Saturday, December 31, 2011

बीत गया...

बीत गया...

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तय मौसम का एक मौसम
अच्छा हुआ बीत गया
हार का एक मनका
अच्छा हुआ टूट गया !
समय का मौसम
मन का मनका
साथ-साथ बिलख पड़े
आस का पंछी रूठ गया !
दोपहरी जलाती रही
सांझ कभी आती नहीं
ये भी किस्सा खूब रहा
तमाशबीन मेरा मन रहा !
हर कथा का सार वही
जीवन का आधार वही
वक़्त से रंज क्यों
फ़लसफ़ा मेरा कह रहा !

- जेन्नी शबनम (दिसम्बर 31, 2011)

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Thursday, December 22, 2011

एक अदद रोटी...

एक अदद रोटी...

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सुबह से रात
रोज़
सबको परोसता
गोल-गोल प्यारी-प्यारी
नर्म मुलायम रोटी,
मिल जाती
काश
उसे भी
कभी खाने को
गर्म-गर्म रोटी,
ठिठुरती ठंड की मार
और उस पर
गर्म रोटी की चाह
चार टुकड़ों में बँट सके
ले आया
चोरी से एक रोटी,
ठंडी रोटी
गर्म होने लगी
लड़ पड़े सब
जो झपट ले
होगी उसकी
सभी को चाहिए
पूरी की पूरी रोटी,
छीना-झपटी
हाथा-पाई
धू-धू कर जल गई
हाय री किस्मत
लगी न किसी के हाथ रोटी,
छाती पीटो
कि बदन तोड़ो
अब कल ही मिलेगी
बची-खुची बासी रोटी,
न इसके हिस्से
न उसके हिस्से
कुछ नहीं किसी के हिस्से
अरसे बाद
चूल्हे ने खाई
एक अदद रोटी !

- जेन्नी शबनम (दिसम्बर 21, 2011)

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Tuesday, December 20, 2011

बेलौस नशा माँगती हूँ...

बेलौस नशा माँगती हूँ...

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सारे नशे की चीज़ मुझसे ही क्यों माँगती हो
कह कर हँस पड़े तुम,
मैं भी हँस पड़ी
तुमसे न माँगू तो किससे भला,
तुम ही हो नशा
तुम से ही ज़िन्दगी !

तुम्हारी हँसी बड़ी प्यारी लगती है
कह कर हँस पड़ती हूँ,
मेरी शरारत से वाकिफ़ तुम
सतर्क हो जाते हो,
एक संजीवनी लब पे
मौसम में पसरती है खुमारी !

जाने किस नशे में तुमने कहा
मेरा हाथ छोड़ रही हो,
और झट से तुम्हारा हाथ थाम लिया
धत्त ! ऐसे क्यों कहते हो,
तुम ही तो नशा हो
तुमसे अलग कहाँ रह पाऊँगी !

तुम कहते कि शर्मीले हो
मैं ठठाकर हँस पड़ती हूँ,
हे भगवान् ! तुम शर्मीले
तुम्हारी सभी शरारतें मालूम है मुझे,
याद है, वो जागते सपनों-सी रात
जब होश आया और पल भर में सुबह हो गई !

ज़िंदगी उस दिन फिर से खिल गई
जब तुमने कहा चुप-चुप क्यों रहती हो,
सुलगते अलाव की एक चिंगारी मुझपर गिरी
और मेरे ज़ेहन में तुम जल उठे,
तुम्हारा नशा पसरा मुझपर
ज़िंदगी ने शायद पहली उड़ान भरी !

तुम्हारी दी हुई हर चीज़ पसंद है
हर एहसास बस तुमसे ही,
एक ही जीवन
पल में समेट लेना चाहती हूँ,
सिर्फ तुम ही तो हो
जिससे अपने लिए बेलौस नशा माँगती हूँ !

- जेन्नी शबनम (दिसम्बर 20, 2011)

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Saturday, December 17, 2011

अब डूबने को है...

अब डूबने को है...

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बहाने नहीं हैं पलायन के
न ही कोई अफ़साने हैं मेरे
न कोई ऐसा सच
जिस से तुम भागते हो
और सोचते हो कि मुझे तोड़ देगा,
सारे सच जो अग्नि से प्रज्वलित होकर निखरे हैं
तुम जानते हो दोस्त
वो मैंने हीं जलाए थे,
पल पल की बातें जब भारी पड़ गई
एक दोने में लपेट कर नदी में बहा दी
फिर वो दोना एक मछुआरे ने मुझ तक पहुँचा दिया
क्योंकि उसपर मैंने अपने नाम लिख दिए थे
ताकि जब जल में समाये तो
अपने साथ मुझे भी समाहित कर ले,
अब उस दोने को जला रही हूँ
सारे सच पक-पक कर
गाढे रंग के हो गए हैं,
वो देखो मेरे दोस्त
सूरज सा तपता मेरा सच...
अब डूबने को है !

- जेन्नी शबनम (दिसम्बर 17, 2011)

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Thursday, December 15, 2011

जाने कहाँ गई वो लड़की...

जाने कहाँ गई वो लड़की...

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सफ़ेद झालर वाली फ्राक पहने
जिसपे लाल लाल फूल सजे,
उछलती-कूदती
जाने कहाँ गई वो लड़की !
बकरी का पगहा थामे
खेतों के डरेर पर भागती,
जाने क्या-क्या सपने बुनती
एक अलग दुनिया उसकी !
भक्तराज को भकराज कहती
क्योंकि क-त संयुक्त में 'क' दीखता है,
उसके अपने तर्क
अज़ब जिद्दी लड़की !
बात बनाती खूब
पालथी लगा कर बैठती,
कलम दवात से लिखती रहती
निराली दुनिया उसकी !
एक रोज़ सुना शहर चली गई
गाँव की ख़ुशबू साथ ले गई,
उसके सपने उसकी दुनिया
कहीं खो गई लड़की !
साँकल की आवाज़
किवाड़ी की चरचराहट,
जानती हूँ वो नहीं
पर इंतज़ार रहता अब भी !
शायद किसी रोज़ धमक पड़े
रस्सी कूदती-कूदती,
दही-भात खाने को मचल पड़े
वो चुलबुली लड़की !
जाने कहाँ गई
वो मानिनी मतवाली,
शायद शहर के पत्थरों में चुन दी गई
उछलती-कूदती वो लड़की !
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पगहा- गले में बँधी रस्सी
दरेर - मेंड़
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- जेन्नी शबनम (नवम्बर 14, 2011)

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Saturday, December 10, 2011

आदम जात की बात नहीं...

आदम जात की बात नहीं...

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प्यार की उम्र क्या होती है ?
साथ जीने की शर्त क्या होती है ?
अज़ब सवाल पूछते हो
प्यार कि उम्र कभी ख़त्म नहीं होती
प्यार में कोई शर्त नहीं होती !
फिर ये कैसा प्यार
हर बार एक नयी अनकही शर्त
जिसे मान लेना होता है,
उम्र के ढलान पर
तुम्हारी निगाहें किसे ढूँढती हैं ?
साथ तो होते हैं लेकिन
उबलती शिराएँ
समझते हो न
सहन नहीं होती,
सारी शर्तों को मानते हुए
हर अनकहा समझते हुए
फिर ऐसा क्यों?
हाँ सच है
रूह से रूह की बात
परी कथाओं की बात है
आदम जात की बात नहीं !

- जेन्नी शबनम (दिसम्बर 10, 2011)

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Monday, December 5, 2011

अपनी अपनी धुरी...

अपनी अपनी धुरी...

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अपनी अपनी धुरी पर चलते
पृथ्वी और ग्रह-नक्षत्र,
जीवन-मरण हो या समय का रथ
नियत है सभी की गति, धुरी और चक्र !
बस एक मैं
अपनी धुरी पर नहीं चलती,
कभी लगाती अज्ञात के चक्कर
कभी वर्जित क्षेत्रों में घुस
मंथर
तो कभी
विद्दुत से भी तेज
अपनी हीं गति से चलती !
न जाने क्यों
इतनी वर्जनाएं हैं
जिन्हें तोड़ना सदैव कष्टप्रद है,
फिर भी
उसे तोड़ना पड़ता है
अपने जीने लिए
धुरी से हटकर चलना पड़ता है !
बिना किसी धुरी
पर चलना
सदैव भय पैदा करता है
चोट खाने की प्रबल संभावना होती है,
कई बार सिर्फ पीड़ा नहीं मिलती
आनंद भी मिलता है,
पर कहना कठिन है
आने वाला पल किस दशा में ले जाएगा
जीवन को कौन सी दिशा देगा,
जीवन संवरेगा
या फिर सदा के लिए बिखर जाएगा !
कैसे समझूँ
बिना धुरी के लक्ष्यहीन पथ
नियति है
या मेरी
वांछित जीवन दिशा,
जिस पर चलकर
पहुँच जाऊँगी
किसी धुरी पर
और चल पडूँगी
नियत गति से
बिना डगमगाए
अपनी राह
जो मेरे लिए पहले से निर्धारित है !

- जेन्नी शबनम ( दिसंबर 4, 2011)

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Tuesday, November 22, 2011

चुपचाप सो जाऊँगी...

चुपचाप सो जाऊँगी...

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इक रोज़ तेरे काँधे पे
यूँ चुपचाप सो जाऊँगी
ज्यूँ मेरा हो वस्ल आख़िरी
और जहाँ से हो रुखसती !

जो कह न पाए तुम कभी
चुपके से दो बोल कह देना
तरसती हुई मेरी आँखें में
शबनम से मोती भर देना !

ख़फा नहीं तकदीर से अब
आख़िरी दम तुझे देख लिया
तुम मेरे नहीं मैं तेरी रही
ज़िन्दगी ने दिया, बहुत दिया !

न कहना है कि भूल जाओ
न कहूँगी कि याद रखना
तेरी मर्ज़ी से थी चलती रही
जो तेरा फ़ैसला वो मेरा फ़ैसला !

- जेन्नी शबनम (नवम्बर 22, 2011)

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Wednesday, November 16, 2011

उम्र कटी अब बीता सफ़र...

उम्र कटी अब बीता सफ़र...

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बचपन कब बीता बोलो
हँस पड़ा आईना ये कहकर,
काले गेसुओं ने निहारा ख़ुद को
चांदी के तारों से लिपटाया ख़ुद को !

चांदी के तारों ने पूछा
माथे की शिकन से हँसकर,
किसका रस्ता अगोरा तुमने ?
क्या ज़िन्दगी को हँसकर जीया तुमने ?

ज़िन्दगी ने कहा सुनो जी
हँसने की बारी आयी थी पलभर,
फिर दिन महीना और बीते साल
समय भागता रहा यूँ हीं बेलगाम !

समय ने कहा फिर
ज़रा हौले ज़रा तमक कर,
नहीं हौसला तो फिर छोड़ो जीना
'शब' का नहीं कोई साथी रहेगी तन्हा !

'शब' ने समझाया ख़ुद को
अपने आँसू ख़ुद पोछ फिर हँसकर,
बेरहम तकदीर ने भटकाया दर ब दर
अच्छा है लम्बी उम्र कटी अब बीता सफ़र !

- जेन्नी शबनम (नवम्बर 16, 2011)

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Friday, November 11, 2011

अल्फ़ाज़ उगा दूँ...

अल्फ़ाज़ उगा दूँ...

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सोचती हूँ
कुछ अल्फ़ाज़ उगा दूँ,
तितर बितर कर
हर तरफ पसार दूँ,
चुक गए हैं
मेरे अंतस से सभी,
शायद किसी निर्मोही पल में
उनकी ज़रुरत पड़ जाए !

- जेन्नी शबनम (नवम्बर 11, 2011)

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Tuesday, November 8, 2011

भय...

भय...

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भय !
किससे भय?
ख़ुद से?
ख़ुद से कैसा भय?
असंभव!
पर ये सच है
अपने आप से भय,
ख़ुद के होने से भय
ख़ुद के खोने का भय,
अपने शब्दों से भय
अपने प्रेम से भय,
अपने क्रोध से भय
अपने प्रतिकार से भय,
अपनी चाहत का भय
अपनी कामना का भय,
कुछ टूट जाने का भय
सब छूट जाने का भय !
कुछ अनजाना अनचीन्हा भय
ज़िन्दगी के साथ चलता है
ख़ुद से ख़ुद को डराता है !
कोई निदान ?
असंभव !
जीवन से मृत्युपर्यंत
भय भय भय
न निदान
न निज़ात !

- जेन्नी शबनम (नवम्बर 7, 2011)

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Sunday, November 6, 2011

ज़िन्दगी कहाँ कहाँ...

ज़िन्दगी कहाँ कहाँ...

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तुम्हारी निशानदेही पर
साबित हुआ
कि ज़िन्दगी कहाँ कहाँ है
और कहाँ कहाँ से उजड़ गई है !
एक लोकोक्ति की तरह
तुम बसे हो मुझमें
जिसे पहर पहर दोहराती हूँ,
या फिर देहात की औरतें
जैसे भोर में गीत गुनगुनाते हुए
रोपनी करती हैं या फिर
धान कूटते हुए
लोक गीत गाती हैं,
मुझमें वैसे हीं उतर गए तुम
हर दिवस के अनुरूप !
और जब मैं रात्रि में अपने केंचुल में समाती हूँ
जैसे तुहारे आवरण को ओढ़ लिया हो
और महफूज़ हूँ
फिर ख़ुद में ख़ुद को तलाशती हूँ,
तुम झटके से आ जाते हो
जैसे रात के सन्नाटे में
पहरु के बोल और
झींगुर के शोर !
मेरे केंचुल को किसी ने जला दिया
मैं इच्छाधारी
जब तुम्हारे संग
अपने सच्चे वाले रंग में थी,
मैं महरूम कर दी गई
अपनी जात से
और औकात से !
अब
तुम्हारी शिनाख्त की ज़रुरत है
ताकि वापस ज़िन्दगी मिले,
और तुम्हारी निशानदेही पर
अपना नया केंचुल उगा लूं
जिससे मेरी पहचान हो
और मुझमें वो रंग वापस उतर जाए
जिसे मैं दुनिया से ओझल हो
जीती हूँ !

- जेन्नी शबनम (नवम्बर 6, 2011)

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Saturday, November 5, 2011

चक्रव्यूह...

चक्रव्यूह...

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कैसे कैसे इस्तेमाल की जाती हूँ
अनजाने हीं
चक्रव्यूह में घुस जाती हूँ I
जानती हूँ
मैं अभिमन्यु नहीं
जिसने चक्रव्यूह भेदना गर्भ में सीखा I
मैं स्त्री हूँ
जो छली जाती है
कभी भावना से
कभी संबंधों के हथियार से
कभी सुख़ के प्रलोभन से
कभी ख़ुद के बंधन से I
हर बार चक्रव्यूह में समा कर
एक नयी अभिमन्यु बन जाती हूँ
जिसने चक्रव्यूह से निकलना नहीं सीखा I

- जेन्नी शबनम (नवम्बर 1, 2011)

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Wednesday, October 26, 2011

दीपावली (दीपावली पर 11 हाइकु)

दीपावली
(दीपावली पर 11 हाइकु)

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1.
दीपों की लड़ी
लक्ष्मी की अराधना
दिवाली आयी !

2.
लक्ष्मी की पूजा
पटाखों का है शोर
दिवाली पर्व !

3.
दीपक जले
घर अँगना सजे
आयी दिवाली !

4.
है दीपावली
रोशनी का त्योहार
दीप-बहार !

5.
श्री राम लौटे
अमावस्या की रात
दिवाली मने !

6.
अयोध्या वासी
मनाये दीपावली
राम जो लौटे !

7.
दीया जो जले
जगमग चमके
दीवाली सजे !

8.
दीया के संग
घर-अँगना जागे
दिवाली रात !

9.
प्रकाश-पर्व
जगमग दिवाली
खिलता मन !

10.
रोशनी फैली
घर बाहर धूम
आयी दिवाली !

11.
चमके-गूँजे
दीप और पटाखे
दीपावली है !

- जेन्नी शबनम (अक्टूबर 21, 2011)

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Sunday, October 23, 2011

मेरे शब्द...

मेरे शब्द...

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बहुत कठिन है
पार जाना
ख़ुद से
और उन तथाकथित अपनों से
जिनके शब्द मेरे प्रति
सिर्फ इसलिए निकलते हैं कि
मैं आहत हो सकूँ,
खीझ कर मैं भी शब्द उछालूं
ताकि मेरे ख़िलाफ़
एक और
मामला
जो अदालत में नहीं
रिश्तों के हिस्से में पहुंचे
और फिर
मेरे लिए शब्दों द्वारा
एक और
मानसिक यंत्रणा !
नहीं चाहती हूँ
कि ऐसी कोई घड़ी आये
जब मैं भी बे अख्तियार हो जाऊं
और मेरे शब्द भी !
मेरी चुप्पी अब सीमा तोड़ रही है
जानती हूँ अब शब्दों को रोक न सकुंगी
ज़ेहन से बाहर आने से
मुमकिन है ये तरल होकर
आँखों से बहे या
फिर शीशा बनकर
उन अपनों के बदन में घुस जाए
जो मेरी आत्मा को मारते रहते हैं !
मेरे शब्द
अब संवेदनाओं की भाषा
और दुनियादारी
समझ चुके हैं !

- जेन्नी शबनम (अक्टूबर 22, 2011)

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Saturday, October 22, 2011

बाध्यता नहीं (क्षणिका)

बाध्यता नहीं
(क्षणिका)

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ये चाह थी मेरी कि
तुम्हें चाहूँ
और तुम मुझे,
पर
ये सिर्फ
मेरी चाह थी
तुम्हारी बाध्यता नहीं !

_ जेन्नी शबनम (अक्टूबर 9, 2011)

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Wednesday, October 19, 2011

ज़िन्दगी...

ज़िन्दगी...

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ज़िन्दगी तेरी सोहबत में
जीने को मन करता है !
चलते हैं कहीं दूर कि
दुनिया से डर लगता है !
हर शाम जब अँधेरे
छीनते हैं मेरा सुकून
तेरे साथ ऐ ज़िन्दगी
मर जाने को जी करता है !
अब के जो मिलना
संग कुछ दूर चलना
ढलती उमर में
तन्हाई से डर लगता है !
आस टूटी नहीं
तुझसे शिकवा भी है
ग़र तू साथ नहीं
फिर भ्रम क्यों देता है?
'शब' कहती थी कल
ऐ ज़िन्दगी तुझसे
छोड़ते नहीं हाथ
जब कोई पकड़ता है !
ऐ ज़िन्दगी
अब यहीं ठहर जा
तुझ संग जीने को
मन करता है !

- जेन्नी शबनम (16 अक्टूबर, 2011)

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Thursday, October 13, 2011

क़र्ज़ अदाएगी...

क़र्ज़ अदाएगी...

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तुमने कभी स्पष्ट कहा नहीं
शायद संकोच हो
या फिर
सवालों से घिर जाने का भय
जो मेरी बेदख़ली पर तुमसे किये जायेंगे,
जो इतनी नज़दीक
ग़ैर कैसे ?
पर हर बार तुम्हारी बेरुखी
इशारा करती है कि
ख़ुद अपनी राह बदल लूँ
तुम्हारे लिए मुश्किल न बनूँ,
अगर कभी मिलूँ भी तो उस दोस्त की तरह
जिससे महज़ फ़र्ज़ अदायगी सा वास्ता हो
या कोई ऐसी परिचित
जिससे सिर्फ दुआ सलाम का नाता हो !
जानती हूँ
दूर जाना हीं होगा मुझे
क्योंकि यही मेरी क़र्ज़ अदाएगी है,
थोड़े पल और कुछ सपने
उधार दिए थे तुमने
दान नहीं !

- जेन्नी शबनम ( अक्टूबर 10, 2011)

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Tuesday, October 11, 2011

मुक्ति पा सकूँ...

मुक्ति पा सकूँ...

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मस्तिष्क के जिस हिस्से में
विचार पनपते हैं
जी चाहता है उसे काट कर फेंक दूँ,
न कोई भाव जन्म लेंगे
न कोई सृजन होगा!
कभी कभी अपने हीं सृजन से भय होता है
जो रच जाते
वो जीवन में उतर जाते हैं,
जो जीवन में उतर गए
वो रचना में सँवर जाते हैं!
कई बार पीड़ा लिख देती हूँ
और फिर त्रासदी जी लेती हूँ,
कई बार अपनी व्यथा
जो जीवन का हिस्सा है
पन्नों पर उतार देती हूँ!
विचार का पैदा होना
अवश्य बाधित करना होगा
अविलम्ब,
ताकि वर्तमान
और भविष्य के विचार
और जीवन से
मुक्ति पा सकूँ!

-जेन्नी शबनम (अक्टूबर 11, 2011)

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Monday, October 10, 2011

तब हुआ अबेर...

तब हुआ अबेर...

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जब मिला बेर
तब हुआ अबेर,
मचा कोलाहल
चित्र दिया उकेर,
छटपटाया मन
शब्द दिया बिखेर,
बिछा सन्नाटा
अब जगा अंधेर,
'शब' सो गई
तब हुआ सबेर!
______________
बेर - बारी/ समय
अबेर - देर
______________

- जेन्नी शबनम (अक्टूबर 1, 2011)

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Thursday, October 6, 2011

मेरी हथेली...

मेरी हथेली...

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एक हथेली तुम्हें सौंप आयी थी
जब तुम जा रहे थे
जिसकी लकीरों में थी मेरी तकदीर
और मेरी तकदीर सँवारने की तजवीज़ !
एक हथेली अपने पास रख ली
जो वक़्त के हाथों ज़ख़्मी है
जिसकी लकीरों में है मेरा अतीत
और मेरे भविष्य की उलझी तस्वीर!
विस्मृत नहीं करना चाहती
कुछ भी
जो मैंने पाया या खोया
या फिर मेरी वो हथेली
जो तुमने किसी दिन गुम कर दी
क्योंकि
सहेजने की आदत तुम्हें नहीं!

- जेन्नी शबनम (अक्टूबर 4, 2011)

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Tuesday, October 4, 2011

भस्म होती हूँ...

भस्म होती हूँ...

*******

अक्सर सोचती हूँ
हतप्रभ हो जाती हूँ,
चूड़ियों की खनक
हाथों से निकल चेहरे तक
कैसे पहुँच जाती है?
झुलसता मन
अपना रंग झाड़कर
कैसे दमकने लगता है?
शायद वक़्त का हाथ
मेरे बदन में
घुस कर
मुझसे बगावत करता है,
मैं अनचाहे
हँसती हूँ चहकती हूँ
फिर तड़पकर
अपने जिस्म से लिपट
अपनी हीं आग में भस्म होती हूँ!

- जेन्नी शबनम (सितम्बर 1, 2011)

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Tuesday, September 27, 2011

अपशगुन...

अपशगुन...

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उस दिन तुम जा रहे थे
कई बार आवाज़ दी
कि तुम मुड़ो और
मैं हाथ हिला कर तुम्हें विदा करूँ,
लौटने पर तुम कितना नाराज़ हुए
जाते हुए को आवाज़ नहीं देते
अपशगुन होता है,
कितना भी ज़रूरी हो
न पुकारा करूँ तुम्हें !
देखो न
सच में अपशगुन हो गया
पर तुम्हारे लिए नहीं मेरे लिए,
सोचती हूँ
मेरे लिए अपशगुन क्यों हुआ?
तुमने तो कभी भी आवाज़ नहीं दी मुझे !
तुम उस दिन आये थे
अंतिम बार मिलने,
अलविदा कहने के बाद मुड़े नहीं
ज़रा देर को भी रुके नहीं,
जैसे हमेशा जाते हो
चले गए
जैसे कुछ हुआ हीं नहीं!
मैं जानती थी कि
तुम्हारे पास
मेरे लिए
कोई जगह नहीं,
फिर भी एक कोशिश थी
कि शायद...
जानती थी कि ये मुमकिन नहीं
फिर भी...
तुम मेरी ज़िन्दगी से जा रहे थे
कहीं और ज़िन्दगी बसाने,
मन किया कि तुमको आवाज़ दूँ
तुम रूक जाओ
शायद वापस आ जाओ,
पर
आवाज़ नहीं दे सकती थी
तुम्हारा अपशगुन हो जाता !

- जेन्नी शबनम ( अगस्त 27, 2011)

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Saturday, September 24, 2011

ज़िन्दगी शिकवा करती नहीं...

ज़िन्दगी शिकवा करती नहीं...

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चलते चलते मैं चलती रही
ज़िन्दगी कभी ठहरी नहीं,
ख़ुद को जब रोक के देखा
ज़िन्दगी तो बढ़ी हीं नहीं !

किस्मत को कैसा रोग लगा
ज़िन्दगी कभी हँसती नहीं,
वक़्त ने कैसा ज़ख़्म दिया
ज़िन्दगी शिकवा करती नहीं !

कई भ्रम पाले जीने के वास्ते
ज़िन्दगी भ्रम से गुजरती नहीं,
रोज़ रोज़ तड़पती है मगर
ज़िन्दगी मरना चाहती नहीं !

थक थक गई चल चल कर
ज़िन्दगी चलती पर बढ़ती नहीं,
दम टूट टूट जाता है मगर
ज़िन्दगी हारती पर मरती नहीं !

क्यों न करूँ सवाल तुझसे ख़ुदा
ज़िन्दगी क्या सिर्फ मेरी नहीं?
'शब' मगरूर बेवफ़ा हीं सही
ज़िन्दगी क्या सिर्फ उसकी नहीं?

- जेन्नी शबनम (सितम्बर 23 , 2011)

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Wednesday, September 21, 2011

मैं तेरी सूरजमुखी...

मैं तेरी सूरजमुखी...

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ओ मेरे सूरज
मैं तेरी सूरजमुखी (सूर्यमुखी)
बाट जोहते जोहते मुर्झाने लगी,
कई दिनों से तू आया नहीं
जाने कौन सी राह पकड़ ली तूने
कौन ले गया तुझे?
क्या ये भी बिसर गया
कि सारा दिन तुझे हीं तो निहारती हूँ
जीवन ऐसे हीं तेरे संग बिताती हूँ,
तुम चाहो न चाहो
तेरे बिना रह नहीं सकती
चाहूँ फिर भी तुम बिन खिल नहीं सकती,
जानती हूँ तुम्हारा साथ बस दिन भर का है
फिर तू अपनी राह मैं अपनी राह
अगली सुबह फिर तेरी राह,
लड़ लिया करो न, बादलों से मेरे लिए
ओ मेरे सूरज
मैं तेरी सूरजमुखी !

- जेन्नी शबनम (सितम्बर 17, 2011)

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Thursday, September 15, 2011

चाँद-सितारे.../ chaand-sitaare...

चाँद-सितारे...

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बचपन में जब चाँद-सितारों के लिए मचलती थी
अम्मा फ़्राक में ज़री-गोटे से, चाँद-तारे टाँक देती थी।
बाबा चाँद सी गोल चौअन्नी, बड़े लाड़ से देते थे
मैं चाँद-सितारे पा लेने के भ्रम में, खूब इतराती थी।

अम्मा बाबा चुपके से, एक-एक चौअन्नी का हिसाब लगाते थे
दो चौअन्नी में कितने दिन, चाँद सी रोटी पक सकती थी।
दो वक़्त की भूख़ भूल जाते, जब लाड़ली उनकी इठलाती थी
एक चौअन्नी का ज़री-गोटा, एक चौअन्नी गुल्लक में भरती थी।

अब भैया ने, चाँद-सितारों वाला घर, ढूँढ दिया
चाँद-सितारों की खनक में, खिल जायेगी बहना।
अम्मा बाबा हार गए, दे न पाए, नकली वाला चाँद-सितारा
भैया ने ढूँढ दिया, जहाँ चंदा सी चमकेगी बहना।

आज देखो, अब भी रेखाएँ नहीं बनीं, मेरी ख़ाली हथेली पर
रोज़-रोज़ देख तरसती हूँ, पा लूँ चाँद-तारे अपनी हथेली पर।
तुम्हारा वादा था, भर दोगे दामन मेरा, चाँद-सितारों से
सात फ़ेरों सात वचनों बाद, मुझसे पहली बार आलिंगन पर।

अम्मा बाबा, चौअन्नी और ज़री-गोटे से, मुझे भ्रम देते थे
भैया, तुम्हारे घर की झिलमिल रौशनी से, भ्रम देता रहता।
तुम, चाँद-सितारों की जगह, उपकृत कर मुझको ही जड़ दिए
अपने घर के झूमर में, बेमियाद चमकाऊँ, तुम्हारा घर-अँगना।

कब तक मन को तसल्ली दूँ, हुई बेनूर, चाँद-सितारों का भ्रम पालूँ
उन बेजान फ़्राक में टंके, ज़री-गोटे की तरह।
कब तक झिलमिल चमकती रहूँ, पथराई आँखें, घर गुलज़ार करूँ
तुम्हारे घर में सजे, झाड़-फ़ानूस की तरह।

बोलो, कब ला दोगे मुझे ज़मीन पर, अब इस भ्रम से मन नहीं बहलता
क्या भर दोगे मेरी अंजुरी में, कुछ चाँद-सितारों-सा पल तुम्हारा।
बोलो, लौटा दोगे वो वक़्त, जब निढ़ाल ताकती रही, असली वाला चाँद-सितारा
क्या भर दोगे हथेली की लकीरों में, तक़दीर का सच्चा चाँद-सितारा।

आसमान के चाँद-सितारे, अब कब माँगती हूँ तुमसे
बस चाँद-सितारों-सा कुछ पल, माँगती हूँ तुमसे।
भर दो दामन में मेरे, अपने कुछ चाँद-सितारे
बस कुछ पल तुम्हारे हैं, मेरे अपने चाँद-सितारे।

- जेन्नी शबनम (नवम्बर, 2008)

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chaand-sitaare...

bachpan mein jab chaand-sitaaron ke liye machaltee thee
amma frock mein zari-gote se, chaand-taare taank detee thee.
baaba chaand see gol chauanni, bade laad se dete they
main chaand-sitaare paa lene ke bhrum mein, khub itraatee thee.

amma baba chupke se, ek-ek chauanni ka hisaab lagaate they
do chauanni mein kitne din, chaand see roti pak saktee thee.
do waqt kee bhookh bhool jate, jab laadli unki ithlaatee thee
ek chauanni ka zari-gota, ek chauanni gullak mein bhartee thee.

ab bhaiya ne, chaand-sitaaron wala ghar, dhundh diya
chaand-sitaaron kee khanak mein, khil jaayegi bahna.
amaa baba haar gaye, de na paaye, nakli wala chaand-sitaara
bhaiya ne dhundh diya, jahaan chanda see chamkegi bahna.

aaj dekho, ab bhi rekhaayen nahin bani, meri khaali hatheli par
roz-roz dekh tarasti hun, paa lun chaand-taaren apni hatheli par.
tumhara wada thaa, bhar doge daaman mera, chaand-sitaaron se
saat feron saat wachanon baad, mujhse pahli baar aalingan par.

amma baba, chauanni aur zari-gote se, mujhe bhrum dete they
bhaiya, tumhare ghar kee jhilmilati raushni se, bhrum deta rahta.
tum, chaand-sitaaron kee jagah, upakrit kar mujhko hi jad diye,
apne ghar ke jhumar mein, bemiyaad chamkaaun, tumhaara ghar-angna.

kab tak man ko tasalli doon, hui benoor, chaand-sitaaron ka bhrum paaloon
un bejaan frock mein tanke, zari-gote kee tarah.
kab tak jhilmil chamakti rahun, pathraai aahkhen, ghar gulzaar karoon
tumhaare ghar mein saje, jhaad-fanoos kee tarah.

bolo, kab laa doge mujhe zameen par, ab is bhrum se man nahi bahalta
kya bhar doge meri anjuri mein, kuchh chaand-sitaaron-sa pal tumhaara.
bolo, lauta doge wo waqt, jab nidhaal taakti rahee, asli wala chaand-sitaara
kya bhar doge hatheli kee lakiron mein, takdir ka sachcha chaand-sitaara.

aasmaan ka chaand-sitaara, ab kab maangti hun tumse
bas chaand-sitaaron-sa kuchh pal, maangti hun tumse.
bhar do daaman mein mere, apna kuchh chaand-sitaara
bas kuchh pal tumhara hai, mera apnaa chaand-sitaara.

- jenny shabnam (november, 2008)

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Tuesday, September 13, 2011

अभिवादन की औपचारिकता...

अभिवादन की औपचारिकता...

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अभिवादन में पूछते हैं आप...
कैसी हो? क्या हाल है? सब ठीक है ?
करती हूँ मैं, निःसंवेदित अविलम्बित रटा-रटाया उल्लासित अभिनंदन...
अच्छी हूँ ! सब कुशल मंगल है ! आप कैसे हैं?

क्या सचमुच, कोई जानने को उत्सुक है, किसी का हाल?
क्या सचमुच, हम सभी बता सकते, किसी को अपना हाल?
ये प्रचलित औपचारिकता के शब्द हैं, नहीं चाहता सुनना कोई किसी का हाल !
फिर भी पूछ्तें हैं सभी, मैं भी पूछती हूँ, मन में समझते हुए भी दूसरे का हाल !

क्या सुनना चाहेंगे मेरा हाल? क्या दूसरों की पीड़ा जानना चाहेंगे? क्या सुन सकेंगे मेरा सच?
मेरा कुंठित अतीत और व्याकुल वर्तमान, मेरा सम्पूर्ण हाल, जो शायद आपका भी हो थोड़ा सच ?
मैं तो जुटा पाई हूँ, आप भी कहाँ कर पाए हैं, अनौपचारिक बन सच बताने की हिम्मत !
आज बता हीं देती हूँ अपनी सारी सच्चाई, कर हीं देती हूँ हमारे बीच की औपचारिकता का अंत !

बताऊँ कैसे, मेरा वो दर्द, वो अवसाद, वो दंश, जो पल पल मेरे मन को खंडित करता है !
बताऊँ कैसे, मेरा वो सच, जो मेरे अंतर्मन की जागीर है, मन के तहखाने में दफ़न है !
जानती हूँ, मेरा सच सुनकर, आप रुखी हँसी हँस देंगे, हमारे बीच के रहस्यमय आवरण हट जायेंगे !
आप भूले से भी हाल पूछेंगे, अच्छा हीं होगा, अब आप कभी मुझसे औपचारिकता नहीं निभाएंगे !

कैसे बताऊँ कि, मेरे मन में कितनी टीस है, शारीर में कितनी पीर है !
उम्र और वक़्त का एक एक ज़ख्म, मुझसे मुझको छीनता है !
अपनों की ख़्वाहिश को पालने में, ख़ुद को पल पल कितना मारना होता है !
एक विफलता संबंधों की, एक लाचारगी जीने की, मन कितना तड़पता है !

कैसे बताऊँ कि तमाम कोशिशों के बावज़ूद, समाज की कसौटी पर, मैं खरी नहीं उतरी हूँ !
घर के बिखराव को बचाने में, क्षण क्षण कितना मैं ढहती बिखरती हूँ !
वक़्त की कमी या फ़ुर्सत की कमी, एक बहाना सा बना, सब से मैं छिपती हूँ !
त्रासदी सा जीवन-सफ़र मेरा, पर घर का सम्मान... सदा उल्लासित दिखती हूँ !

कैसे बताऊँ कि क्यों संबंधों की भीड़ में, मैं एक अपना तलाशती हूँ?
क्यों दुनिया की रंगीनियों में खोकर भी, मैं रंगहीन हूँ?
क्यों छप्पन व्यंजनो के सामार्थ्य के बाद भी, मैं भूखी-प्यासी हूँ?
क्यों जीवन से, सहर्ष पलायान को, सदैव तत्पर रहती हूँ?

नहीं-नहीं, नहीं बता पाऊँगी सम्पूर्ण सत्य, मंज़ूर है मुखौटा ओढ़ना !
हमारी रीति-संस्कृति ने सिखाया है... कटु सत्य नहीं बोलना !
हमारी तहज़ीब है, आँसुओं को छुपा दूसरों के सामने मुस्कुराना !
सलीका यूँ भी अच्छा होता नहीं, यूँ अपना भेद खोलना !

अभिवादन की औपचारिकता है, किसी का हाल पूछना,
ज़ज्बात की बात नहीं, महज चलन है ये पूछना,
जान-पहचान की चिर-स्थाई है ये परंपरा,
औपचारिकता हीं सही... बस यूँ हीं, हाल पूछते रहना !

- जेन्नी शबनम (मई, 2009)

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Monday, September 12, 2011

लौट चलते हैं अपने गाँव...

लौट चलते हैं अपने गाँव...

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मन उचट गया है
शहर के सूनेपन से,
अब डर लगने लगा है
भीड़ की बस्ती में
अपने ठहरेपन से।  
चलो!
लौट चलते हैं
अपने गाँव,
अपने घर चलते हैं।  
जहाँ अजोर होने से पहले
पहरू के जगाते ही
हर घर उठ जाता है।  
चटाई बीनती
हुक्का गुड़गुड़ाती
बुढ़िया दादी धूप सेंकती है,
गाँती बाँधे नन्हकी
सिलेट पे पेंसिल घिसती है,
अजोर हुए अब तो देर हुई
बड़का बऊआ अपना बोरा-बस्ता ले कर
स्कूल न जाने की ज़िद में खड़ा है,
गाँव के मास्टर साहब
आज ले ही जाने को अड़े हैं,
क्या गज़ब नज़ारा है
बड़ा अज़ब माजरा है।  
अँगने में रोज़ अनाज पसरता है
जाँता में रोज़ दाल दराता है,
गेहूँ पीसने की अब बारी है
भोर होते ही रोटी भी तो पकानी है,
सामने दौनी-ओसौनी भी जारी है
ढेंकी से धान कूटने की आवाज़ लयबद्ध आती है।  
खेत से अभी-अभी तोड़ी
घिउरा और उसके फूल की तरकारी
ज़माना बीता पर स्वाद आज भी वही है,
दोपहर में जन सब के साथ पनपियाई
अलुआ नमक और अचार का स्वाद
मन में आज भी ताज़ा है।  
पगहा छुड़ाते धीरे-धीरे चलते
बैलों की टोली
खेत जोतने की तैयारी है,  
भैंसी पर
नन्हका लोटता है
जब दोपहर बाद
घर लौटता है।  
गोड़ में माटी की गंध
घूर तापते चचा की कहानी,
सपनों सी रातें
अब मुझे बुलाती है।  
चलो!
लौट चलते हैं
अपने गाँव
अपने घर चलते हैं 
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अजोर - रोशनी
पहरू - रात्रि में पहरेदारी करने वाला
चटाई बीनती - चटाई बुनना
गाँती - ठण्ड से बचाव के लिए बच्चों को एक विशेष तरीके से चादर / शॉल से लपेटना
बड़का - बड़ा
बऊआ - बच्चा
बोरा-बस्ता - बैठने के लिए बोरा और किताब का झोला
जाँता - पत्थर से बना हाथ से चला कर अनाज पीसने का यंत्र
दराता - दरना
भोर - सुबह
दौनी - पौधों से धान को निकालने के लिए इसे काटकर इकत्रित कर उसपर बैल चलाया जाता है
ओसौनी - दौनी होने के बाद धान को अलग करने की क्रिया
ढेंकी - लकड़ी से बना यंत्र जिसे पैर द्वारा चलाया जाता है और अनाज कूटा जाता है
घिउरा - नेनुआ
तरकारी - सब्ज़ी
जन - काम करने वाले मज़दूर / किसान
पनपियाई - दोपहर से पहले का खाना
अलुआ - शकरकंद
पगहा - जानवरों के गले में बँधी रस्सी
गोड़ - पैर
घूर - अलाव
चचा - चाचा
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- जेन्नी शबनम ( जुलाई 2003)

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Wednesday, September 7, 2011

अनुबंध...

अनुबंध...

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एक अनुबंध है जन्म और मृत्यु के बीच,
कभी साथ-साथ घटित न होना !
एक अनुबंध है प्रेम और घृणा के बीच,
कभी साथ-साथ फलित न होना !
एक अनुबंध है स्वप्न और यथार्थ के बीच,
कभी सम्पूर्ण सत्य न होना !
एक अनुबंध है धरा और गगन के बीच,
कभी किसी बिंदु पर साथ न होना !
एक अनुबंध है आकांक्षा और जीवन के बीच,
कभी सम्पूर्ण प्राप्य न होना !
एक अनुबंध है मेरे मैं और मेरे बीच,
कभी एकात्म न होना !

- जेन्नी शबनम (जनवरी 27, 2009)

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Tuesday, September 6, 2011

जब भी तन्हा ख़ुद को पाती हूँ ...

जब भी तन्हा ख़ुद को पाती हूँ ...

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मन में कुछ दरक सा जाता है,
जब क्षितिज पर अस्त होता सूरज देखती हूँ,
ज़िन्दगी बार बार डराती है,
जब भी तन्हा ख़ुद को पाती हूँ !

सपने ध्वस्त हो रहे
हवाएं मेरी सारी निशानियाँ मिटा रही है,
वुज़ूद घुटता सा है
जेहन में मवाद की तरह यादें रिसती हैं,
अपेक्षाओं की मुराद दम तोड़ती है
जब भी तन्हा ख़ुद को पाती हूँ !

सहेजे सपनों की विफलता का मलाल
धराशायी अरमान,
मन की विक्षिप्तता
असह्य हो रहा अब ये संताप,
मन डर जाता जीवन के इस रीत से
जब भी तन्हा ख़ुद को पाती हूँ !

हूँ अब खामोश
मूक - बधिर,
निहार रही अपने जीवन का
अरूप अवशेष !

- जेन्नी शबनम (सितम्बर 11, 2008)
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Saturday, September 3, 2011

दर्द की मियाद और कितनी है...

दर्द की मियाद और कितनी है...

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कोई भी दर्द उम्र से पहले ख़त्म नहीं होता
किससे पूछूँ कि
दर्द की मियाद और कितनी है?

- जेन्नी शबनम ( सितम्बर 2, 2011)

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Friday, September 2, 2011

फ़िज़ूल हैं अब...

फ़िज़ूल हैं अब...

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फ़िज़ूल हैं अब
इसलिए नहीं कि सब जान लिया
इसलिए कि जीवन
बेमकसद लगता,
जैसे कि चलती हुई सांसें
या फिर बहती हुई हवा
रात की तन्हाई
या फिर दिन का उजाला,
दरकार नहीं
पर ये रहते
अनवरत
मेरे साथ चलते,
मैं और ये
सब
फ़िज़ूल हैं
अब !

- जेन्नी शबनम ( अगस्त 28, 2011)

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Monday, August 29, 2011

शेष न हो...

शेष न हो...

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सवाल भी ख़त्म और जवाब भी
शायद ऐसे हीं ख़त्म होते हैं रिश्ते,
जब सामने कोई हो
और कहने को कुछ भी शेष न हो !

- जेन्नी शबनम ( अगस्त 27, 2011)

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Sunday, August 28, 2011

इन्द्रधनुष खिला (बरसात पर 10 हाइकु)

इन्द्रधनुष खिला
(बरसात पर 10 हाइकु)

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1.
आकाश दिखा
इन्द्रधनुष खिला
मचले जिया !

2.
हुलसे जिया
घिर आए बदरा
जल्दी बरसे !

3.
धरती गीली
चहुँ ओर है पानी
हिम पिघला !

4.
भींगा अनाज
कुलबुलाये पेट
छत टपकी !

5.
बिजली कौंधी
कहीं जब वो गिरी
खेत झुलसे !

6.
धरती ओढ़े
बादलों की छतरी
सूरज छुपा !

7.
मेघ गरजा
रिमझिम बरसा
मन हरसा !

8.
कारे बदरा
टिप-टिप बरसे
मन हरसे !

9.
इन्द्र देवता
हुए धरा से रुष्ट
लोग पुकारे !

10.
ठिठके खेत
कर जोड़ पुकारे
बरसो मेघ !

- जेन्नी शबनम ( अगस्त 18, 2011)

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Friday, August 26, 2011

राखी के धागे (राखी पर 11 हाइकु)

राखी के धागे
(राखी पर 11 हाइकु)

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1.   
राखी का पर्व   
पूर्णमासी का दिन   
सावन माह !   

2.   
राखी-त्योहार   
सब हों ख़ुशहाल   
भाई-बहन !   

3.   
बहना आई   
राखी लेकर प्यारी   
भाई को बाँधी !   

4.   
रक्षा बंधन   
प्यार का है बंधन   
पवित्र धागा !   

5.   
रक्षा का वादा   
है भाई का वचन   
बहन ख़ुश !   

6.   
भैया विदेश   
राखी किसको बाँधे   
राह निहारे !   

7.   
राह अगोरे   
भइया नहीं आए   
राखी का दिन !   

8.   
सजेगी राखी   
भैया की कलाई पे   
रंग-बिरंगी !   

9.   
राखी की धूम   
दिखे जो चहुँ ओर   
मनवा झूमे !   

10.   
रक्षा-बंधन   
याद रखना भैया   
प्यारी बहना !   

11.   
अटूट रिश्ता   
जोड़े भाई-बहन   
रक्षा बंधन !   

- जेन्नी शबनम (13. 8. 2011)   

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Monday, August 22, 2011

दुनिया बहुत रुलाती है...

दुनिया बहुत रुलाती है...

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प्रेम की चाहत कभी कम नहीं होती
ज़िन्दगी बस दुनियादारी में कटती है,
कमबख्त ये दुनिया बहुत रुलाती है.

_ जेन्नी शबनम ( अगस्त 21, 2011 )

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Friday, August 19, 2011

फिर से मात...

फिर से मात...

*******

बेअख्तियार सी हैं करवटें
बहुत भारी है आज की रात,
कह दिया यूँ तल्ख़ी से उसने
तन्हाई है ज़िन्दगी की बात !

साथ रहने की वो गुज़ारिश
बन चली आँखों में बरसात,
ख़त्म होने को है जिंदगानी
पर ख़त्म नहीं होते जज़्बात !

सपने पलते रहे आसमान के
छूटी ज़मीन बने ऐसे हालात,
वक़्त से करते रहे थे शिकवा
वक़्त ही था बैठा लगाए घात !

शिद्दत से जिसे चाहा था कभी
मिले हैं ऐसे कुछ लम्हे सौगात.
अभी जाओ ओ समंदर के थपेड़ों
आना कभी फिर होगी मुलाक़ात !

दोराहे पर है ठिठकी ज़िन्दगी
कदम-कदम पर खड़ा आघात.
देखो सब हँस पड़े किस्मत पर
'शब' ने खाई है फिर से मात !

- जेन्नी शबनम ( अगस्त 11, 2011 )

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Monday, August 15, 2011

राम नाम सत्य है...

राम नाम सत्य है...

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कोई तो पुकार सुनो
कोई तो साहस करो,
चीख नहीं निकलती
पर दम निकल रहा है उनका 
वो अपने दर्द में ऐसे टूटे हैं
कि ज़ख़्म दिखाने से भी कतराते हैं,
उनकी सिसकी मुँह तक नहीं आती
गले में ही अटक जाती है,
करुणा नहीं चाहते
मेहनत से जीने का अधिकार चाहते हैं
जो उन्हें मिलता नहीं,
और छीन लेने का साहस नहीं
क्योंकि
बहुत तोड़ा गया
वर्षों वर्ष उनको,
दम टूट जाए पर ज़ुबान चुप रहे
इसी कोशिश में
रोज़ रोज़ मरते हैं 
चिथड़ों में लिपटे बच्चों की
ज़ुबान भी चुप हो गई है,
रोने केलिए
पेट में अनाज तो हो
देह में जान तो हो,
लहलहाती फसलें
प्रकृति लील गई
देह की ताकत
खाली पेट की मजूरी
तोड़ गई,
हाथ अकेला
भँवर बड़ा
उफ्फ्फ्...
इससे तो अच्छा है
जीवन का अंत,
एक साथ सब बोलो
राम नाम सत्य है...!

_ जेन्नी शबनम (अगस्त 15, 2011)

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Thursday, August 11, 2011

अलविदा कहती हूँ...

अलविदा कहती हूँ...

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ख्वाहिशें ऐसे ही दम तोड़ेंगी
जानते हुए भी
नए-नए ख्व़ाब देखती हूँ,
दामन से छूटते जाते
जाने कितने पल
फिर भी वक़्त को समेटती हूँ,
शमा फिर भी जलेगी
रातें फिर भी होंगी
साथ तुम्हारे
बस एक रात आख़िरी चाहती हूँ,
चाह कर टूटना
या टूट कर चाहना
दोनों हाल में
मैं ही तो हारती हूँ,
दूरियाँ और भी
बढ़ जाती है
मैं जब-जब पास आती हूँ,
पास आऊँ या दूर जाऊँ
सिर्फ मैं ही
मात खाती हूँ,
न आए कोई आँच तुमपर
तुमसे दूर
चली जाती हूँ,
एक वचन देती हूँ प्रिय
ख़ुद से नाता
तोड़ती हूँ,
'शब' की हँसी
गूँज रही
महफ़िल में सन्नाटा है
रूख़सत होने की बारी है
अब मैं
अलविदा कहती हूँ!

- जेन्नी शबनम (अगस्त 10, 2011)

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Sunday, August 7, 2011

तुम मेरे दोस्त जो हो...

तुम मेरे दोस्त जो हो...

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मेरे लिए एक काम कर दोगे
''ज़हर ला दोगे,
बहुत थक गई हूँ
ज़िन्दगी से उब गई हूँ'',
जानती हूँ तुम ऐसा नहीं करोगे
कभी ज़हर नहीं ला दोगे,
मेरी मृत्यु सह नहीं सकते
फिर भी कह बैठती हूँ तुमसे|
तुम भी जानते हो
मुझमें मरने का साहस नहीं
न जीने की चाहत बची है,
पर हर बार जब जब हारती हूँ
तुमसे ऐसा ही कहती हूँ|
तुम्हारे काँधे पे मेरा माथा
सहारा और भरोसा
तुम ही तो देते हो,
मेरे हर सवाल का जवाब भी
तुम ही देते हो,
बिना रोके बिना टोके
शायद तुम ही हो
जो मेरे गुस्से को सह लेते हो
मेरे आँसुओं को बदल देते हो|
कई बार सोचती हूँ
तुम्हारी गलती नहीं
दुनिया से नाराज़ हूँ
फिर क्यों ख़फा होती हूँ तुमपर
क्यों खीझ निकालती हूँ तुमपर,
तुम चुपचाप सब सुनते हो
मुझे राहत देते हो|
कई बार मन होता है
तुमसे अपना नाता तोड़ लूँ
अपने ज़ख़्म ख़ुद में समेट रखूँ,
पर न जाने क्यों
किश्त-किश्त में सब कह जाती तुमसे|
शायद ये भी कोई नाता है
जन्म का तो नहीं
पर जन्मों का रिश्ता है,
इसलिए बेख़ौफ़
कभी ज़हर माँगती
कभी नज़र माँगती,
कभी रूठ जाती हूँ
महज़ इस बात केलिए कि
मेरे लिए मृत्यु क्यों नहीं खरीद लाये
तुम बहुत कंजूस हो|
जानती हूँ
तुम मेरे दोस्त जो हो
मेरे लिए मौत नहीं
सदैव ज़िन्दगी लाते हो!

- जेन्नी शबनम (अगस्त 7, 2011)
( मित्रता दिवस पर)
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Saturday, August 6, 2011

उन्हीं दिनों की तरह...

उन्हीं दिनों की तरह...

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चौंक कर उसने कहा
''जाओ लौट जाओ
क्यों आई हो यहाँ
क्या सिर्फ वक़्त बिताना चाहती हो यहाँ?
हमने तो सर्वस्व अपनाया था तुम्हें
क्यों छोड़ गई थी हमें?''
मैं अवाक्
निरुत्तर!
फिर भी कह उठी
उस समय भी कहाँ मेरी मर्ज़ी चली थी
गवाह तो थे न तुम,
जीवन की दशा और दिशा को
तुमने ही तो बदला था,
सब जानते तो थे तुम
तब भी और अब भी!
सच है
तुम भी बदल गए हो
वो न रहे
जैसा उन दिनों छोड़ गई थी मैं,
एक भूलभुलैया
या फिर अपरिचित-सी फ़िज़ा
जाने क्यों लग रही है मुझे?
तुम न समझो  पर अपना-सा लग रहा है मुझे
थोड़ा-थोड़ा ही सही,
आस है
शायद तुम वापस अपना लो मुझे
उसी चिर परिचित अपनेपन के साथ
जब मैं पहली बार मिली थी तुमसे
और तुमने बेझिझक
सहारा दिया था मुझे
यह जानते हुए कि मैं असमर्थ और निर्भर हूँ
और हमेशा रहूँगी,
तुमने मेरी समस्त दुश्वारियाँ समेट ली थी
और मैं बेफ़िक्र
ज़िन्दगी के नए रूप देख रही थी
सही मायने में ज़िन्दगी जी रही थी!
सब कुछ बदल गया है
वक़्त के साथ
जानती हूँ
पर उन यादों को जी तो सकती हूँ!
ज़रा-ज़रा पहचानो मुझे
एक बार फिर उसी दौर से गुज़र रही हूँ,
फ़र्क सिर्फ वज़ह का है
एक बार फिर मेरी ज़िन्दगी तटस्थ हो चली है
मैं असमर्थ और निर्भर हो चली हूँ!
तनिक सुकून दे दो
फिर लौट जाना है मुझे
उसी तरह उस गुमनाम दुनिया में
जिस तरह एक बार ले जाई गई थी
तुमसे दूर
जहाँ अपनी समस्त पहचान खोकर भी
अब तक जीवित हूँ!
मत कहो
''जाओ लौट जाओ'',
एक बार कह दो -
''शब, तुम वही हो
मैं भी वही
फिर आना
कुछ वक़्त निकालकर
एक बार साथ-साथ जिएँगे
फिर से
उन्हीं दिनों की तरह
कुछ पल!''

- जेन्नी शबनम (जुलाई 17, 2011)
( 20 साल बाद शान्तिनिकेतन आने पर )
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Wednesday, August 3, 2011

कह न पाउँगी कभी...

कह न पाउँगी कभी...

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अपने जीवन का सत्य
कह न पाऊँगी
किसी से कभी,
अपने पराए का भेद
समझती हूँ,
पर जानती हूँ
कह न पाऊँगी
किसी से कभी 

न जाने कब कौन
अपना बनकर
जाल बिछा रहा हो,
किसी तरह फँसकर
उसके जलसे का
मैं बस हिस्सा रह जाऊँ 

बहुत घुटन होती है
जब-जब भरोसा टूटता है,
किसी अपने के सीने से
लिपट जाने का
मन करता है 

समय-चक्र और नियति
कहाँ कौन जान पाया है ?
किसी पराए की प्रीत
शायद प्राण दे जाए
जीवन का कारण बन जाए,
पर पराए का अपनापन
कैसे किसी को समझाएँ ?

अपनों का छल
बड़ा घाव देता है,
पराए से अपना कोई नहीं
मन जानता है,
पर जानती हूँ
कह न पाऊँगी
किसी से कभी । 

- जेन्नी शबनम ( जुलाई 19, 2011)

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Monday, August 1, 2011

कुछ तो था मेरा अपना...

कुछ तो था मेरा अपना...

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जी चाहता है
सब कुछ छोड़ कर
वापस लौट जाऊँ
अपने उसी अँधेरे कोने में
जहाँ कभी किसी दिन
दुबकी हुई मैं
मिली थी तुम्हें,
और तुम खींच लाए थे उजाले में
चहकने के लिए|
खिली-खिली मैं
जाने कैसे सब भूल गई
वो सब यादें विस्मृत कर दी
जो टीस देती थी मुझे,
और मैं
तुम्हारे साथ
सतरंगी सपने देखने लगी थी|
जानते हुए कि
बीते हुए कल के अँधेरे साथ नहीं छोड़ेंगे
और एक दिन तुम भी छोड़ जाओगे,
मैंने एक भ्रम लपेट लिया था कि
सब कुछ अच्छा है
जो बीता वो कल था
आज का सपना
सब सच्चा है|
अब तो जो शेष है
बस मेरे साथ
मेरा ही अवशेष है,
जी चाहता है
वापस लौट जाऊँ
अपने उसी अँधेरे कोने में
अपने सच के साथ,
जहाँ कुछ तो था
मेरा अपना...

- जेन्नी शबनम ( अगस्त 1, 2011)

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Wednesday, July 20, 2011

एक चूक मेरी...

एक चूक मेरी...

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रास्ते पर
चलते हुए
मैं उससे टकरा गई,
उसके हाथ में पड़े सभी
फलसफे
गिर पड़े
जो मेरे लिए ही थे,
सभी टूट गए
और मैं
देखती रही । 
उसने कहा
ज़रा सी चूक
तमाम जीवन की सज़ा बन गई तुम्हारी,
तुम जानती हो कि उचित क्या है
क्योंकि तुमने देखा है उचित फलसफे,
जो जन्म के साथ तुम्हें मिलने थे
जिनके साथ तुम्हें जीना था,
पर...
अडिग रहने का साहस
अब तुममे न होगा,
जाओ
और बस जीयो
उन सभी की तरह
जो बिना किसी फलसफे के जीते
और मर जाते हैं,
बस एक फ़र्क होगा कि
तुम्हें पता है तुम्हारे लिए सही क्या है
और जानते हुए भी अब तुम्हें
बेबस जीना होगा
अपनी आत्मा को मारना होगा । 
मेरे पास मेरे तर्क थे
कि ये अनजाने में हुआ
एक मौका और...
इतने न सही थोड़े से...
पर उसने कहा
ये सबक है इस जीवन के लिए
ज़रा सी चूक
और सब ऐसे ही ख़त्म हो जाता है
कोई मौका दोबारा नहीं आता है । 
आज तक
मै जी रही
मेरे फलसफों के टूटे टुकड़ों में
अपनी ज़िन्दगी को बिखरते देख रही
रोज़-रोज़ मेरी आत्मा मर रही । 
वो वापस कभी नहीं आया
न दोबारा मिला,
एक चूक मेरी
और... !

- जेन्नी शबनम ( जुलाई 20, 2011)

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Friday, July 15, 2011

मैं इंसान हूँ...

मैं इंसान हूँ...

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मैं, एक शब्द नही
एहसास हूँ
अरमान हूँ
साँसे भरती हाड़-मांस की
जीवित इंसान हूँ ।  

दर्द में आँसू निकलते हैं
काटो तो रक्त बहता है
ठोकर लगे तो पीड़ा होती है
दगा मिले तो दिल तड़पता है । 

कुछ बंधन बन गए
कुछ चारदीवारी बन गई
पर ख़ुद में
मैं अब भी जी रही । 

कई चेहरे ओढ़ लिए
कुछ दुनिया पहन ली
पर कुछ बचपन ले
मैं आज भी जी रही । 

मेरे सपने
आज भी मचलते हैं
मेरे ज़ज्बात
मुझसे अब
रिहाई माँगते हैं । 

कब, कहाँ, कैसे से कुछ प्रश्न
यूँ हीं पनपते हैं
और ये प्रश्न
मेरी ज़िन्दगी उलझाते हैं । 

हाँ, मैं
सिर्फ एक शब्द नहीं
एहसास हूँ
अरमान हूँ
साँसे भरती हाड़-मांस की
जीवित इंसान हूँ । 

- जेन्नी शबनम (जनवरी 22, 2009)
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Sunday, July 10, 2011

गौरैया (स्त्री) की आत्मकथा...

गौरैया (स्त्री) की आत्मकथा...

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एक सदी तक
चहकती फिरी
घर आँगन गलियों में,
थी कथा परियों की
और जीवन
फुदकती गौरैया-सी 

दूसरी सदी में
आ बसी
हर कोने चौखट चौबारे में,
कण-कण में
बिछती रही
बगिया में ख़ुशबू-सी । 

तीसरी सदी तक
आ पहुँची,
घर की गौरैया
अब उड़ जाएगी,
घर आँगन होगा सूना
याद बहुत आएगी,
कोई गौरैया है आने को
अपनी दूसरी सदी में
जीने को,
कण-कण में समाएगी
घर आँगन वो खिलाएगी । 

ख़ुद को अब समेट रही
बिखरे निशाँ पोंछ रही
यादों में कुछ दिन जीना है
चौथी सदी बिताना है
फिर तस्वीर में सिमट जाना है । 

जाने कैसी ये आत्मकथा
मेरी उसकी सबकी
एक जैसी है,
खिलना बिछना सिमटना
ख़त्म होती यूँ
गौरैया की कहानी है । 

- जेन्नी शबनम ( मई 30, 2011)

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Thursday, July 7, 2011

स्तब्ध खड़ी हूँ...

स्तब्ध खड़ी हूँ...

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ख़्वाबों के गलियारे में, स्तब्ध, मैं हूँ खड़ी,
आँखों से ओझल, ख़ामोश, पास तुम भी हो खड़े,
साँसे हैं घबराई सी, वक्त भी है परेशान खड़ा|
जाने कौन सी विवशता है, वक्त ठिठका है,
जाने कौन सा तूफ़ान थामे, वक्त ठहरा है|

मेरी सदियों की पुकार तुम तक नहीं पहुँचती,
तुम्हारी ख़ामोशी व्यथित कर रही है मुझे|
अपनी आँखों से अपने बदन का लहू पी रही,
और जिस्म को आँसुओं से सहेज रही हूँ|

मैं, तुम और वक्त ...
सदियों से सदियों का तमाशा देख रहे हैं|
न हम तीनों थके न सदियाँ थकी,
शायद...एक और इतिहास रचने वाला है,
या शायद...एक और बवंडर आने वाला है|

_ जेन्नी शबनम ( जनवरी 23, 2009)

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Wednesday, July 6, 2011

ज़िन्दगी मौका नहीं देती...

ज़िन्दगी मौका नहीं देती...

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खौफ़ के साये में
ज़िन्दगी को तलाशती हूँ,
ढेरों सवाल हैं
पर जवाब नहीं|
हर पल, हर लम्हा
एक इम्तहान से गुजरती हूँ,
ख्वाहिशें इतनी कि पूरी नहीं होती
कमबख्त, ये ज़िन्दगी मौका नहीं देती|

- जेन्नी शबनम (जनवरी 24, 2009)

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Saturday, July 2, 2011

विजयी हो पुत्र...

विजयी हो पुत्र...
(अपने पुत्र अभिज्ञान के 18 वें जन्मदिन पर)

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मैं, तुम्हारी माँ, एक गाँधारी
मैंने
अपनी आँखों पे नहीं
अपनी संवेदनाओं पे पट्टी बाँध रखी है,
इसलिए नहीं कि
तुम्हारा शरीर बज्र का कर दूँ
इसलिए कि
अपनी तमाम संवेदनाएँ तुममें भर दूँ । 

यह युद्ध दुर्योधन का नहीं
जिसे गाँधारी की समस्त शक्ति मिली
फिर भी हार हुई,
क्योंकि उसने मर्यादा को तोड़ा
अधर्म पर चला
अपनों से छल किया
स्त्री, सत्ता और संपत्ति के कारण युद्ध किया । 

मेरे पुत्र,
तुम्हारा युद्ध
धर्म का है
जीवन के सच का है
अंतर्द्वंद का है
स्वयं के अस्तित्व का है । 

तुम पांडव नहीं
जो कोई कृष्ण आएगा सारथी बनकर
और युद्ध में विजय दिलाएगा,
भले ही तुम धर्म पर चलो
नैतिकता पर चलो,
तुम्हें अकेले लड़ना है
और सिर्फ जीतना है । 
मेरी पट्टी नितांत अकेले में खुलेगी
जब तुम स्वयं को अकेला पाओगे
दुनिया से हारे
अपनों से थके,
मेरी संवेदना
प्रेम
विश्वास
शक्ति
तुममें प्रवाहित होगी
और तुम जीवन-युद्ध में डटे रहोगे
जो तुम्हें किसी के विरुद्ध नहीं
बल्कि
स्वयं को स्थापित करने केलिए करना है । 

मेरी आस और आकांक्षा
अब बस तुम से ही है
और जीत भी । 

- जेन्नी शबनम ( जून 22, 2011)

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