Wednesday, June 29, 2011

आत्मीयता के क्षण...

आत्मीयता के क्षण...

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आत्मीयता के ये क्षण
अनकहे भले ही रह जाए
अनबूझे नहीं रह सकते|

नहीं नहीं, यह भ्रम है
निरा भ्रम
कोरी कल्पना,
पर नहीं,
उन क्षणों को कैसे भ्रम मान लूँ
जहाँ मौन ही मुखरित होकर
सब कुछ कह गया था|

शाम का धुंधलका
मन के बोझ को
और भी बढ़ा देता है,
मंजिलें खो गई हैं
राहें भटक गई हैं
स्वयं नहीं मालूम
जाना कहाँ है|

क्या यूँ निरुद्देश्य भटकन ही ज़िन्दगी है?
क्या कोई अंत नहीं?
क्या यही अंत है?
क्या कोई हल नहीं?
क्या यही राह है?
कब तक इन अनबूझ पहेलियों से
घिरे रहना है?

काश!
आत्मीयता के ये अनकहे क्षण
अनबूझे ही रहते|

- जेन्नी शबनम (जनवरी 25, 2009)
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Tuesday, June 28, 2011

नन्ही भिखारिन...

नन्ही भिखारिन...

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यह उसका दर्द है,
पर मेरे बदन में
क्यों रिसता है?
या खुदा!
नन्ही सी जान
कौन सा गुनाह था उसका?

शब्दों में खामोशी ,
आँखों में याचना
पर शर्म नही,
हर एक के सामने
हाथ पसारती
सौ में से कोई एक कुछ दे जाता,
उतने में हीं संतुष्ट|
थोड़ा थम कर
गिन कर,
फ़िर अगली गाड़ी के पास
बढ़ जाती|

उफ़!
उसे पीड़ा नही होती?
पर क्यों नही होती?

कहते हैं पिछले जन्म का इस जन्म में
भुगतता है जीवन,
फ़िर इस जन्म का भुगतना
कब सुख पायेगा जीवन?
मन का धोखा
या सब्र की एक ओट,
जीने की विवशता
पर मुनासिब भी तो नही अंत|
कुछ सिक्कों की खनक में
खोया बचपन
फ़िर भी शांत
जैसे यही नसीब|
जीवित हैं
जीना है
नियति है
ख़ुदा का रहम है|

उफ़!
उसे खुदा पर रोष नही होता?
पर क्यों नही होता?

उसका दर्द उसका संताप
उसकी नियति है,
उसका भविष्य उसका वर्तमान
एक ज़ख्म है|
यह उसका दर्द है
पर मेरे बदन में
क्यों रिसता है?

- जेन्नी शबनम (जनवरी 10, 2009)

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Saturday, June 25, 2011

बस धड़कनें चलेंगी...

बस धड़कनें चलेंगी...

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भला ऐसा भी होता है
न जीते बनता है
न कोई रास्ता मिलता है,
साथ चलते तो हैं
लेकिन
कुछ दूरी बनाए रहना होता है,
मन में बहुत कुछ
अनबोला रहता है
बहुत कुछ अनजीया रहता है,
मन तो चाहता है
सब कह दें
जो जी चाहता
सब कर लें,
कई शर्तें भी साथ होती हैं
जिन्हें मानना अपरिहार्य है
न मानो तो
अनर्थ हो जाए
ऐसा भी हो सकता है,
संसार के दांव पेंच
मन बहुत घबराता है,
बेहतर है
अपने कुआँ के मेढ़क रहो
या अपने चारों तरफ
काँटों के बाड़ लगा लो,
न कोई आएगा
न कोई भाव उपजेंगे
न मन में कोई कामना जागेगी,
मृत्यु की प्रतीक्षा में
बस धड़कनें चलेंगी!

- जेन्नी शबनम (जून 20, 2011)

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Wednesday, June 22, 2011

सूरज ने आज ही देखा है मुझे...

सूरज ने आज ही देखा है मुझे...

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रोज़ ही तो होती है
नयी सुबह
रोज़ ही तो देखती हूँ
सूरज को उगते हुए,
पर मन में उमंगें
आज ही क्यों ?
शायद...पहली बार सूरज ने
आज ही देखा है मुझे!

अपनी समस्त ऊर्जा
और उष्णता से
मुझमें जीवन भर रहा है,
अपनी धूप की सेंक से
मेरी नम ज़िन्दगी को
ताज़ा कर रहा है!

जाने कितने सागर हैं
समाये मुझमें
समस्त संभावनाएँ और सृष्टी की पहचान
दे रहा है,
ज़िन्दगी अवसाद नहीं न विरोध है
अद्भूत है
अपनी तेज किरणों से
ज्ञान दे रहा है!

बस एक अनुकूल पल
और तरंगित हो गया
समस्त जीवन-सत्य,
बस एक अनोखा संचार
और उतर गया
सम्पूर्ण शाश्वत-सत्य!

- जेन्नी शबनम (जनवरी 26, 2009)
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Tuesday, June 21, 2011

मेरी ज़िन्दगी पलायन कर रही है.../ meri zindagi palaayan kar rahi hai...

मेरी ज़िन्दगी पलायन कर रही है...

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मेरी ज़िन्दगी पलायन कर रही है
या मैं स्व-रचित संसार में सिमट रही हूँ,
शायद मैंने भ्रम-जाल रच लिया है
और ख़ुद हीं उससे लिपट झुंझला रही हूँ,
मेरे हिस्से में प्रेम और जीवन भी है
पर अपना हिस्सा मैं हीं गुम कर रही हूँ,
वज़ह नहीं न तो कोई इल्ज़ाम है
बस स्वप्नलोक सी एक दुनिया तलाश रही हूँ,
मेरे कई सवाल मुझे बरगलाते हैं
अब सवाल नहीं ख़ुद को हीं ख़त्म कर रही हूँ !

_ जेन्नी शबनम (अगस्त 11, 2010)
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meri zindagi palaayan kar rahi hai...

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meri zindagi palaayan kar rahi hai
ya main swa-rachit sansaar men simat rahi hun,
shaayad maine bhram-jaal rach liya hai
aur khud hin usase lipat jhunjhala rahi hun,
mere hisse men prem aur jivan bhi hai
par apna hissa main hin gum kar rahi hun,
vazah nahin na to koi ilzaam hai
bas swapnlok si ek duniya talaash rahi hun,
mere kai sawaal mujhe bargaalate hain
ab sawaal nahin khud ko hin khatm kar rahi hun!

_ jenny shabnam (august11, 2010)

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Monday, June 20, 2011

मेरे मीत...

मेरे मीत...

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देखती हूँ तुम्हें
चाँद की काया पर,
हर रोज़ जब भी चाहा कि देखूं तुम्हें
पाया है तुम्हें
चाँद के सीने पर!

तुम मेरे हो, और मेरे ईश भी,
तुम मेरे हो, और मेरे मीत भी!
तुम्हारी छवि में मैंने खुदा को है पाया,
तुम्हारी छवि में मैंने खुद को है पाया!

कभी चाँद के दामन से
कुछ रौशनी उधार मांग लाई थी
और उससे तुम्हारी तस्वीर
उकेर दी थी
चाँद पर,
जब जी चाहता मिलूं तुमसे
देखती हूँ तुम्हें चाँद की काया पर!


__ जेन्नी शबनम __ 8 फ़रवरी, 2009
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Wednesday, June 15, 2011

वो दोषी है...

वो दोषी है...

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कच्ची उम्र
कच्ची सड़क पर
अपनी समस्त पूँजी
घसीट रही
उसे जाना है सीमा के पार
अकेले रहने
क्योंकि
वो पापी है
वो दोषी है !
छुपा रही लूटा धन
लपेट रही अपना बदन
शब्द-वाणों से है छलनी मन
नरभक्षियों ने किया घायल तन
सगे-संबंधी विवश
मूक ताक रहे सभी निस्तब्ध !
नोच खाया जिसने
उसी ने ठराया दोषी उसे
अब न मिलेगी छाँव
भले कितने ही थके हों पाँव
कोई नहीं है साथ
जिसे कहे मन की बात
हार गई स्वयं अपने से
झुकी आँखें शर्म से !

- जेन्नी शबनम (14. 6. 2011)

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Saturday, June 11, 2011

हो ही नहीं...

हो ही नहीं...

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कौन जाने सफ़र कब शुरू हो
या कि हो ही नहीं,
रास्ते तो कहीं जाते नहीं
चलना मेरे नसीब में हो ही नहीं !

- जेन्नी शबनम (1. 2. 2011)

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Thursday, June 9, 2011

ग्रीष्म (ग्रीष्म के 10 हाइकु)

ग्रीष्म
(ग्रीष्म के 10 हाइकु)

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1.
तपती गर्मी
अब तो बरस जा
ओ रे बदरा !

2.
उसका ताप
जल उठे जो हम
सूरज हँसा !

3.
सह न सके
उड़ चले पखेरू
बावड़ी सूखी !

4.
गगरी खाली
सूख गई धरती
प्यासी तड़पूँ !

5.
सूर्य कठोर
अगन बरसाए
कहीं न छाँव !

6.
झुलस गई
धधकती धूप में
मेरी बगिया !

7.
खेलते बच्चे
बरगद की छाँव
कभी था गाँव !

8.
सूर्य उगले
आग का है दरिया
तन झुलसा !

9.
सूरज जला
तपता जेठ मास
आ जा आषाढ़ !

10.
तपता जेठ
मन को अलसाए
पौधे मुर्झाए !

- जेन्नी शबनम (अप्रैल 2, 2011)

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Sunday, June 5, 2011

तुम केवल मेरी कविता के पात्र हो...

तुम केवल मेरी कविता के पात्र हो...

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मेरी कविता पढ़ते हुए
अचानक रुक गए
उसमें ख़ुद को तलाशते हुए
पूछ बैठे तुम
कौन है इस कविता में?
मैं तुम्हें देखती रही अपलक
ख़ुद को कैसे न देख पाते हो तुम?
जब हवाएं नहीं गुजरती
बिना तुमसे होकर
मेरी कविता कैसे रचेगी
बिना तुमसे मिलकर,
हर बार तुमको बताती हूँ
कि कौन है इस कविता का पात्र
और किस कविता में हो सिर्फ तुम,
फिर भी कहते हो
क्या मैं सिर्फ कविता का एक पात्र हूँ
क्या तुम्हारी ज़िन्दगी का नहीं?
प्रश्न स्वयं से भी करती हूँ
और उत्तर वही आता है
हाँ, तुम केवल मेरी कविता के पात्र हो,
मगर कविता क्या है?
मेरी ज़िन्दगी
मेरी पूरी ज़िन्दगी!

__ जेन्नी शबनम __ 5. 6. 2011

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Saturday, June 4, 2011

कोई और लिख गया...

कोई और लिख गया...

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वक़्त के साथ मैं तो चलती रही
वक़्त ने जब जो कहा करती रही!
क्या जानूं क्या है जीने का फलसफा
बेवजह सी हवाओं में सांस लेती रही!
मरघट सी वीरानी थी हर जगह
और मैं ज़िंदगी को तलाशती रही!
जाने कौन दे रहा आवाज़ मुझको
मैं तो बेगानों के बीच जीती रही!
कोई मिला राह में गुजरते हुए कल
डरती झिझकती मैं साथ बढ़ती रही!
कोई और लिख गया कहानी मेरी
मैं जाने क्या समझी और पढ़ती रही!
जिसने चाहा मढ़ दिया गुनाह बेदर्दी से
''शब'' हंसकर गुनाह कबूल करती रही!

__ जेन्नी शबनम __ 4. 06. 2011

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