Monday, May 16, 2011

तीर वापस नहीं होते...

तीर वापस नहीं होते...

*******

जानते हुए कि हर बार और और दूर हो जाती हूँ
तल्ख़ी से कहते हो मुझे कि मैं गुनाहगार हूँ,
मुमकिन है कि मन में न सोचते होओ
महज़ आक्रोश व्यक्त करते होओ,
या फिर मुझे बांधे रखने का ये कोई हथियार हो
या मेरे आत्मबल को तोड़ने की ये तरकीब हो,
लेकिन मेरे मन में ये बात समा जाती है
हर बार ज़िन्दगी चौराहे पर नज़र आती है!
हर बार लगाए गए आरोपों से उलझते हुए
धीरे धीरे तुमसे दूर होते हुए,
मेरी अपनी एक अलग दुनिया
जहां अब तक बहुत कुछ है सबसे छुपा,
वहाँ की वीरानगी में सिमटती जा रही हूँ
खामोशियों से लिपटती जा रही हूँ,
भले तुम न समझ पाओ कि
मैं कितनी अकेली होती जा रही हूँ,
न सिर्फ तुमसे बल्कि
अपनी ज़िन्दगी से भी नाता तोड़ती जा रही हूँ!
तुम्हारी ये कैसी जिद्द है
या कि कोई अहम् है,
क्यों कटघरे में अक्सर खड़ा कर देते हो
जाने किस बात की सज़ा देते हो,
जानते हो न
कमान से निकले तीर वापस नहीं होते,
वैसे हीं
ज़ुबान से किये वार वापस नहीं होते !

__ जेन्नी शबनम __ 11. 5. 2011

_____________________________________________