Sunday, February 13, 2011

एक स्वप्न की तरह...

एक स्वप्न की तरह...

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बनते बनते जाने कैसे
कई सवाल
बन गई हूँ मैं,
जिनके जवाब
सिर्फ तुम्हारे पास है
पर तुम बताओगे नहीं
ये भी जानती हूँ !
शिकस्त खाना
तुम्हारी आदत नहीं
और मात देना
मेरी फितरत नहीं,
फिर भी...
जाने क्यों
तुम ख़ामोश होते हो !
शायद ख़ुद को रोके
रखते हो
कहीं मेरी आवारगी
मेरी यायावरी
तुम्हे डगमगा न दे
या फिर तुम्हारी दिशा बदल न दे !
नहीं, मेरे हमदर्द
फ़िक्र न करो
कुछ नहीं बदलेगा
मैं यूँ हीं सवाल बन कर
रह जाऊँगी
जवाब तुमसे पूछूंगी भी नहीं,
ख़ुद में गुम
तुमको यूँ हीं दूर से देखते हुए
एक स्वप्न की तरह...

__ जेन्नी शबनम __ 11. 2. 2011

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