शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

648. फ़ितरत

फ़ितरत 

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थोड़ा फ़लसफ़ा थोड़ी उम्मीद लेकर 
चलो फिर से शुरू करते हैं सफर 
जिसे छोड़ा था हमने तब, जब 
जिंदगी बहुत बेतरतीब हो गई थी 
और दूरी ही महज़ एक राह बची थी 
साथ न चलने और साथ न जीने के लिए, 
साथ सफर पर चलने के लिए 
एक दूसरे को राहत देनी होती है 
ज़रा-सा प्रेम, जरा-सा विश्वास चाहिए होता है 
और वह हमने खो दिया था 
जिंदगी को न जीने के लिए 
हमने खुद मजबूर किया था, 
सच है बीती बातें न भुलाई जा सकती हैं 
न सीने में दफ़न हो सकती हैं 
चलो, अपने-अपने मन के एक कोने में 
बीती बातों को पुचकार कर सुला आते हैं 
अपने-अपने मन पर एक ताला लगा आते हैं, 
क्योंकि अब और कोई ज़रिया भी तो नहीं बचा 
साँसों की रवानगी और समय से साझेदारी का 
अब यही हमारी जिंदगी है और 
यही हमारी फ़ितरत भी। 

- जेन्नी शबनम (20. 2. 2020)

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