Wednesday, October 19, 2011

ज़िन्दगी...

ज़िन्दगी...

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ज़िन्दगी तेरी सोहबत में
जीने को मन करता है !
चलते हैं कहीं दूर कि
दुनिया से डर लगता है !
हर शाम जब अँधेरे
छीनते हैं मेरा सुकून
तेरे साथ ऐ ज़िन्दगी
मर जाने को जी करता है !
अब के जो मिलना
संग कुछ दूर चलना
ढलती उमर में
तन्हाई से डर लगता है !
आस टूटी नहीं
तुझसे शिकवा भी है
ग़र तू साथ नहीं
फिर भ्रम क्यों देता है?
'शब' कहती थी कल
ऐ ज़िन्दगी तुझसे
छोड़ते नहीं हाथ
जब कोई पकड़ता है !
ऐ ज़िन्दगी
अब यहीं ठहर जा
तुझ संग जीने को
मन करता है !

- जेन्नी शबनम (16 अक्टूबर, 2011)

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