Monday, April 4, 2016

510. दहक रही है ज़िन्दगी...

दहक रही है ज़िन्दगी...  

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ज़िन्दगी के दायरे से भाग रही है ज़िन्दगी  
ज़िन्दगी के हाशिये पर रुकी रही है ज़िन्दगी !  

बेवजह वक़्त से हाथापाई होती रही ताउम्र  
झंझावतों में उलझ कर गुज़र रही है ज़िन्दगी !  

गुलमोहर की चाह में पतझड़ से हो गई यारी  
रफ़्ता-रफ़्ता उम्र गिरी ठूँठ हो रही है ज़िन्दगी !  

ख़्वाब और फ़र्ज़ का भला मिलन यूँ होता कैसे  
ज़मीं मयस्सर नहीं आस्मां माँग रही है ज़िन्दगी !  

सब कहते उजाले ओढ़ के रह अपनी मांद में  
अपनी ही आग से लिपट दहक रही है ज़िन्दगी !  

- जेन्नी शबनम (4. 4. 2016)

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Friday, April 1, 2016

509. अप्रैल फूल...

अप्रैल फूल...  

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आईने के सामने  
रह गई मैं भौंचक खड़ी  
उस पार खड़ा वक़्त  
ठठाकर हँस पड़ा  
बेहयाई से बोला -  
तू आज ही नहीं बनी फूल  
उम्र के गुज़रे तमाम पलों में  
तुम्हें बनाया है  
अप्रैल फूल !  

- जेन्नी शबनम (1. 4. 2016)  

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