शबनम (18. 8. 2008)

________________________________

Hansi...

******

Hansi pe mat jaao
badi musibat hoti hai,
Ek hansi ke waaste aansuon se minnat
hazaar karni hoti hai.

Jazb na ho jate aansoo jabtak
badi mushkil hoti hai,
Ek hasi ke waste tarkibein
hazaar karni hoti hain.

Dikhe na muskuraahat jabtak
badi jaddozehad karni hoti hai,
Ek hasi ke waste hansi ki oat me gham
hazaar chhupaani hoti hai.

Khilkhilati hasi bhi ajeeb hoti hai
badi dikkat se tiki hoti hai,
Ek hasi ke waste rab se duaayen
hazaar karni hoti hai.

Hansi pe mat jaao
badi khatarnaak bhi hoti hai,
Ek hansi ke waaste jung sou
gunaah hazaar karaati hai.

Hansi pe matt jaao
bahut rulaati badi bewafa hoti hai,
Ek hansi ke waaste mout
hazaar marni hoti hai.

Hansi khuda ki nemat hoti hai
jise milti badi takdeer hoti hai,
Ek hansi ke waaste sou phool khilaati
gam hazaar bhoolati hai.

- jenny shabnam (18. 8. 2008)

_____________________________________

Sunday, September 26, 2010

177. दंभ हर बार टूटा... / dambh har baar toota...

दंभ हर बार टूटा...

*******

रिश्ते बँध नहीं सकते
जैसे वक़्त नहीं बँधता,
पर रिश्ते रुक सकते हैं
वक़्त नहीं रुकता !
फिर भी कुछ तो
है समानता,
न दिखे पर दोनों
साथ है चलता !
नहीं मालूम
दूरी बढ़ी
या कि
फासला न मिटा,
पर कुछ तो है कि
साथ होने का दंभ
हर बार टूटा !

- जेन्नी शबनम (8. 9. 2010)

_____________________________

dambh har baar toota...

*******

rishte bandh nahin sakte
jaise waqt nahin bandhta,
par rishte ruk sakte hain
waqt nahin rukta !
fir bhi kuchh to
hai samaanta,
na dikhe par donon
saath hai chalta !
nahin maloom
doori badhi
yaa ki
faasla na mita,
par kuchh to hai ki
saath hone ka dambh
har baar toota !

- jenny shabnam (8. 9. 2010)

____________________________

Wednesday, September 22, 2010

176. पलाश के बीज / गुलमोहर के फूल... / palaash ke beej / gulmohar ke phool...

पलाश के बीज / गुलमोहर के फूल...

*******

याद है तुम्हें
उस रोज़ चलते-चलते
राह के अंतिम छोर तक
पहुँच गए थे हम,
सामने एक पुराना सा मकान
जहाँ पलाश के पेड़
और उसके खूब सारे
लाल-लाल बीज,
मुट्ठी में बटोर कर
हम ले आए थे
धागे में पिरो कर
मैंने गले का हार बनाया,
बीज के ज़ेवर को पहन
दमक उठी थी मैं
और तुम
बस मुझे देखते रहे
मेरे चेहरे की खिलावट में
कोई स्वप्न देखने लगे
कितने खिल उठे थे न हम !

अब क्यों नहीं चलते
फिर से किसी राह पर,
बस यूँ ही
साथ चलते हुए
उस राह के अंत तक
जहाँ गुलमोहर के पेड़ों की
कतारें हैं,
लाल-गुलाबी फूलों से सजी
राह पर
यूँ ही बस...
फिर वापस लौट आऊँगी
यूँ ही खाली हाथ
एक पत्ता भी नहीं
लाऊँगी अपने साथ !

- जेन्नी शबनम (20. 9. 2010)

_________________________________

palaash ke beej / gulmohar ke phool...

*******

yaad hai tumhen
us roz chalte-chalte
raah ke antim chhor tak
pahunch gaye they hum,
saamne ek puraana sa makaan
jahaan palaash ke ped
aur uske khoob saare
laal-laal beej,
mutthi mein bator kar
hum le aaye they
dhaage mein piro kar
maine gale ka haar banaaya,
beej ke jevar ko pahan
damak uthi thi main
aur tum
bas mujhe dekhte rahe
mere chehre ki khilaavat mein
koi swapn dekhne lage
kitne khil uthe they na hum !

ab kyon nahin chalte
fir se kisi raah par,
bas yun hi
saath chalte huye
us raah ke ant tak
jahaan gulmohar ke pedon ki
kataaren hain,
laal-gulaabi fulon se saji
raah par
yun hi bas...
fir waapas lout aaoongi
yun hi khaali haath
ek patta bhi nahin
laaungi apne sath !

- jenny shabnam (20. 9. 2010)

_______________________________

Monday, September 20, 2010

175. प्रिय है मुझे मेरा पागलपन... / priye hai mujhe mera pagalpan...

प्रिय है मुझे मेरा पागलपन...

*******

कुदरत की
बैसाखी मिली
मैं जी सकूँ
ये किस्मत मेरी,
इसीलिए
ख़ुद से ज्यादा
प्रिय है
मुझे मेरा पागलपन !
कुछ भी कर लूँ
माफ़ न करो,
नहीं स्वीकार
कोई एहसान मुझे !
सच कहते हो
मैं पागल हूँ,
होना भी
नहीं मुझे
तुम्हारी दुनिया जैसा,
मैं हूँ भली
अपने पागलपन के साथ !
कहते हो तुम
छोड़ आओगे
मुझको किसी
पागलखाने में,
आज अब राज़ी हूँ
इस दुनिया को छोड़
उस दुनिया में जाने को,
चलो पहुँचा दो मुझे
प्रिय है मुझे
मेरा पागलपन !

- जेन्नी शबनम (7. 9. 2010)

_______________________________

priye hai mujhe mera pagalpan...

*******

kudrat ki
baisaakhi mili
main ji sakun
ye kismat meri,
isiliye
khud se jyaada
priye hai
mujhe mera pagalpan !
kuchh bhi kar lun
maaf na karo,
nahin svikaar
koi yehsaan mujhe !
sach kahte ho
main pagaal hun,
hona bhi
nahin mujhe
tumhaari duniya jaisa,
main hun bhali
apne pagalpan ke saath !
kahte ho tum
chhod aaoge
mujhko kisi
pagalkhaane mein,
aaj ab raazi hun
is duniya ko chhod
us duniya mein jaane ko,
chalo pahuncha do mujhe
priye hai mujhe
mera pagalpan !

- jenny shabnam (7. 9. 2010)

_____________________________

Wednesday, September 15, 2010

174. मन भी झुलस जाता है... / mann bhi jhulas jata hai...

मन भी झुलस जाता है...

*******

मेरे इंतज़ार की
इंतेहा देखते हो,
या कि अपनी बेरुखी से
ख़ुद खौफ़ खाते हो !
नहीं मालुम क्यों हुआ
पर कुछ तो हुआ है
बिना चले ही कदम
थम कैसे गए ?
क्यों न दी आवाज़ तुमने ?
हर बार लौटने की
क्या मेरी ही बारी है ?

बार-बार वापसी
नहीं है मुमकिन,
जब टूट जाता है बंधन
फिर रूठ जाता है मन !
पर इतना अब मान लो
इंतज़ार हो कि वापसी
जलते सिर्फ पाँव ही नहीं
मन भी झुलस जाता है !

- जेन्नी शबनम (13. 9. 2010)

_______________________________

mann bhi jhulas jata hai...

*******

mere intzaar ki
intahaan dekhte ho,
ya ki apni berukhi se
khud khouf khaate ho !
nahin maalum kyon hua
par kuchh to hua hai
bina chale hin kadam
tham kaise gaye ?
kyon na dee aawaaz tumne ?
har baar loutne ki
kya meri hin baari hai ?

baar-baar wapasi
nahin hai mumkin,
jab toot jata hai bandhan
phir ruth jata hai mann !
par itna ab maan lo
intzaar ho ki vaapasi
jalte sirf paanv hin nahin
mann bhi jhulas jata hai !

- jenny shabnam (13. 9. 2010)

_________________________________

Tuesday, September 14, 2010

173. अज्ञात शून्यता... / agyaat shoonyata...

अज्ञात शून्यता...

*******

एक शून्यता में
प्रवेश कर गई हूँ
या कि मुझमें
शून्यता प्रवाहित हो गई है,
थाह नहीं मिलता
किधर खो गई हूँ
या जान बुझकर
खो जाने दी हूँ स्वयं को !

कँपकपाहट है
और डर भी
बदन से छूट जाना चाहते
अंग मेरे सभी,
हाथ में नहीं आता
कोई ओस-कण
थर्रा रहा काल
कदाचित महाप्रलय है !

मुक्ति की राह है
या फिर कोई भयानक गुफ़ा,
क्यों खींच रहा मुझे
जाने कौन है उस पार ?
शून्यता है पर
संवेदनशून्यता क्यों नहीं ?
नहीं समझ मुझे
यह क्या रहस्य है,
मेरा या मेरी इस
अज्ञात शून्यता का !

- जेन्नी शबनम (14. 9. 2010)

_____________________________

agyaat shoonyata...

*******

ek shoonyata mein
pravesh kar gai hun
ya ki mujhmein
shoonyata pravaahit ho gai hai,
thaah nahin milta
kidhar kho gai hun
ya jaan bujhkar
kho jaane dee hun svayam ko !

kanpkapaahat hai
aur darr bhi
badan se chhut jana chaahte
ang mere sabhi,
haath mein nahin aataa
koi os-kan,
tharra raha kaal
kadaachit mahapralay hai !

mukti ki raah hai
ya fir koi bhayaanak gufa,
kyon kheench raha mujhe
jaane koun hai us paar ?
shoonyata hai par
samvedanshunyata kyon nahin?
nahin samajh mujhe
yeh kya rahasya hai,
mera ya meri is
agyaat shoonyata ka !

- jenny shabnam (14. 9. 2010)

_________________________________

Tuesday, September 7, 2010

172. नज़्म को ही ठुकरा दिए वो / nazm ko hi thukra diye wo

नज़्म को ही ठुकरा दिए वो

*******

सवाल-ए-वस्ल पर, मुस्कुरा दिए वो
हर बार हमें रुला के, बिखरा दिए वो !

शायरी में नज़्म कह के, सजाया हमें
अब इस नज़्म को ही, ठुकरा दिए वो !

जाएँगे कहाँ, मालूम ही कब है हमको
गुज़रे एहसास को भी, बिसरा दिए वो !

पूछने की इजाज़त, मिली ही कब हमें
कभी फ़ासला न सिमटे, पहरा दिए वो !

दर्द की बाबत, 'शब' से न पूछना कभी
वस्ल हो कि हिज़्र, ज़ख़्म गहरा दिए वो !

- जेन्नी शबनम (7. 9. 2010)

________________________________

nazm ko hi thukra diye wo

*******

savaal-e-vasl par, muskura diye wo
har baar hamen rula ke, bikhra diye vo !

shaayari mein nazm kah ke, sajaaya hamen
ab is nazm ko hi, thukra diye wo !

jaayenge kahaan, maaloom hi kab hai hamako
guzre ehsaas ko bhi, bisra diye wo !

puchhne ki ijaazat, mili hi kab hamein
kabhi faasla na simte, pahra diye wo !

dard ki baabat, 'shab' se na puchhna kabhi
vasl ho ki hizr, zakhm gahra diye wo !

- jenny shabnam (7. 9. 2010)

_______________________________________

Sunday, September 5, 2010

171. मेरी दुनिया... / meri duniya...

मेरी दुनिया...

*******

यथार्थ से परे
स्वप्न से दूर
क्या कोई दुनिया होती है ?
शायद मेरी दुनिया होती है !
एक भ्रम... अपनों का
एक भ्रम... जीने का
कुछ खोने और पाने का
विफलताओं में आस बनाए रखने का
नितांत अकेली मगर भीड़ में खोने का !
ये लाज़िमी है
ऐसी दुनिया न बनाऊँ
तो जिऊँ कैसे ?

- जेन्नी शबनम (4. 9. 2010)

_____________________________

meri duniya...

*******

yathaarth se parey
swapn se door
kya koi duniya hoti hai ?
shaayad meri duniya hotee hai !
ek bhram... apnon ka
ek bhram... jine ka
kuchh khone aur paane ka
vifaltaaon mein aas banaaye rakhne ka
nitaant akeli magar bheed mein khone ka !
ye lazimi hai
aisi duniya na banaaun
to jiyun kaise ?

- jenny shabnam (4. 9. 2010)

_________________________________________

Saturday, September 4, 2010

170. अंतिम पड़ाव अंतिम सफ़र... / antim padaav antim safar...

अंतिम पड़ाव अंतिम सफ़र...

*******

जाने कैसा भटकाव था
या कि कोई पड़ाव था,
नहीं मालुम क्या था
पर न जाने क्यों था,
मुमकिन कि वहीं ठहर गई
या शायद राह ही ख़त्म हुई !

दरख़्त के साए में
कुछ पौधे भी मुरझा जाते हैं,
कौन कहे कि चले जाओ
सफ़र के नहीं हमराही हैं,
वक़्त की मोहताज़ नहीं
पर वक़्त से कब हारी नहीं ?

चलो भूल जाओ काँटों को
ज़ख्म समेट लो,
सिर पर ताज हो
और पाँव में छाले हों,
हँसते ही रहना फिर भी
शायद यह अभिशाप हो !

वादा किया है कि
मन में हँसी भर दोगे,
उम्मीद ख़त्म हुई ही कहाँ
अब भी इंतज़ार है...
कोई एक हँसी
कोई एक पल,
वो एक सफ़र
जो पड़ाव था,
शायद रुक जाएँ
हम दोनों वहीं,
उसी जगह गुज़र जाए
पहला और अंतिम सफ़र !

- जेन्नी शबनम (3. 9. 2010)

_______________________________

antim padaav antim safar...

*******

jaane kaisa bhatkaav tha
ya ki koi padaav tha,
nahin maloom kya tha
par na jaane kyon tha,
mumkin ki vahin thahar gai
ya shaayad raah hi khatm hui.

darakht ke saaye mein
kuchh poudhe bhi murjha jaate hain,
koun kahe ki chale jaao
safar ke nahin humraahi hain,
vakt kee mohtaaz nahin
par vaqt se kab haari nahin ?

chalo bhool jaao kaanton ko
zakhm samet lo,
sir par taaj ho
aur paanv mein chhaale hon,
hanste hin rahna fir bhi
shaayad yah abhishaap ho.

vaadaa kiya hai ki
mann mein hansi bhar doge,
ummid khatm hui hin kahaan
ab bhi intzaar hai...
koi ek hansi
koi ek pal,
vo ek safar
jo padaav tha,
shaayad ruk jaayen
hum dono vahin,
usi jagah guzar jaaye
pahla aur antim safar.

- jenny shabnam (3. 9. 2010)

________________________________________

Friday, September 3, 2010

169. छोटी-सी चिड़िया... / chhoti-see chidiya...

छोटी-सी चिड़िया...

*******

स्वरचित घोंसले में अपने
दाना पानी जोड़, जीवन भर का
थी निश्चिन्त, छोटी-सी चिड़िया !

सोचा, अब चैन से जी लूँ ज़रा
मन-सा एक साथी पा
थी खुशहाल, छोटी सी चिड़िया !

पहले झंझावत में ही, घोंसला टूटा
उड़ गया साथी, उसके मन का
रह गई अकेली, छोटी सी चिड़िया !

सपने टूटे, अपने छूटे
न दाना, न ठिकाना
हुई बदहाल, छोटी सी चिड़िया !

साँसें अटकी, राहें तकती
कोई तो बटोही, पार लगाए
हुई अशक्त, छोटी सी चिड़िया !

ख़ुद से रूठी, साँसें उड़ गई
ख़त्म हुई, उसकी कहानी
सभी भूले, छोटी-सी चिड़िया !

- जेन्नी शबनम (28. 8. 2010)

______________________________

chhoti-see chidiya...

*******

swarachit ghosle mein apne,
dana paani jod, jivan bhar ka,
thee nishchint, chhoti see chidiya.

sochi, ab chain se ji lun zara
mann sa ek saathi paa
thee khush.haal chhoti see chidiya.

pahle jhanjhaawat mein hin, ghonsla toota
ud gaya saathi, uske mann ka
rah gai akeli, chhoti see chidiya.

sapne toote, apne chhute
na daana, na thikaana
hui bad.haal chhoti see chidiya.

saansein atki, raahein takti
koi to batohi, paar lagaaye
hui ashakt, chhoti see chidiya.

khud se roothi, saansein ud gai
khatm hui, uski kahaani
sabhi bhoole, chhoti see chidiya.

- jenny shabnam (28. 8. 2010)

__________________________________

Wednesday, September 1, 2010

168. क्या मैं आज़ाद हूँ ... / kya main aazaad hun...

क्या मैं आज़ाद हूँ

*******

"क्या मैं आज़ाद हूँ ?"
ये प्रश्न अनुत्तरित है
और एहसास
अंतस की अव्यक्त पीड़ा 
महज़ सीमित है
संविधान के पन्नों में सिमटी
आज़ादी और स्वतंत्रता 
हम जीवित इंसानों की हर आज़ादी पर
है अंकुश का आघात बड़ा 

सबने कहा, सबसे सुना
कहते ही रहे हैं हम सदा
मैं आज़ाद हूँ, वो आज़ाद है
हम आज़ाद हैं 
पर दिखी नहीं कभी
इंसानों की आज़ादी
उनकी चेतना और मन की आज़ादी 
हर इंसान को
अपने धर्म, संस्कार, परंपरा और रिश्तों में
घुटता पाया कैदी 

कौमों और सियासत की जंग में
हर आम इंसान है जकड़ा 
जज़्बात और धर्म पर पहरा
मन की अभिव्यक्ति पर पहरा
तसलीमा और मक़बूल जैसों पर
देशद्रोही और फ़तवा का कहर है बरपा 
दुश्मनों की क्या बात करें
दोस्तों को ज़िबह करते देखना
भी है सदमा 

धर्म और रिवाजों पर बलि चढ़ते
हम मूक संस्कारों को हैं देखते,
अस्मत और किस्मत को लूटते-बचते
हर लम्हा हम कितना हैं तड़पते,
रात को चैन की नींद सो सकें
हम अपने घरों में खौफ़ से हैं गुजरते,
देश के प्रहरी मुल्कों से ज्यादा
अपने घर को आतंक से बचाने में
रात जागते, जान हैं गंवाते 

एक रोटी के वास्ते नीलाम होती कन्या
और बंधक बनती है संतान,
एक रोटी के वास्ते वतन त्यागता
धर्म बदलता और बदलता अपना ईमान है इंसान,
एक रोटी के वास्ते कचरों से जानवरों संग
जूठन बटोरता भूखा लाचार है इंसान,
एक रोटी के वास्ते अपनों के खून का
प्यासा, बन जाता है इंसान 

न ये पूछना है, न कहना है -
"क्या मैं आज़ाद हूँ"
कुबूल नहीं हमें
ये आज़ादी,
कुछ कर गुजरना है
कि मान सकें हम
''मैं आज़ाद हूँ !''

- जेन्नी शबनम (5. 10. 2008)

________________________________

kya main aazaad hun...

*******

"Kya main aazaad hun ?"
Ye prashna anuttarit hai
aur ehsaas
antas ki avyakt peeda.
Mahaz seemit hai
samvidhaan ke pannon mein simtee
aazaadi aur swatantrata.
Hum jiwit insaano ki har aazaadi par,
hai ankush ka aaghaat bada.

Sabne kaha, sabse suna
kahte hin rahe hain hum sada
Mai aazaad hun, wo aazaad hai,
hum aazaad hain.
Par dikhi nahi kabhi
insaano ki aazaadi
unki chetna aur mann ki aazaadi.
Har insaan ko
apne dharm, sanskar, parampara aur rishton mein
ghutata paya kaidi.

Kaumo aur siyasat ki jung mein
har aam insaan hai jakda.
Jazbaat aur dharm par pahra
mann ki abhivyakti par pahra.
Taslima aur maqbool jaison par
deshdrohi aur fatwa ka kahar hai barpa.
Dushmano ki kya baat karen
doston ko jibah karte dekhna
bhi hai sadma.

Dharm aur riwazon per bali chadhte
hum mook sanskaron ko hain dekhte,
Asmat aur kismat ko lootate-bachate
har lamha hum kitna hain tadapte,
Raat ko chain ki neend so saken
hum apne gharon mein khauff se hain gujarte,
Desh ke prahari mulkon se jyada
apne ghar ko aatank se bachane mein
raat jagte, jaan hain ganwaate.

Ek roti ke waste neelaam hoti kanya
aur bandhak banti hai santaan,
Ek roti ke waste watan tyagta
dharm badalta aur badalta apna imaan hai insaan,
Ek roti ke waste kachro se janwaro sang
juthan batorta bhukha laachaar hai insaan,
Ek roti ke waste apno ke khoon ka
pyasa, ban jata hai insaan.

Na ye puchhna hai, na kahna hai -
"kya main aazaad hun ?"
Kubul nahi hamein
ye aazaadi,
kuchh kar gujarna hai
ki maan saken hum
"main aazaad hun !"

- jenny shabnam (5. 10. 2008)

__________________________________________________


Friday, August 27, 2010

167. देह, अग्नि और आत्मा... जाने कौन चिरायु ? / deh, agni aur aatma... jaane koun chiraayu ?

देह, अग्नि और आत्मा... जाने कौन चिरायु ?

*******

जलती लकड़ी पर जल डाल दें
अग्नि बुझ जाती है
और धुएँ उठते हैं
राख शेष रह जाती है
और कुछ अधजले अवशेष बचते हैं,
अवशेष को, जब चाहें जला दें
जब चाहें बुझा दें !

क्या हमारे मन की अग्नि को
कोई जल बुझा सकता है
क्या एक बार बुझ जाने पर
अवशेष को फिर जला सकते हैं
क्यों बच जाती है सिर्फ देह और साँसें
आत्मा तो मर जाती है
जबकि कहते कि, आत्मा तो अमर है !

नहीं समझ पायी अब तक
क्यों होता है ऐसा
आत्मा अमर है, फिर मर क्यों जाती
क्यों नहीं सह पाती
क्रूर वेदना या कठोर प्रताड़ना
क्यों बुझा मन, फिर जलता नहीं ?

नहीं-नहीं, बहुत अवसाद है शायद
इंसान की तुलना, अग्नि से ?
नहीं-नहीं, कदापि नहीं !
अग्नि तो पवित्र होती है
हम इंसान ही अपवित्र होते हैं
शायद...
इसीलिए...
देह, अग्नि और आत्मा
जाने कौन चिरायु ?
कौन अमर ?
कौन...?

- जेन्नी शबनम (22. 8. 2010)

_______________________________________

deh, agni aur aatma...jaane koun chiraayu ?

*******

jalti lakdi par jal daal den
agni bujh jaati hai
aur dhuyen uthte hain
raakh shesh rah jaati hai
aur kuchh adhjale avshesh bachte hain,
avshesh ko, jab chaahen jalaa den
jab chaahen bujha deyn.

kya hamaare mann ki agni ko
koi jal bujha sakta hai
kya ek baar bujh jaane par
avshesh ko phir jalaa sakte hain
kyon bach jaati hai sirf deh aur saansen
aatma to mar jaati hai
jabki kahte ki, aatma to amar hai !

nahin samajh paayi ab tak
kyon hota hai aisa
aatma amar hai, phir mar kyon jaati
kyon nahin sah paati
krur vedna ya kathor prataadna
kyon bujhaa mann, phir jalta nahin ?

nahin-nahin, bahut avsaad hai shaayad
insaan ki tulana, agni se ?
nahin-nahin, kadaapi nahin !
agni to pavitra hoti hai
hum insaan hi apavitra hote hain !
shaayad...
isiliye...
deh, agni aur aatma
jaane koun chiraayu ?
koun amar ??
koun...???

- jenny shabnam (22. 8. 2010)

_____________________________________

Sunday, August 22, 2010

166. इकन्नी-दुअन्नी और मैं चलन में नहीं.../ ikanni duanni aur main chalan mein nahin...

इकन्नी-दुअन्नी और मैं चलन में नहीं...

*******

वो गुल्लक फोड़ दी
जिसमें एक पैसे दो पैसे, मैं भरती थी,
तीन पैसे और पाँच पैसे भी थे, थोड़े उसमें
दस पैसे भी कुछ, बचा कर रखी थी उसमें,
सोचती थी, खूब सारे सपने खरीदूँगी इससे
इत्ते ढ़ेर सारे पैसों में तो, ढ़ेरों सपने मिल जाएँगे !

बचपन की ये अनमोल पूँजी
क्या यादों से भी चली जाएगी ?
अपनी उसी चुंदरी में बाँध दी
जिसे ओढ़ पराये देश आई थी,
अपने इस कुबेर के ख़जाने को टीन की पेटी (बक्सा)
जो मेरी माँ से मिली थी, उसमें छुपा लाई थी,
साथ में उन यादगार लम्हों को भी
जब एक-एक पैसे, गुल्लक में डालती थी,
सोचती थी, खूब सारा सपना खरीदूँगी
जब इस घर से उस घर चली जाऊँगी ।

अब क्या करूँ इन पैसों का ?
मिटटी के गुल्लक के टूटे टुकड़ों का ?
पैसों का अम्बार और गुल्लक के छोटे-छोटे लाल टुकड़े
बार-बार अँचरा के गाँठ खोल निहारती हूँ,
इकन्नी दुअन्नी में भी कहीं सपने बिकते हैं
जब चाह पालती हूँ, ख़ुद से हर बार पूछती हूँ,
नहीं खरीद पाई मैं, आज तक एक भी सपना
बचपन का जोगा ( इकत्रित / संजोया) पैसा
अब चलन में जो नहीं रहा ।

चलन में तो, मैं भी न रही अब
पैसों के साथ ख़ुद को, बाँध ही दूँ अब,
चलन से मैं भी उठ गई, और ये पैसे भी मेरे
अच्छा है, एक साथ दोनों चलन में न रहे,
गुल्लक और पैसे, मेरे सपनों की यादें हैं
एक ही चुंदरी में बँधे, सब साथ जीते हैं,
उस टीन की पेटी में, हिफाज़त से सब बंद है
मेरे पैसे, मेरे सपने, गुल्लक के टुकड़े और मैं ।

- जेन्नी शबनम (20. 08. 2010)
________________________________________

ikanni-duanni aur main chalan mein nahin...

*******

vo gullak phod di,
jismein ek paise do paise, main bhartee thee,
teen paise aur paanch paise bhi they, thode usmen
dus paise bhi kuchh, bachaa kar rakhi thi usmen,
sochti thi, khoob saare sapne kharidungi isase
itte dher saare paison men to, dheron sapne mil jayenge.

bachpan ki ye anmol punji
kya yaadon se bhi chali jaayegi ?
apni usi chundri men baandh di
jise odh paraaye desh aai thi.
apne is kuber ke khajane ko teen kee peti ( box)
jo meri maa se mili thee, usmein chhupa laayee thee,
saath mein un yaadgaar lamhon ko bhi
jab ek-ek paise, gullak mein daalti thee,
sonchti thee, khoob saara sapna kharidungi
jab is ghar se us ghar chali jaaungi.

ab kya karun is paiso ka ?
mitti ke gullak ke toote tukdon ka ?
paison ka ambaar aur gullak ke chhote chhote laal tukade
baar baar anchraa ke gaanth khol niharati hun,
ikanni duanni mein bhi kahin sapne bikate hain
jab chaah paalti hun, khud se har baar puchhti hun,
nahin kharid paai main, aaj tak ek bhi sapnaa
bachpan ka joga ( ikatrit/ sanjoya) paisa
ab chalan men jo nahin raha.

chalan mein to, main bhi na rahi ab,
paison ke sath khud ko, baandh hin dun ab,
chalan se main bhi uth gaee, aur ye paise bhi mere
achchha hai, ek sath donon chalan mein na rahe,
gullak aur paise, mere sapnon ki yaadein hain
ek hin chundri men bandhe, sab saath jite hain,
us teen kee peti mein, hifaazat se sab band hai
mere paise, mere sapne, gullak ke tukde aur main.

- jenny shabnam (20. 8. 2010)

____________________________________________________

Tuesday, August 17, 2010

165. जीवन की अभिलाषा... / jivan ki abhilasha...

जीवन की अभिलाषा...

*******

कोई अनजाना
जो है अनदेखा
सुन लेता समझ लेता
लिख जाता पढ़ जाता
कह देता वो सब
जो मेरे मन ने था चाहा !
भला कैसे होता है ये संभव ?
संवेदनाएँ अलग-अलग होती हैं क्या ?
नहीं आया अब तक मुझे
अनदेखे को देखना
अनपढ़े को पढ़ना
अनकहे को लिखना
अनबुझे को समझना !
क्षण-क्षण का अस्वीकार क्यों ?
जीवन को परखना न आया क्यों ?
निर्धारित पथ का अनुपालन ही उचित क्यों ?
विस्मित हूँ, विफल नहीं
स्तब्ध हूँ, अधैर्य नहीं,
उलझन है पर रहस्य नहीं
पथ है पर साहस नहीं !
अविश्वास स्वयं पर क्यों ?
कामना फिर अक्षमता क्यों ?
हर डोर हाथ में फिर दूर क्यों ?
समय और डगर की भाषा
ले आएगी सम्मुख मेरे,
एक दिन निःसंदेह
जीवन की हर अभिलाषा !

- जेन्नी शबनम (17. 8. 2010)

___________________________

jivan ki abhilasha...

*******

koi anjaana
jo hai andekha
sun leta samajh leta
likh jaata padh jaata
kah deta vo sab
jo mere mann ne tha chaaha !
bhalaa kaise hota hai ye sambhav ?
samvednaayen alag-alag hoti hain kya ?
nahin aaya ab tak mujhe
andekhe ko dekhna
anpadhe ko padhna
ankahe ko likhna
anbujhe ko samajhna !
kshan-kshan ka asvikaar kyon ?
jivan ko parakhna na aaya kyon ?
nirdhaarit path ka anupaalan hi uchit kyon ?
vismit hun, vifal nahin
stabdh hun, adhairya nahin,
uljhan hai par rahasya nahin
path hai par saahas nahin !
avishvaas svayam par kyon ?
kaamna fir akshamta kyon ?
har dor hath men fir door kyon ?
samay aur dagar ki bhaasha
le aayegi sammukh mere,
ek din nihsandeh
jivan ki har abhilaasha !

- jenny shabnam (17. 8. 2010)

________________________________________

Monday, August 9, 2010

164. काँटा भी एक चुभा देगा.../ kaanta bhi ek chubha dega...

काँटा भी एक चुभा देगा...

*******

हौले से काँटा भी एक चुभा देगा
हाँथ में जब कोई फूल थमा देगा,

आह निकले तो हाथ थाम लेगा
फिर धीमे से वो ज़ख़्म चूम लेगा,

कह देगा तेरे वास्ते ही तो गया था
कई दरगाह से दुआ माँग लाया था,

तेरी ही दुआ के फूल तुझे दिया हूँ
चुभ गया काँटा तो क्या दोषी मैं हूँ ?

इस छल का नहीं होता कोई जवाब
न बचता फिर करने को कोई सवाल,

ये सिलसिला यूँ ही तो नहीं चलता है
जीवन किसी के साथ बँध जो जाता है !

__ जेन्नी शबनम (8. 8. 2010)

__________________________________

kaanta bhi ek chubha dega...

*******

houle se kaanta bhi ek chubha dega
haanth men jab koi phool thamaa dega,

aah nikle to haath thaam lega
phir dhime se vo zakhm choom lega,

kah dega tere vaaste hi to gaya tha
kai dargaah se dua maang laaya tha,

teri hi dua ke phool tujhe diya hun
chubh gaya kaanta to kya doshi main hun ?

is chhal ka nahin hota koi jawaab
na bachta phir karne ko koi sawaal,

ye silsila yun hi to nahin chalta hai
jivan kisi ke saath bandh jo jaata hai !

- jenny shabnam (8. 8. 2010)

___________________________________________

163. मैं कितनी पागल हूँ न... / main kitni paagal hun na...

मैं कितनी पागल हूँ न...

*******

मैं कितनी पागल हूँ न !
तुम्हारा हाल भी नहीं पूछी
और तपाक से माँग कर बैठी -
एक छोटा चाँद ला दो न
अपने संदूक में रखूँगी
रोज़ उसकी चाँदनी निहारुँगी !

मैं कितनी पागल हूँ न !
पर तुम भी तो बस...
कहाँ समझे थे मुझे
चाँद न सही चाँदी का ही चाँद बनवा देते
मेरी न सही ज्योतिष की बात मान लेते,
सुना है चाँद और चाँदी दोनों पावन है
उनमें मन को शीतल करने की क्षमता है !

देखो न मेरा पागलपन !
मैं कितना तो गुस्सा करती हूँ
जब तुम घर लौटते हो
और मेरे लिए एक कतरा वक़्त भी नहीं लाते हो
न मेरे पसंद की कोई चीज़ लाते हो,
पर ज़रूरत तो सब पूरी करते हो,
फिर भी मेरी छोटी-छोटी माँग
कभी ख़त्म नहीं होती है,
क्या करूँ मैं पागल हूँ न !

पहले तो तुम्हारे पास सब होता था
पर अब न वक़्त है न चाँद न चाँदी
अब न माँगूँगी कभी
पक्का वादा है मेरा
माँगने से क्या होता है
संदूक तो भर चूका है
अब मेरे पास भी जगह नहीं
ज़ेहन में अब चाँद और चाँदी नहीं,
सभी माँग ख़त्म हो रही है
बस वक़्त का एक टुकड़ा है
जो मेरे पास बचा है,
मान गई हूँ अपना सच
सच में
मैं कितनी पागल हूँ !

- जेन्नी शबनम (मई, 2000)

__________________________________

main kitni paagal hun na...

*******

main kitni paagal hun na !
tumhara haal bhi nahin puchhi
aur tapaak se maang kar baithee -
ek chhota chaand la do na
apne sandook men rakhungi
roz uski chandni nihaarungi !

main kitni paagal hun na !
par tum bhi to bas...
kahaan samajhe theye mujhe
chand na sahi chaandi ka hin chaand banawa dete
meri na sahi jyotish ki baat maan lete,
suna hai chaand aur chaandi dono paawan hai
unmen mann ko shital karne ki kshamta hai !

dekho na mera pagalpan !
main kitna to gussa karti hun
jab tum ghar loutate ho
aur mere liye ek katra waqt bhi nahin late ho
na mere pasand ki koi chiz laate ho,
par zarurat to sab puri karte ho,
phir bhi meri chhoti-chhoti maang
kabhi khatm nahin hoti hai,
kya karun main paagal hun na !

pahle to tumhaare paas sab hota tha
par ab na waqt hai na chaand na chaandi,
ab na maangugi kabhi
pakka waada hai mera,
mangne se kya hota hai
sandook to bhar chuka hai,
ab mere paas bhi jagah nahin
zehan men ab chaand aur chaandi nahin,
sabhi maang khatm ho rahi hai
bas waqt ka ek tukda hai
jo mere paas bachaa hai,
maan gai hun apnaa sach
sach mein
main kitni paagal hun !

- jenny shabnam (may, 2000)

________________________________________________

Friday, August 6, 2010

162. रूठे मन हमें मनाने पड़ते / ruthe mann humen manaane padte

रूठे मन हमें मनाने पड़ते

*******

लम्हों की मानिंद, सपने भी पुराने पड़ते
ख्व़ाब देखें, रूठे मन हमें मनाने पड़ते !

जहाँ-जहाँ कदम पड़े, हमारी चाहतों के
सोए हर शय, हमें ही है जगाने पड़ते !

तूफ़ान का रूख़ मोड़ देंगे, जब भी सोचे
ख़ुद में हौसले, ख़ुद हमें ही लाने पड़ते !

तन्हाईयों की बाबत, जब पूछा सबने
अपने हर अफ़साने, हमें सुनाने पड़ते !

लोग पूछते, आज नज़्म में कौन बसा है
रोज़ नए मेहमान, 'शब' को बुलाने पड़ते !

- जेन्नी शबनम (3. 8. 2010)

______________________________________

ruthe mann humen manaane padte

*******

lamhon ki manind, sapne bhi puraane padte
khwaab dekhen, ruthe mann humen manaane padte !

jahaan jahaan kadam pade, humaari chaahaton ke
soye har shay, humen hi hai jagaane padte !

tufaan ka rukh mod denge, jab bhi soche
khud men housle, khud humen hi laane padte !

tanhaaiyon ki baabat, jab puchha sabne
apne har afsaane, humen sunaane padte !

log puchhte, aaj nazm men koun basa hai
roz naye mehmaan, 'shab' ko bulaane padte !

- jenny shabnam (3. 8. 2010)

______________________________________________

Monday, August 2, 2010

161. हमारे शब्द... / humaare shabd...

हमारे शब्द...

*******

शब्दों के सफ़र में
हम दोनों ही तो
हो गए लहूलुहान,
कोई पिघलता शीशा
या खंजर की धार
बस कर ही देना है वार !

आर पार कर दे रही
हमारे बोझिल रिश्तों को
हमारे शब्दों की कटार !

किसके शब्दों में तीव्र नोक ?
ढूँढते रहते दोषी कौन ?

प्रहार की ताक लगाए
मौका चुकने नहीं देना
बस उड़ेल देना है खौलते शब्द !

पार पा जाना है
तमाम बंधन से
पर नहीं जा सके कभी,
साथ जीते रहे
धकेलते रहे
एक दूसरे का क़त्ल करते रहे
हमारे शब्द !

- जेन्नी शबनम (2. 8. 2010)

_________________________

humaare shabd...

*******

shabdon ke safar mein
hum donon hi to
ho gaye lahooluhaan,
koi pighalta shisha
ya khanjar ki dhaar
bas kar hin dena hai waar !

aar paar kar de rahi
hamaare bojhil rishton ko
hamaare shabdon ki kataar !

kiske shabdon mein tivrr nok?
dundhte rahte doshi koun?

prahaar ki taak lagaaye
mouka chukne nahin dena
bas udel dena hai khoulate shabd !

paar pa jaana hai
tamaam bandhan se
par nahin ja sake kabhi,
saath jite rahe
dhakelate rahe
ek dusare ka qatl karte rahe
humaare shabd !

- jenny shabnam ( 2. 8. 2010)

________________________________

Sunday, August 1, 2010

160. ले चलो संग साजन... / le chalo sang saajan...

(सावन के महीने में वियोगी मनःस्थिति की रचना, जिसकी नायिका वर्षों से अपने प्रियतम का इंतज़ार करती ही जा रही है)
.......................................

ले चलो संग साजन...

*******

काटे नहीं कटत
अब मोरा जीवन,
कासे कहूँ होत
बिकल मोरा मन !

समझें नाहीं
वो हमरी बतिया,
सुन भी लें तो
मोहे आये निंदिया !

बीत गई उमर
सारी बाट जोहे,
जाने कब जागे
मन में प्रीत तोरे !

अबके जो आवो
ले चलो संग साजन,
बीतत नहीं एक घड़ी
बिन तोरे साजन !

- जेन्नी शबनम (1. 8. 2010)
____________________________________________


(saawan ke mahine mein viyogi manah-sthiti kee rachna, jiski naayika warshon se apne priyatam ka intzaar karti hin jaa rahi hai)
........................................

le chalo sang saajan...

*******

kaate nahin katat
ab mora jiwan,
kaase kahun hot
bikal mora mann.

samjhein naahin
wo humri batiya,
sun bhi lein to
mohe aaye nindiya.

beet gai umar
saari baat johe,
jaane kab jaage
mann mein preet tore.

abke jo aao
ley chalo sang saajan,
beetat naahin ek ghadi
bin tore saajan.

- jenny shabnam (1. 8. 2010)

____________________________

Tuesday, July 27, 2010

159. शापित हूँ मैं... / shaapit hun main...

शापित हूँ मैं...

*******

शापित हूँ मैं...
सिर्फ खोना है
हारने के लिए जीना है !

अवांछित हूँ मैं...
सिर्फ क्रंदन है
एहसास है पर बंधन है !

नियति का मज़ाक हूँ मैं...
ठूंठ बदन है
पर फूल खिल गये हैं !

नहीं उगने दूँगी कोई फूल
भले ये ज़मीन बंज़र कहलाए,
काट डालूँगी अपनी ही जड़
कभी कोई छाँव न पाए,
क़तर डालूँगी हर सोच
जो मुझमें उम्मीद जगाए !

नियति की हार नहीं होगी
मेरी जीत कभी नहीं होगी,
मैं शापित हूँ !

हाँ... शापित हूँ मैं !

- जेन्नी शबनम (27. 7. 2010)

____________________________

shaapit hun main...

*******

shaapit hun main...
sirf khona hai
haarne ke liye jina hai !

avaanchhit hun main...
sirf krandan hai
yehsaas hai par bandhan hai !

niyati ka majaaq hun main...
thunth badan hai
par phul khil gaye hain !

nahin ugne dungi koi phul
bhale ye zameen banjar kahlaaye,
kaat daalungi apni hin jad
kabhi koi chhanv na paaye,
qatar daalungi har soch
jo mujhmen ummid jagaaye !

niyati ki haar nahin hogi
meri jeet kabhi nahin hogi,
main shaapit hun !

haan... shaapit hun main !

- jenny shabnam (27. 7. 2010)

_________________________________

Monday, July 26, 2010

158. विदा अलविदा... / vida alvida...

विदा अलविदा...

*******

कुछ लम्हे साथ जीती
ये कैसी ख़्वाहिश होती,
दूर भी तो न हुई कभी
फिर ये चाह क्यों होती !

ख़त में सुने उनके नगमें
पर धुन पराई है लगती,
वो निभाते उम्र के बंधन
ज़िन्दगी यूँ नहीं ढ़लती !

इश्क में मिटना लाज़िमी
क्यों है ये दस्तूर ज़रूरी,
इश्क में जीना ज़िन्दगी
कब जीता कोई ज़िन्दगी !

विदा अलविदा की कहानी
रोज़ कहते वो मुँह ज़ुबानी,
कल अलविदा मैं कह गई
फिर समझे वो इसके मानी !

हिज़्र की एक रात न आई
न वस्ल ने लिखी कहानी,
'शब' ओढती रोज़ चाँदनी
पर रात अमावास की होती !

- जेन्नी शबनम (19. 7. 2010)

_________________________

vida alvida...

*******

kuchh lamhe saath jiti
ye kaisi khwaahish hoti,
door bhi to na hui kabhi
phir ye chaah kyon hoti !

khat mein sune unke nagmein
par dhun paraai hai lagti,
vo nibhaate umrra ke bandhan
zindagi yun nahin dhalti !

ishq mein mitna laazimi
kyon hai ye dastoor zroori,
ishq mein jina zindagi
kab jita koi zindagi !

vida alvida ki kahaani
roz kahte vo moonh zubaani,
kal alvida main kah gai
phir samjhe vo iske maani !

hizrra ki ek raat na aai
na vasl ne likhi kahaani,
'shab' odhti roz chaandni
par raat amaavas ki hoti !

- jenny shabnam (19. 7. 2010)

_______________________________

Thursday, July 22, 2010

157. किस किस के दर्द को चखती 'शब' / kis kis ke dard ko chakhti 'shab'

किस-किस के दर्द को चखती 'शब'

*******

वाह वाही से अब दम घुटता है
सच सुनने को मन तरसता है !

छवि बनाऊँ जो पसंद ज़माने को
मुखौटे ओढ़-ओढ़ मन तड़पता है !

उनकी सरपरस्ती मुझे भाती नहीं
अपने पागलपन से दिल डरता है !

आसमान तो सबको मिला भरपूर
पर आसरा सबको नहीं मिलता है !

अपने आँसुओं से प्यास बुझती नहीं
मेरी अँजुरी में जल नहीं ठहरता है !

सब पूछते मैं इतनी रंज क्यों रहती हूँ
भूखे बच्चों को देख सब्र नहीं रहता है !

किस-किस के दर्द को चखती 'शब'
ज़माने को कुछ भी कब दिखता है !

- जेन्नी शनम (21. 07. 2010)

____________________________________

kis-kis ke dard ko chakhti 'shab'...

*******

waah waahi se ab dam ghutata hai
sach sunane ko man tarasta hai.

chhawi banaaun jo pasand zamaane ko
mukhoute odh-odh man tadapta hai.

unki sarparasti mujhe bhaati nahin
apne pagalpan se dil darta hai.

aasmaan to sabko mila bharpur
par aasra sabko nahin milta hai.

apne aansuon se pyaas bujhti nahin
meri anjuri mein jal nahin thaharta hai.

sab puchhte main itni ranj kyon rahti hun
bhukhe bachchon ko dekh sabrr nahin rahta hai.

kis-kis ke dard ko chakhti 'shab'
zamaane ko kuchh bhi kab dikhta hai.

- Jenny Shabnam (21. 7. 2010)

__________________________________________________

Sunday, July 18, 2010

156. न बीतेंगे दर्द के अंतहीन पल.../ na beetenge dard ke antaheen pal...

न बीतेंगे दर्द के अंतहीन पल...

*******

स्मृति की गहरी खाई में
फिर उतर आई हूँ,
न चाहूँ फिर भी
वक़्त बेवक्त पहुँच जाती हूँ,
कोई गहरी टीस
सीने में उभरती है,
कोई रिसता घाव
रह-रह कर याद दिलाता है !

मानस पटल पर अंकित
कोई अभिशापित दृष्य,
अतीत के विचलित
वक़्त का हर परिदृष्य,
दर्द की अकथ्य दास्तान
जो रहती अदृष्य !

दुःस्वप्नों की तमाम परछाइयाँ
पीछा करती हैं,
कैसे हर रिश्ता अचानक
पराया बन बैठा,
सभी की निगाहों में
तरस और दया का बोध,
बिचारी का वो संबोधन
जो अब भी बेध जाता है मन !

आज ख़ुद से फिर पूछ बैठी -
किसे कहते हैं बचपन ?
क्या किसी के न होने से सब ख़त्म ?
एक और सवाल ख़ुद से -
क्या सच में कुँवारी बाला मदमस्त चहकती है ?
मैं चहकना क्यों भूली ?
बार बार पूछती -
क्यों हमारे ही साथ ?
कौन बचाएगा गिद्ध दृष्टि से ?
कई सवाल अब भी -
क्यों उम्र और रिशतों के मायने बदल जाते हैं ?
क्यों मझधार में छोड़ सब पार चले जाते हैं ?

न रुका न माना न परवाह
चाहे संसार हो या वक़्त,
मैं भी नहीं रुकी
हर झंझावत पार कर गई,
पर वो टीस और बिचारी के शब्द
फ़फोले की तरह अक्सर सीने में उभर आते हैं,
यूँ बीत तो गए खौफ़ के वर्ष...
पर
उफ्फ़ !
न बीतेंगे दर्द के अंतहीन पल !

- जेन्नी शबनम (18. 7. 2010)

_____________________________________________

na beetenge dard ke antaheen pal...

*******

smriti ki gahri khaai mein
fir utar aai hun,
na chaahun fir bhi
waqt bewaqt pahunch jaati hun,
koi gahri tees
sine mein ubharti hai,
koi rista ghaav
rah-rah kar yaad dilaata hai !

maanas patal par ankit
koi abhishaapit drishya,
ateet ke vichalit
vaqt ka har paridrishya,
dard ki akathya daastan
jo rahti adrishya !

duhswapnon ki tamaam parchhaaiyan
pichha karti hain,
kaise har rishta achaanak
paraaya ban baitha,
sabhi ki nigaahon mein
taras aur daya ka bodh,
bichaari ka wo sambodhan
jo ab bhi bedh jata hai mann !

aaj khud se fir puchh baithi -
kise kahte hain bachpan ?
kya kisi ke na hone se sab khatm ?
ek aur sawaal khud se -
kya sach mein kunwaari baala madmast chahakti hai ?
main chahakna kyon bhooli ?
baar baar puchhti -
kyon humaare hin saath ?
koun bachaayega giddh drishti se ?
kayee sawaal ab bhi -
kyon umra aur rishton ke maayane badal jaate hain ?
kyon majhdhaar mein chhod sab paar chale jaate hain ?

na ruka na maana na parawaah
chaahe sansaar ho ya waqt,
main bhi nahin ruki
har jhanjhaawat paar kar gai,
par wo tees aur bichaari ke shabd
fafole ki tarah aksar sine mein ubhar aate hain,
yun beet to gaye khouf ke warsh...
par
uff !
na beetenge dard ke antaheen pal !

- jenny shabnam (18. 7. 2010)

__________________________________________________

Thursday, July 15, 2010

155. फिर नहीं लिख पाई ख़ुद पर कविता... / fir nahin likh paai khud par kavita...

फिर नहीं लिख पाई ख़ुद पर कविता...

*******

सहमती झिझकती वो आई
फूलती साँसें, पर अविलम्ब बोली -
आज मुझपर भी कुछ लिखो
सब पर तो कविता लिखती हो !
मैं बोली साँसों को ज़रा राहत दो
फिर आराम से अपनी कथा सुनाओ !
जिए हर एहसास बता दिया उसने
हर पहलू जीवन का सुना दिया उसने !

सोचने लगी
उसके किस पहलू को उतारूँ कागज़ पर
उसके छलनी एहसास और टूटते विश्वास को
या उसकी चमकती आँखों में छलक आए आसुओं को !
उसकी खनकती हँसी में छुपी कहानी लिखूँ
मर-मर कर जीने की व्यथा लिखूँ
उसकी उदास ज़िन्दगी की परेशानी लिखूँ
या काम्याब ज़िन्दगी की नाकामी लिखूँ !
कैसे लिखूँ
उसके मन का सन्नाटा
उसकी आरज़ू का बिखरना
अपनों के बीच वो अकेली
जो बनी गैरों के लिए एक पहेली !

मैंने उससे कहा -
तुम्हारे जीवन के हर पल पर
एक नहीं कई कविताएँ रच जाएँगी,
तुम बताओ किस मनोदशा पर लिखूँ
जो तुम कहो उसी पल को अभिव्यक्त करूँ !

फिर फफक कर रो पड़ी वो
हर राज़ खोल गई वो,
अश्रु-बाँध टूट गया उसका
ज़माने से होगा जो उसने छुपाया !

उसकी कहानी पूर्ण हुई
पर मेरी उलझन बढ़ गई,
मैं अवाक् उसे देखती रही
हतप्रभ उसे समझती रही !

जाने वो कौन थी
किसकी कहानी दोहरा रही थी,
मुझको मेरी ही कहानी सुना गई
या फिर मैं भ्रमित हो गई,
सबकी कहानी एक-सी तो होती है
किसके जीवन में सिर्फ खुशियाँ होती हैं ?

मैंने पूछा -
तुम कौन हो
मेरी कहानी को अपना क्यों कह रही हो ?
अचानक हँस पड़ी वो
मुस्कुरा कर उठ चली वो,
अब वो शांत थी और मैं उदिग्न
बाँह पकड़ उसे बैठाई खींच !
मैं बोली -
बताओ परिचय तुम अपना
कैसे जाना हर राज़ मेरा,
मेरी कोई सहेली नहीं न कोई अपना
फिर किसने कहा तुमसे मेरा अफसाना ?

कहा उसने -
पहले ख़ुद को जानो
याद करो ख़ुद को फिर मुझे पहचानो,
शुरू से एक मात्र मैं ही राज़दार हूँ तुम्हारी
जिससे ही तुम अपनी व्यथा हो छुपाती,
अब तो पहचान जाओ मैं कौन हूँ
ए सखी !
मैं तुम्हारी छाया हूँ !
सब पर इतनी बेबाकी से लिखती हो
अपनी ज़िन्दगी क्यों छुपाती हो,
न कोई अपना है न पराया
फिर किस बात से है मन घबड़ाता,
ख़ुद पर तो कभी लिखती नहीं तुम
आज मेरी ज़ुबानी सुन ली अपनी कहानी
अब तो खुद पे लिखो !

मैं बोली -
हे सखी !
तुम मेरी साया और मुझको समझ न सकी
जब तुमसे नहीं कहती तो कैसे लिखूँ
अपनी ही व्यथा कह किससे आस जोहूँ,
कई बार प्रयास की पर विफल रही
नहीं लिख सकी ख़ुद पर कभी,
सुनाओ किसी और की अन्तःकथा
ख़ुद पर नहीं लिख पाऊँगी कभी
मैं कविता !

- जेन्नी शबनम (11. 7. 2010)
________________________________________

fir nahin likh paai khud par kavita...

*******

sahamti jhijhakti vo aai
phoolti saansein, par avilamb boli,
aaj mujhpar bhi kuchh likho
sab par to kavita likhti ho !
main boli saanson ko zara raahat do
fir aaraam se apni katha sunaao !
jiye har yehsaas bata diya usne
har pahloo jivan ka suna diya usne !

sochne lagi
uske kis pahaloo ko utaarun kaagaz par
uske chhalni ehsaas aur tootate vishvaas ko
ya uski chamakti aankhon mein chhalak aaye aansuon ko !
uski khanakti hansi mein chhupi kahaani likhun
mar-mar kar jine ki vyatha likhun
uski udaas zindagi ki pareshaani likhun
ya kamyaab zindagi ki naakaami likhun !
kaise likhun
uske mann ka sannaata
uski aarzoo ka bikharna
apnon ke bich wo akeli
jo bani gairon ke liye ek paheli !

maine usase kaha -
tumhaare jivan ke har pal par
ek nahin kai kavitaayen rach jaayengi,
tum bataao kis manodasha par likhun
jo tum kaho usi pal ko abhivyakt karun !

fir phaphak kar ro padi vo
har raaz khol gai vo,
ashru-baandh toot gaya uska
zamaane se hoga jo usane chhupaaya !

uski kahaani purn hui
par meri uljhan badh gai,
main avaak usey dekhti rahi
hatprabh usey samajhti rahi !

jaane wo koun thi
kiski kahaani dohara rahi thi,
mujhko meri hi kahaani suna gai
ya fir main bhramit ho gai,
sabki kahaani ek-si to hoti hai
kiske jivan mein sirf khushiyaan hoti hain ?

maine puchha -
tum koun ho
meri kahaani ko apna kyon kah rahi ho ?
achaanak hans padi vo
muskura kar uth chali vo,
ab vo shaant thi aur main udign
baanh pakad usey baithaai khinch !
main boli -
bataao parichay tum apana
kaise jana har raaz mera,
meri koi saheli nahin na koi apana
fir kisane kaha tumse mera afsaana ?

kaha usne -
pehle khud ko jaano
yaad karo khud ko fir mujhe pahchaano,
shuru se ek maatrr main hi raazdar hun tumhaari
jisase hi tum apni vyatha ho chhupaati,
ab to pehchaan jaao main koun hun
ae sakhi !
main tumhaari chhaaya hun !
sab par itni bebaaki se likhti ho
apni zindgi kyon chhupaati ho,
na koi apna hai na paraaya
fir kis baat se hai mann ghabdaata,
khud par to kabhi likhti nahin tum
aaj meri zubaani sun li apnee kahaanee
ab to likho !

main boli -
hey sakhi !
tum meri saaya aur mujhko samajh na saki
jab tumse nahin kahti to kaise likhun
apni hin vyatha kah kisase aas johun,
kai baar prayaas ki par vifal rahi
nahin likh saki khud par kabhi,
sunaao kisi aur ki antah-kathaa
khud par nahin likh paaungi kabhi
main kavita !

- jenny shabnam (11. 7. 2010)

_____________________________________________

Tuesday, July 13, 2010

154. यही है मन.../ yahi hai mann...

यही है मन...

*******

अचानक उल्लास
अचानक संतप्त
पहेली है मन !

रहस्यमय संसार
उत्सुकता बहुत
भूलभूलैया है मन !

अधूरी चाह
अतृप्त आकांक्षा
भटकता है मन !

स्व संवाद
नहीं विवाद
उलझता है मन !

खंडित विश्वास
अखंडित आस
यही है मन !

- जेन्नी शबनम (13. 7. 2010)

__________________________

yahi hai mann...

*******

achaanak ullaas
achaanak santapt
paheli hai mann !

rahasyamay sansaar
utsukta bahut
bhulbhulaiya hai mann !

adhuri chaah
atript akaanksha
bhatakta hai mann !

swa samvaad
nahin vivaad
ulajhta hai mann !

khandit vishvaas
akhandit aas
yahi hai mann !

- jenny shabnam (13. 7. 2010)

_________________________________

Wednesday, July 7, 2010

153. अल्लाह ! ये कैसा सफ़र मैं कर आई... / allah ! ye kaisa safar main kar aai...

अल्लाह ! ये कैसा सफ़र मैं कर आई...

*******

एक लम्हे की बात थी
और सदियाँ गुज़र गईं,
मंज़िल नज़दीक थी
और ज़िन्दगी खो गई !

कुछ कदम थे बढ़े
कुछ कदम थे घटे,
जाने ये कैसा फ़साना
समझ कभी न पाई !

रूह भी हुई अब मिट्टी
मिट्टी में सो गई सिसकी,
तकदीर पर इल्ज़ाम
और दी ख़ुदा की दुहाई !

ग़र चल सको तो चलो
या लौट जाओ इसी पल,
न थी कुवत साथ मरने की
और जीने की कसम उसने खाई !

कह दिया होता उसी पल
बेमकसद है सदियों का सफ़र,
अब हर पहर हुआ ज़ख़्मी
अल्लाह ! ये कैसा सफ़र मैं कर आई !

- जेन्नी शबनम ( 7. 7. 2010)

________________________________

allah ! ye kaisa safar main kar aai...

*******

ek lamhe ki baat thi
aur sadiyaan guzar gaeen,
manzil nazdik thi
aur zindagi kho gai !

kuchh kadam they badhe
kuchh kadam they ghate,
jaane ye kaisa fasaana
samajh kabhi na paai !

rooh bhi hui ab mitti
mitti men so gai siski,
takdir par ilzaam
aur dee khuda ki duhaai !

gar chal sako to chalo
ya lout jaao isi pal,
na thi kuvat saath marne ki
aur jine ki kasam usne khaai !

kah diya hota usi pal
bemaksad hai sadiyon ka safar,
ab har pahar hua zakhmi
allah...ye kaisa safar main kar aai !

- Jenny Shabnam (7. 7. 2010)

_________________________________

Tuesday, July 6, 2010

152. एक राह और एक प्याली... / ek raah aur ek pyaali...

एक राह और एक प्याली...

*******

अभी भी मेरी आँखें
वहीं खड़ी हैं,
वहीं उसी मोड़ पर
जहाँ से हमारे रास्ते
बदलते हैं हमेशा !

उस दिन भी तो
साथ ही थे हम,
आमने सामने बैठे
कोल्ड कॉफ़ी की दो प्याली
और साथ हमारी चुप्पी !
हौले से उठाते हम
अपनी-अपनी प्याली,
कहीं शब्द तोड़ न दे प्याली
या फिर गर्म न हो जाए ज़िन्दगी,
जकड़ न ले हमें हमारे रिश्ते
पनपने भी न देते कभी मुस्कान !

हाथ थाम चल दिए
कॉफ़ी के प्याले भी बदल लिए,
पर नहीं बदल सके फितरत
और हाथ छुड़ा चल देते
दो अलग-अलग दिशाओं में !
जानते तो हैं कि फिर मिलना है
ऐसे ही चुप्पी को समझना है,
दो कॉफ़ी के प्याले
बदलना भी है और पीना भी है !

हर बार एक ही कहानी
वही ख़ामोश राह
जहाँ से हर बार अलग होना है,
और फिर दोबारा मिलने तक
उसी जगह पर ठहरी रहती है आँखें
जिस मोड़ से बदलते हैं रास्ते !

कह भी नहीं सकते कि
इस बार आओ तो साथ ही चलेंगे,
तोड़ देंगे अपनी चुप्पी और दूसरी प्याली
रहेगी एक राह और एक प्याली !
छोड़ कर जाते हुए
आँखें अब नम न होंगी,
न ठहरी रहेगी उसी मोड़ पर
जहाँ से हमारे रास्ते
बदलते हैं हमेशा !

- जेन्नी शबनम (5. 7. 2010)

______________________________________

ek raah aur ek pyaali...

*******

abhi bhi meri aankhein
wahin khadi hain,
wahin usi mod par
jahaan se hamaare raaste
badalte hain hamesha !

us din bhi to
saath hi the hum,
aamne saamne baithe
cold coffee ki do pyaali
aur saath humaari chuppi !
houle se uthaate hum
apni apni pyaali,
kahin shabd tod na de pyaali
ya fir garm na ho jaaye zindagi,
jakad na le hamein hamaare rishte
panapne bhi na dete kabhi muskaan !

haath thaam chal diye
coffee ke pyaale bhi badal liye
par nahin badal sake fitarat,
aur haath chhuda chal dete
do alag alag dishaon mein !
jaante to hain ki fir milna hai
aise hi chuppi ko samajhna hai,
do coffee ke pyaale
badalna bhi hai aur pina bhi hai !

har baar ek hi kahaani
wahi khaamosh raah
jahaan se har baar alag hona hai,
aur fir dobaara milne tak
usi jagah par thahri rahti hain aankhein
jis mod se badalte hain raaste !

kah bhi nahin sakte ki
is baar aao to saath hin chalenge,
tod denge apni chuppi aur dusri pyaali
rahegi ek raah aur ek pyaali !
chhod kar jaate hue
aankhein ab nam na hongi,
na thahri rahegi usi mod par
jahaan se hamaare raaste
badalte hain hamesha !

- Jenny Shabnam (5. 7. 2010)

______________________________________

Saturday, July 3, 2010

151. तलाशो डगर ख़ुद जलकर / talaasho dagar khud jalkar

(अपने पुत्र के 17 वें जन्मदिन के अवसर पर)
.........................................................

तलाशो डगर ख़ुद जलकर

*******

सोचो सदा, तुम समझकर
करो दोस्ती, ज़रा सँभलकर !

न टूटे कभी, ख़ुद पे यकीन
कदम बढ़ाओ, तुम थमकर !

अँधियारे से, तुम डरो नहीं
तलाशो डगर, ख़ुद जलकर !

कठिन हो, मंज़िल तो क्या
पालो जुनून, तुम कसकर !

हारो नहीं, अपनों के छल से
जीतो तुम, सत्य पर चलकर !

मिले दग़ा, तुम न होना ख़फ़ा
लोग देखेंगे, कभी तो पलटकर !

अपने दम पर, करो नव-निर्माण
दुआ है, यश मिले, तुमको जमकर !

- जेन्नी शबनम (22. 06. 2010)
________________________________________

(apne putra ke 17 ven janmdin ke awasar par)
...................................................................

talaasho dagar khud jalkar

*******

socho sada, tum samajhkar
karo dosti, zara sambhalkar !

na toote kabhi, khud pe yakin
kadam badhaao, tum thamkar !

andhiyaare se, tum daro nahin
talaasho dagar, khud jalkar !

kathin ho, manzil to kya
paalo junoon, tum kaskar !

haaro nahin, apnon ke chhal se
jeeto tum, satya par chalkar !

mile daga, tum na hona khafa
log dekhenge, kabhi to palatkar !

apne dam par, karo nav-nirmaan
dua hai, yash mile, tumko jamkar !

- Jenny Shabnam (22. 6. 2010)

_________________________________

Thursday, July 1, 2010

150. जवाब नहीं है मेरे पास... / jawaab nahin hai mere paas...

जवाब नहीं है मेरे पास...

*******

आज फिर वो सवाल, बरबस याद आ गया
वर्षों पहले तुमने, हठात् जो मुझसे किया था,
वही सवाल आज फिर, बेहिचक किया है तुमने
पल भर को भी कभी, क्या मैंने चाहा है तुम्हें ?

जवाब उस दिन भी, नहीं था मेरे पास
जब अपना जीवन, सौंप दिया था तुम्हें,
आज भी ख़ामोश हूँ, जवाब नहीं है मेरे पास
प्रेम की कसौटी, रही है सदा मेरे समझ से परे !

जानती हूँ, मेरी हर ख़ामोशी
कई सवालों को, जन्म देती है,
जिनके जवाब, न मैं दे सकी
न कभी, वक़्त ही दे पाया है !

पक्ष में कोई सबूत, नहीं ला सकती हूँ
न कभी कोई ज़िरह ही, करना चाहती हूँ,
सभी आरोप यथावत, स्वीकृत करती हूँ
पर कह नहीं सकती कि, मैं क्या सोचती हूँ !

तुम्हारे सभी सवाल, सदैव अधूरे ही होते हैं
अधूरे सवाल के पूरे जवाब, कैसे हो सकते हैं ?
पूरे जवाब के लिए, पूरा सवाल भी करना पड़ता है
अधूरे जीवन से पूरा जीवन, नहीं समझा जा सकता है !

ख़ामोशी से उपजते हैं, मुझमें हर जवाब
ख़ामोशी से समझ लो, तुम अपना जवाब,
अब न पूछना बारम्बार, मुझसे ये सवाल
नहीं तो कर बैठूँगी मैं, तुमसे यही सवाल !

- जेन्नी शबनम (21. 6. 2010)

__________________________________________

jawaab nahin hai mere paas...

*******

aaj fir wo sawaal, barbas yaad aa gaya
varshon pahle tumne, hathaat jo mujhse kiya tha,
wahi sawaal aaj fir, behichak kiya hai tumne
pal bhar ko bhi kabhi, kya maine chaaha hai tumhen ?

jawaab us din bhi, nahin tha mere paas
jab apna jivan, sounp diya tha tumhein,
aaj bhi khaamosh hoon, jawaab nahin hai mere paas
prem ki kasouti, rahi hai sada mere samajh se parey !

jaanti hun, meri har khaamoshi
kai sawaalon ko, janm deti hai,
jinke jawaab, na main de saki
na kabhi, waqt hin de paaya hai !

paksh mein koi saboot, nahin la sakti hun
na kabhi koi zirah hin, karna chaahti hun,
sabhi aarop yathaawat, swikrit karti hun
par kah nahin sakti ki, main kya sochti hun !

tumhaare sabhi sawaal, sadaiv adhure hin hote hain
adhure sawaal ke pure jawaab, kaise ho sakte hain ?
pure jawaab ke liye, pura sawaal bhi karna padta hai
adhure jivan se pura jivan, nahin samjha ja sakta hai !

khaamoshi se upajte hain, mujhmein har jawaab
khaamoshi se samajh lo, tum apna jawaab,
ab na poochhna baarambaar, mujhse ye sawaal
nahin to kar baithoongi main, tumse yahi sawaal !

- Jenny Shabnam (21.6.2010)

______________________________________________

Sunday, June 20, 2010

149. बाबा आओ देखो ! तुम्हारी बिटिया रोती है... / baba aao dekho ! tumhaari bitiya rotee hai...

बाबा आओ देखो ! तुम्हारी बिटिया रोती है...

*******

मन में अब भी कहीं, एक नन्ही-सी बच्ची पलती है
जाने क्या-क्या सपने बुनती, दूर आसमान को ताकती है 
शायद वहाँ से कोई परी, उसके बाबा को ले आएगी
गोद बाबा के बैठ, वो अपने सारे दुखड़े रोएगी 

क्यों चले गए, तुम छोड़ के बाबा
देखो बाप बिन बेटी, कैसे जीती है,
बूँद आँसू न बहे, तुमने इतने जतन से पाले थे
देखो आज अपनी बिटिया को, अपने आँसू पीती है 

जाना ही था, तो साथ अपने, मुझे और अम्माँ को भी ले जाते
मेरे आधे आँसू, अम्माँ की आँखों से भी बहते हैं,
मेरी उथली हँसी और पनीली आँखें, बिन कहे अम्माँ पहचानती है
वो अपने सारे ग़म भूल, मेरे दुःख से रोती है 

जाने को तुम चले गए, किस्मत हमारी भी ले गए
हम कैसे जिएँ बताओ बाबा, अपना दर्द किसे सुनाएँ बाबा,
जानती हूँ, आसमान से, न कोई परी आएगी न तुम आओगे
फिर भी, मन में अब भी, एक नन्ही बच्ची पलती है 

तुम सितारा बन आसमान में चले गए, बचपन में दादी कहती थी
आँसुओं से तर उसकी आँखें, रोज़ मुझे और भैया को, नई कहानी सुनाती थी 
बाबा आओ देखो ! तुम्हारे सारे अपने रोते हैं
एक दूसरे के सामने, अपने आँसू छुपाते हैं 

सपनों में तुम आते हो, जैसे कभी कहीं तुम गए नहीं
सपनों में ही कह दो आकर, कब तक यूँ आँसू और बहेंगे 
बाबा ! इतना तो कह कर जाते, कभी नहीं तुम आओगे
चाहे जितना भी रोयें हम, वापस नहीं तुम आओगे 

बच्ची नहीं औरत हूँ अब, किसी का घर भी बसाना है
कोख़ जायों को अपने, उनकी मंज़िल तक पहुँचाना है 
ज़हर घूँट का पीकर भी, सबकी ख़ातिर जीना है
तुमसे शिकवा कर, पल-पल अपने आँसू पोंछना है 

बाबा ! जब भी आँसू बहते हैं, मन छोटी बच्ची बन जाता है
जानती हूँ, तुम आसमान में नहीं रहते, न कोई परी रहती है 
दूर आसमान से तुम देख रहे, मन को झूठी तसल्ली होती है
बाबा आओ देखो ! तुम्हारी प्यारी बिटिया रोती है 

- जेन्नी शबनम (27. 9. 2008)

___________________________________________________

baba aao dekho ! tumhaari bitiya rotee hai...

*******

mann mein ab bhi kahin, ek nanhi-see bachchee paltee hai
jaane kya-kya sapne buntee, door aasmaan ko taaktee hai.
shaayad wahaan se koi paree, uske baba ko le aayegi
goad baba ke baith, wo apne saare dukhde royegi.

kyon chale gaye, tum chhod ke baba
dekho baap bin betee, kaise jeetee hai,
boond aansoo na bahe, tumne itne jatan se paale they
dekho aaj apni bitiya ko, apne aansoo pitee hai.

jana hi tha, to saath apne, mujhe aur amma ko bhi le jaate
mere aadhe aansoo, amma kee aankho se bhi bahte hain,
meri uthli hansi aur paneelee aankhe, bin kahe amma pahchaantee hai
wo apne saare gam bhool, mere dukh se rotee hai.

jane ko tum chale gaye, kismat humari bhi le gaye
hum kaise jiyen batao baba, apna dard kise sunaayen baba.
janti hoon, aasman se, na koi paree aayegi, na tum aaoge
phir bhi, mann mein ab bhi, ek nanhi bachchi paltee hai.

tum sitaara ban aasman mein chale gaye, bachpan mein daadi kahtee thi
aasuon se tar uski aankhen, roz mujhe aur bhaiya ko, nayee kahaani sunaati thi.
baba aao dekho ! tumhaare saare apne rote hain
ek dusre ke saamne, apne aansoo chhupaate hain.

sapno mein tum aate ho, jaise kabhi kahin tum gaye nahi
sapno mein hi kah do aakar, kab tak yun aansoo aur bahenge,
baba ! itna to kah kar jate, kabhi nahi tum aaoge
chaahe jitna bhi royen hum, waapas nahi tum aaoge.

bachchi nahi aurat hun ab, kisi ka ghar bhi basaana hai,
kokh jaayon ko apne, unki manzil tak pahuchaana hai.
zehar ghunt ka pikar bhi, sabki khaatir jina hai,
tumse shikwa kar, pal pal apne aansoo pochhna hai.

baba ! jab bhi aansoo bahte hain, mann chhoti bachchee ban jaata hai,
jaanti hun, tum aasman mein nahi rahte, na koi paree rahti hai.
door aasman se tum dekh rahe, mann ko jhoothi tasalli hoti hai,
baba aao dekho...tumhaari pyaari bitiya rotee hai.

- Jenny Shabnam (27. 9. 2008)

______________________________________________________________

Saturday, June 19, 2010

148. सर्द मौसम की ठंडी मैं छाँव हूँ / sard mousam ki thandi main chhaanv hoon

सर्द मौसम की ठंडी मैं छाँव हूँ

*******

सर्द मौसम की ठंडी मैं छाँव हूँ
कोई ठहर न सके वो मैं पड़ाव हूँ !

दुनिया है सागर की क्रूर लहरें
सहती साहिल का मैं कटाव हूँ !

चुन-चुन के बटोरती रही पीड़ा
और ख़ुद ही करती मैं बचाव हूँ !

रगों में रक्त अब बहता नहीं
जो बुझ चुका वो मैं अलाव हूँ !

ज़ख़्मी हुई ख़ुद की ख़ता से
रो-रो कर भरती मैं घाव हूँ !

'शब' ने तो कभी दिया नहीं
ख़ुद को ही देती मैं तनाव हूँ !

- जेन्नी शबनम (18. 6. 2010)

____________________________________

sard mousam ki thandi main chhaanv hoon

*******

sard mousam ki thandi main chhaanv hun
koi thahar na sake vo main padaav hun.

duniya hai saagar ki krur lahren
sahti saahil ka main kataav hun.

chun-chun ke batorti rahi peeda
aur khud hin karti main bachaav hun.

ragon mein rakt ab bahta nahin
jo bujh chuka vo main alaav hun.

zakhmi hui khud ki khata se
ro-ro kar bharti main ghaav hun.

'shab' ne to kabhi diya nahin
khud ko hi deti main tanaav hun.

- Jenny Shabnam (18. 06. 2010)

_____________________________________

Wednesday, June 9, 2010

147. मेरी वफ़ा क्यों बातिल हुई / meri wafa kyon baatil hui

मेरी वफ़ा क्यों बातिल हुई

*******

न दख़ल दिया, न दाख़िल हुई
फिर मेरी वफ़ा, क्यों बातिल हुई !

हर ज़ुल्म का इल्ज़ाम मुझपर
मज़लूम भी मैं, और कातिल हुई !

मेरी महज़ूनियत, गैरवाज़िब क्यों
जन्नत भला, किसे हासिल हुई !

मेरे ख़्वाबों ने, कहाँ पहुँचाया मुझे
दामगाह में, ज़िन्दगी शामिल हुई !

समंदर में डूबी, पर भींगी नहीं
मज़िरत ही सही, मैं जाहिल हुई !

तखल्लुस जब सुना 'शब' का
फ़जीहत फिर, सरे महफ़िल हुई !
_______________________________

बातिल - निरर्थक/ गलत
मज़लूम - जिस पर अत्याचार हुआ हो
महज़ूनियत - उदासीनता
दामगाह - फ़रेब की जगह/ जहाँ जाल बिछा हो
मज़िरत - विवशता/ मजबूरी
जाहिल - निपट मूर्ख
तखल्लुस - उपनाम
_______________________________

- जेन्नी शबनम (9. 6. 2010)

______________________________________________

meri wafa kyon baatil hui

*******

na dakhal diya, na daakhil hui
fir meri wafa, kyon baatil hui.

har zulm ka ilzaam mujhpar
mazloom bhi main, aur kaatil hui.

meri mahzuniyat, gairwaajib kyon
jannat bhala, kise haasil hui.

mere khwaabon ne, kahaan pahunchaaya mujhe
daamgaah mein, zindgi shaamil hui.

samandar mein doobi, par bhingi nahin
mazirat hin sahi, main jaahil hui.

takhallus jab suna 'shab' ka
fajihat fir, sare mahafil hui.
_______________________________

baatil - nirarthak/ galat
mazloom - jis par atyaachaar hua ho
mahzuniyat - udaasinta
damgaah - fareb ki jagah/ jahaan jaal bichha ho
mazirat - vivashta/ mazburi
jaahil - nipat murkh
takhallus - upnaam
_______________________________

- Jenny Shabnam (9. 6. 2010)

__________________________________________________

Wednesday, June 2, 2010

146. अपना न कोई ज़िक्र की / apna na koi zikra ki

अपना न कोई ज़िक्र की

*******

चाँदनी है मगर, रात जैसे हिज़्र की
ढ़ल तो जायेगी, बात नहीं फ़िक्र की !

छाया घना कोहरा, सबब क्या बताएँ
बात तो होगी मगर, नहीं मेरे मित्र की !

यादों को यूँ सहेजना, सीने में हमदम
पिरामिड में स्थित, ज्यों रानी मिस्र की !

हुए वो बेगाने, पर गंध ठहर गई मुझमें
ख़ुशबू मिलेगी सबको, महज़ उनके इत्र की !

जाने कब बन गई थी, 'शब' एक नज़्म
मिली तो मगर, अपना न कोई ज़िक्र की !

- जेन्नी शबनम (23. 5. 2010)

_______________________________________

apna na koi zikra ki

*******

chaandni hai magar, raat jaise hizra ki
dhal to jayegi, baat nahin fikra ki.

chhaya ghana kohra, sabab kya batayen
baat to hogi magar, nahin mere mitra ki.

yaadon ko yun sahejna, seene mein humdam
piraamid mein sthit, jyon raani misra ki.

hue wo begaane, par gandh thahar gai mujhmein
khushboo milegi sabko, mahaz unke itra ki.

jaane kab ban gai thee, 'shab' ek nazm
mili to magar, apna na koi zikra ki.

- Jenny Shabnam (23. 5. 2010)

_______________________________________________

Monday, May 31, 2010

145. बँटे हुए तुम.../ bante hue tum...

बँटे हुए तुम...

*******

क्या कभी भी
सोचा या जाना तुमने
क्यों दूर हो गई
ख़ुद ही मैं तुमसे,
एक-एक लम्हा
जो साथ जिए थे
न पूछो
बड़ा दर्द देते थे,
आस हो, तो फिर भी
काँटों को सह लूँ
हर चुभन को
फूलों की चुभन सोचूँ,
कभी ख़ुद से हारी नहीं
पर तुमको
जीती भी तो नहीं,
मेरा मौन समर्पण
मुझे तोड़ गया
और शायद यही
तुमको मुझसे दूर कर गया,
मैं, मैं हूँ
ये तुम क्यों न मान सके
हर रोज़ एक नयी उर्वशी
तलाशते रहे,
अब चाहती भी नहीं
कि वापस लौटो तुम
अब मुझे भी स्वीकार्य नहीं
बँटे हुए तुम,
कोई शिकायत मेरी
नहीं पहुँचेगी अब तुम तक
मिलने की व्याकुलता
रहेगी ज़ब्त मुझ तक,
जाओ, तुमको आज़ाद किया
ख़ुद ही अपना दिल
वीरान किया,
प्रेम पथिक
तुम बन न सके
कभी मेरे
देती दुआ 'शब''
जिओ प्रेम में
तो किसी के !

- जेन्नी शबनम (31. 5. 2010)

__________________________

bante hue tum...

*******

kya kabhi bhi
socha ya jaana tumne
kyon door ho gai
khud hin main tumse,
ek-ek lamha
jo saath jiye the
na puchho
bada dard dete theye,
aas ho, to phir bhi
kaanton ko sah loon
har chubhan ko
phulon ki chubhan sochoon,
kabhi khud se haari nahin
par tumko
jiti bhi to nahin,
mera moun samarpan
mujhe tod gaya
aur shaayad yahi
tumko mujhse door kar gaya,
main, main hun
ye tum kyon na maan sake
har roz ek nayee urvashi
talaashte rahe,
ab chaahti bhi nahin
ki wapas louto tum
ab mujhe bhi swikaarya nahin
bante hue tum,
koi shikaayat meri
nahin pahunchegi ab tum tak
milane ki vyaakulta
rahegi zabt mujh tak,
jao, tumko aazaad kiya
khud hin apna dil
veeran kiya,
prem pathik
tum ban na sake
kabhi mere
deti dua 'shab'
jio prem mein
to kisi ke !

- Jenny Shabnam (31. 5. 2010)

________________________________

Saturday, May 22, 2010

144. रूख़सत पे कैसा ग़म / rukhsat pe kaisa gam

रूख़सत पे कैसा ग़म

*******

रूख़सत पे कैसा ग़म
नहीं अपना, वैसा ग़म !

यकीन की बस्ती लूटी
बदकिस्मती, जैसा ग़म !

फिक्र नहीं पर नाता है
अज़ब है, ये पैसा ग़म !

मुकम्मल नहीं ये जीवन
चाहो नहीं, तैसा ग़म !

दिल टूटा बिखरी 'शब'
न हो कभी, ऐसा ग़म !

- जेन्नी शबनम (17. 5. 2010)

___________________________

rukhsat pe kaisa gam

*******

rukhsat pe kaisa gam
nahin apna, waisa gam.

yakin ki basti luti
badkismati, jaisa gam.

fikrr nahin par naata hai
ajab hai, ye paisa gam.

mukammal nahin ye jiwan
chaaho nahin, taisa gam.

dil tuta bikhri 'shab'
na ho kabhi, aisa gam !

- Jenny Shabnam (17. 5. 2010)

__________________________________


Monday, May 17, 2010

143. अलविदा कहते हैं वो / alvida kahte hain wo

अलविदा कहते हैं वो

*******

ज़मीन-ए-दिल में बसा, हमको रखते हैं वो
कभी पूछी खैरियत, कभी बस चल देते हैं वो !

रूठे को मनाना, है अज़ब शौक उनको
हर बात पर ख़फा, हमको करते हैं वो !

राहों ने टोका, पर भूल जाते हैं रास्ता
हमसे हमारा पता, हर रोज़ पूछते हैं वो !

आईना भी थक गया, याद करके उन्हें
पल-पल रूप कितने, जाने बदलते हैं वो !

हम कभी भी न मिले, ये मंज़ूर है उन्हें
ग़र मिले तो तमाम उम्र, माँगते हैं वो !

उनका अंदाज़-ए-मोहब्बत, तो ज़रा देखिए
न हो तकरार हमसे, बेचैन रहते हैं वो !

मुद्दतों इश्क का पैगाम, हमको भेजते रहे
इत्तेफ़ाकन जो मिल गए, बड़ा शर्माते हैं वो !

साथ जीने की कसमें, हमको देते हैं रोज़
इश्क में मर जाने की कसम, खाते हैं वो !

उनकी आँखों में दिखती है, मेरी आशिकी
हुआ जो सामना, हमसे ही नज़रें चुराते हैं वो !

ताउम्र साथ चलेंगे, वो रोज़ कहते हैं 'शब'
जब भी मिले, हमको अलविदा कहते हैं वो !
_______________________

ज़मीन-ए-दिल - ह्रदय की धरती
_______________________

- जेन्नी शबनम (16. 5. 2010)

______________________________________________

alvida kahte hain wo

*******

zameen-e-dil mein basa, humko rakhte hain wo
kabhi puchhi khairiyat, kabhi bas chal dete hain wo.

ruthe ko manaana, hai azab shauk unko
har baat par khafa, humko karte hain wo.

raahon ne toka, par bhul jaate hain raasta
hamse hamara pata, har roz puchhte hain wo.

aaina bhi thak gaya, yaad karke unhein
pal-pal roop kitne, jaane badalte hain wo.

hum kabhi bhi na mile, ye manzoor hai unhein
gar mile to tamaam umrr, maangte hain wo.

unka andaaz-e-mohabbat, to zara dekhiye
na ho takraar humse, bechain rahte hain wo.

muddaton ishq ka paigaam, humko bhejte rahe
ittefaakan jo mil gaye, bada sharmaate hain wo.

saath jine ki kasmein, humako dete hain roz
ishq mein mar jaane ki kasam, khaate hain wo.

unki aankhon men dikhti hai, meri aashiqi
hua jo saamna, humse hi nazarein churaate hain wo.

taaumrr saath chalenge, wo roz kahte hain 'shab'
jab bhi mile, hamako alavida kahte hain wo.
___________________________________

zameen-e-dil - hriday ki dharti
___________________________________

- Jenny Shabnam (16. 5. 2010)

_____________________________________________