रविवार, 21 जून 2020

674. बोनसाई

बोनसाई 

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हज़ारों बोनसाई उग गए हैं   
जो छोटे-छोटे ख़्वाबों की पौध हैं 
ये पौधे अब दरख़्तों में तब्दील हो चुकें हैं 
ये सदा हरे भरे नहीं रहते 
मुरझा जाने को होते ही हैं 
कि रहम की ज़रा-सी बदली बरसती है 
वे ज़रा-ज़रा हरियाने लगते हैं 
फिर कुनमुना कर सब जीने लगते हैं   
वे अक्सर अपने बौनेपन का प्रश्न करते हैं   
आख़िर वे सामान्य क्यों न हुए, क्यों बोनसाई बन गए   
ये कैसा रहस्य है   
ये ऐसे दरख़्त क्यों हुए, जो किसी को छाँव नहीं दे सकते   
फलने-फूलने-जीने के लिए हज़ार मिन्नतें करते हैं   
फिर मौसम को तरस आता है   
वे ज़रा-सी धूप और पानी दे देते हैं 
आख़िर ऐसा क्यों है   
क्यों बिन माँगे मौसम उन्हें कुछ न देता   
क्यों लोग हँसते हैं उसके ठिगनेपन पर   
बोनसाई होना उनकी चाहत तो न थी   
सब तक़दीर के तमाशे हैं   
जो वे भुगतते हैं   
रोज़ मर-मर कर जीते है   
पर ख़्वाबों के ये बोनसाई 
कभी-कभी तन्हाई में हँसते भी हैं!   

- जेन्नी शबनम (21. 6. 2020) 
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