Monday, January 7, 2013

377. क्रान्ति-बीज बन जाना...

क्रान्ति-बीज बन जाना...

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रक्त-बीज से पनप कर 
कोमल पंखुड़ियों-सी खिलकर 
सूरज को मुट्ठी में भर लेना  
तुम क्रान्ति-बीज बन जाना !

नाजुक हथेलियों पर  
अंगारों की लपटें दहकाकर 
हिमालय को मन में भर लेना  
तुम क्रान्ति-बीज बन जाना ! 

कोमल काँधे पर  
काँटों की फसलें उगाकर 
फूलों को दामन में भर लेना 
तुम क्रान्ति-बीज बन जाना !

मन की सरहदों पर
संदेहों के बाड़ लगाकर
प्यार को सीने में भर लेना 
तुम क्रान्ति-बीज बन जाना !
  
जीवन पथ पर 
जब वार करे कोई अपना बनकर 
नश्तर बन पलटवार कर देना   
तुम क्रान्ति-बीज बन जाना !

अनुकम्पा की बात पर 
भिड़ जाना इस अपमान पर  
बन अभिमानी भले जीवन हार देना
तुम क्रान्ति-बीज बन जाना !   

सिर्फ अपने दम पर 
सपनों को पंख लगा कर 
हर हार को जीत में बदल देना 
तुम क्रान्ति-बीज बन जाना !

- जेन्नी शबनम (जनवरी 7, 2013)
[अपनी पुत्री 'परान्तिका' के 13 वें जन्मदिन पर]
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