सोमवार, 16 मई 2011

244. तीर वापस नहीं होते...

तीर वापस नहीं होते...

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जानते हुए कि हर बार और और दूर हो जाती हूँ
तल्ख़ी से कहते हो मुझे कि मैं गुनहगार हूँ,
मुमकिन है कि मन में न सोचते होओ
महज़ आक्रोश व्यक्त करते होओ,
या फिर मुझे बाँधे रखने का ये कोई हथियार हो
या मेरे आत्मबल को तोड़ने की ये तरकीब हो,
लेकिन मेरे मन में ये बात समा जाती है
हर बार ज़िन्दगी चौराहे पर नज़र आती है!
हर बार लगाए गए आरोपों से उलझते हुए
धीरे-धीरे तुमसे दूर होते हुए,
मेरी अपनी एक अलग दुनिया है
जहाँ अब तक बहुत कुछ सबसे छुपा है,
वहाँ की वीरानगी में सिमटती जा रही हूँ
खामोशियों से लिपटती जा रही हूँ,
भले तुम न समझ पाओ कि
मैं कितनी अकेली होती जा रही हूँ,
न सिर्फ तुमसे बल्कि
अपनी ज़िन्दगी से भी नाता तोड़ती जा रही हूँ!
तुम्हारी ये कैसी ज़िद है
या कि अहम् है,
क्यों कटघरे में अक्सर खड़ा कर देते हो
जाने किस बात की सज़ा देते हो,
जानते हो न
कमान से निकले तीर वापस नहीं होते,
वैसे ही
ज़ुबान से किये वार वापस नहीं होते !

- जेन्नी शबनम (11. 5. 2011)

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