Sunday, November 14, 2010

जाने कैसा लगता होगा...

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बाल दिवस पर एक यतीम बालिका की मनोदशा...
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जाने कैसा लगता होगा...

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कैसा लगता होगा
जब किसी घर में
अम्माँ-बाबा संग
बिटिया रहती है,
कैसा लगता होगा
जब अम्माँ कौर-कौर
बिटिया को खिलाती है,
कैसा लगता होगा
जब बाबा की गोद में
बिटिया इतराती है!

क्या जानूँ वो एहसास
जाने कैसा लगता होगा,
पर सोचती हूँ हमेशा
बड़ा प्यारा लगता होगा,
अम्माँ-बाबा की बिटिया का
सब कुछ वहाँ कितना
अपना-अपना-सा होता होगा!

बहुत मन करता है
एक छोटी बच्ची बन जाऊँ,
खूब दौडूँ-उछलूँ-नाचूँ   
बेफ़िक्र हो शरारत करूँ,
ज़रा-सी चोट पर
अम्माँ-बाबा की गोद में
जा चिपक उनको चिढ़ाऊँ!

सोचती हूँ
अगर ये चमत्कार
हुआ तो...
बन भी जाऊँ   
बच्ची तो...
अम्माँ-बाबा
कहाँ से लाऊँ?
जाने कैसे थे
कहाँ गए वो?
कोई नहीं बताता
क्यों छोड़ गए वो?

सब यतीम यहाँ
कौन किसको समझाए,
आज तो बहुत मिला
प्यार सबका,
रोज़-रोज़ कौन
जतलाये?
यही है जीवन समझ में अब
आ ही जाए!

न मैं बच्ची बनी
न बनूँगी किसी की अपनी,
हर शब यूँ ही तन्हा
इसी दर पर गुज़र जाएगी,
रहम से देखती आँखें सबकी
मेरी खाली हथेली की दुआ ले जायेगी!

- जेन्नी शबनम (14. 11. 2010)

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