Sunday, March 15, 2015

491. युद्ध...

युद्ध...

*******

अबोले शब्द
अब पीड़ा देते हैं
छाती में बहता ख़ून
जैसे धक्के मारने लगा है
नियति का बहाना
पुराना-सा लगता है
जिस्म के भीतर
मानो अँगारे भर दिए गए हैं
और जलते लोहे से
दिल में सुराख़ कर दिए गए हैं
फिर भी बिना लड़े
बाज़ी जीतने तो न देंगे
हाथ में क़लम ले
जिगर चीर देने को मन उतावला है
बिगुल बज चूका है
रात जा चूकी है
युद्ध का प्रारंभ है।

- जेन्नी शबनम (15. 3. 2015)

_____________________________

Sunday, March 8, 2015

490. क्या हुक्म है मेरे आका...

क्या हुक्म है मेरे आका...

*******

अक्सर सोचती हूँ 
किस ग्रह से मैं आई हूँ 
जिसका ठिकाना 
न कोख़ में 
न घर में 
न गाँव शहर में  
मुमकिन है 
उस ख़ुदा के घर में भी नहीं 
अन्यथा क्रूरता के इस जंगल में 
बार-बार मुझे भेजा न गया होता 
चाहे जन्मूँ चाहे क़त्ल होऊँ 
चाहे जियूँ चाहे मरूँ 
चाहे तमाम दर्द के साथ हँसूँ 
पग-पग पर एक कटार है 
परम्परा का 
नातों का 
नियति का 
जो कभी कोख में 
झटके से घुसता है 
कभी बदन में 
ज़बरन ठेला जाता है 
कभी कच्ची उम्र के मन को 
हल्के-हल्के चीरता है 
जरा-ज़रा सीने में घुसता है 
घाव हर वक़्त ताज़ा 
तन से मन तक रिसता रहता है  
जाने ये कौन सा वक़्त है 
कभी बढ़ता नहीं 
दिन महीना साल सदी 
कुछ बदलता नहीं 
हर रोज़ उगना डूबना 
शायद सूरज ने अपना शाप 
मुझे दे दिया है 
तन का पीर 
तन से ज़्यादा 
मन का पीर है 
मैं बुझना चाहती हूँ 
मैं मिटना चाहती हूँ 
बेघरबार हूँ 
चाहे उस स्वर्ग में जाऊँ 
चाहे इस नरक में टिकूँ 
अब बहुत हुआ 
अपने उस ग्रह पर 
लौटना चाहती हूँ 
जहाँ से इस जंगल में 
निहत्था मुझे भेजा गया 
शिकार होने के लिए 
जाकर शीघ्र लौटूँगी अपने ग्रह से 
अपने हथियार के साथ 
फिर करूँगी 
उन जंगली जानवरों पर वार
जिन्होंने मुझे अधमरा कर दिया है
अपने शौक के लिए
मेरी साँसों को बंधक बना कर रखा है
बोतल के जिन की तरह
जो कहे -
''क्या हुक्म है मेरे आका'' !

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2015)

________________________________

Friday, March 6, 2015

489. इन्द्रधनुषी रंग (होली पर 10 हाइकु)

इन्द्रधनुषी रंग
(होली पर 10 हाइकु)

1.
तन पे चढ़ा
इन्द्रधनुषी रंग
फगुआ मन ! 

2.
नाचे बहार
इठलाती है मस्ती
रंग हज़ार ! 

3.
गिले-शिकवे  
कपूर से हैं उड़े   
होली मिलन !

4.
रंग में भीगी
पर नहीं रंगीली  
बेरंग होली ! 

5.
खेलूँगी होली
तेरी यादों के साथ
तू नहीं पास ! 

6.
होली लजाई
वसंत ने जो छेड़े
फगुआ-तान ! 

7.
कच्ची अमिया
फगुआ में नहाई
मुरब्बा बनी !

8.
है हुड़दंग
हवा ने छानी भंग  
झूमे मलंग !  

9.
आम्र-मंजरी 
डाल पे हैं झूलती 
गाए फगुआ !  

10.
काहे न टिके
रंगो का ये मौसम
बारहों मास ! 

- जेन्नी शबनम (5. 3. 2015)

_______________________________

Tuesday, March 3, 2015

488. स्त्री की डायरी...

स्त्री की डायरी...

*******

स्त्री की डायरी  
उसका सच नहीं बाँचती    
स्त्री का सच  
उसके मन की डायरी में  
अलिखित छपा होता है  
बस वही पढ़ सकता जिसे वो चाहे  
भले दुनिया अपने-अपने मनमाफ़िक़  
उसकी डायरी में  
हर्फ़ अंकित कर दे !  

- जेन्नी शबनम (3. 3. 2015)

__________________________________

Sunday, March 1, 2015

487. वासन्ती प्यार (वसंत ऋतु पर 5 हाइकु)

वासन्ती प्यार  
(वसंत ऋतु पर 5 हाइकु)   

******* 

1.  
वासन्ती प्यार    
नस-नस में घुली,   
हँसी, बहार ! 

2.
वासन्ती धुन  
आसमान में गूँजे  
मनवा झूमे ! 

3.
प्रणय पुष्प
चहुँ ओर है खिला  
रीझती फ़िज़ा ! 

4.
मन में ज्वाला 
मरहम लगाती    
वसन्ती हवा ! 

5.
वसन्ती रंग 
छितराई सुगंध  
फूलों के संग ! 

- जेन्नी शबनम (14. 2. 2015)

___________________________