Wednesday, August 3, 2011

कह न पाउँगी कभी...

कह न पाउँगी कभी...

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अपने जीवन का सत्य
कह न पाऊँगी
किसी से कभी,
अपने पराए का भेद
समझती हूँ,
पर जानती हूँ
कह न पाऊँगी
किसी से कभी 

न जाने कब कौन
अपना बनकर
जाल बिछा रहा हो,
किसी तरह फँसकर
उसके जलसे का
मैं बस हिस्सा रह जाऊँ 

बहुत घुटन होती है
जब-जब भरोसा टूटता है,
किसी अपने के सीने से
लिपट जाने का
मन करता है 

समय-चक्र और नियति
कहाँ कौन जान पाया है ?
किसी पराए की प्रीत
शायद प्राण दे जाए
जीवन का कारण बन जाए,
पर पराए का अपनापन
कैसे किसी को समझाएँ ?

अपनों का छल
बड़ा घाव देता है,
पराए से अपना कोई नहीं
मन जानता है,
पर जानती हूँ
कह न पाऊँगी
किसी से कभी । 

- जेन्नी शबनम ( जुलाई 19, 2011)

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