Tuesday, November 8, 2011

भय...

भय...

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भय !
किससे भय?
ख़ुद से?
ख़ुद से कैसा भय?
असंभव!
पर ये सच है
अपने आप से भय,
ख़ुद के होने से भय
ख़ुद के खोने का भय,
अपने शब्दों से भय
अपने प्रेम से भय,
अपने क्रोध से भय
अपने प्रतिकार से भय,
अपनी चाहत का भय
अपनी कामना का भय,
कुछ टूट जाने का भय
सब छूट जाने का भय !
कुछ अनजाना अनचीन्हा भय
ज़िन्दगी के साथ चलता है
ख़ुद से ख़ुद को डराता है !
कोई निदान ?
असंभव !
जीवन से मृत्युपर्यंत
भय भय भय
न निदान
न निज़ात !

- जेन्नी शबनम (नवम्बर 7, 2011)

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