Tuesday, October 4, 2011

भस्म होती हूँ...

भस्म होती हूँ...

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अक्सर सोचती हूँ
हतप्रभ हो जाती हूँ,
चूड़ियों की खनक
हाथों से निकल चेहरे तक
कैसे पहुँच जाती है?
झुलसता मन
अपना रंग झाड़कर
कैसे दमकने लगता है?
शायद वक़्त का हाथ
मेरे बदन में
घुस कर
मुझसे बगावत करता है,
मैं अनचाहे
हँसती हूँ चहकती हूँ
फिर तड़पकर
अपने जिस्म से लिपट
अपनी हीं आग में भस्म होती हूँ!

- जेन्नी शबनम (सितम्बर 1, 2011)

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