बुधवार, 12 जनवरी 2011

203.संकल्प...

संकल्प...

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चलते-चलते
उस पुलिया पर चली गई
जहाँ से कई बार
गुज़र चुकी हूँ
और अभी-अभी पटरी पर से
एक रेल गुजरी है !

ठण्ड की ठिठुरती दोपहरी
कँपकँपी इतनी कि जिस्म ही नहीं
मन भी अलसाया-सा है,
तुम्हारा हाथ
अपने हाथ में लिए
मूँदी आँखों से
मैं तुम्हें देख रही हूँ !

तुमसे कहती हूँ -
मीत !
साथ-साथ चलोगे न
हर झंझावत में पास रहोगे न
जब भी थक जाऊँ
मुझे थाम लोगे न,
एक संकल्प तुम भी लो आज
मैं भी लेती हूँ
कोई सवाल न तुम करना
कोई ज़िद मैं भी न करुँगी,
तमाम उम्र यूँ ही
साथ-साथ चलेंगे
साथ-साथ जीएँगे !

तुम्हारी हथेली पर
अपनी हथेली रखे
करती रही मैं
तुम्हारे संकल्प-शब्द का इंतज़ार,
अचानक एक रेल
धड़धड़ाती हुई गुज़र गई,
मैं तुम्हारी हथेली
जोर से पकड़ ली,
तुम्हारे शब्द विलीन हो गए
मैं सुन न पायी
या तुमने ही
कोई संकल्प न लिया !

अचानक तुमने झिंझोड़ा मुझे
क्या कर रही हो?
यूँ रेल की पटरी के पास
कुछ हो जाता तो?

मैं हतप्रभ !
चारो तरफ़ सन्नाटा
सोचने लगी
किसे थामे थी?
किससे संकल्प ले रही थी?

रेल की आवाज़ भी
अब दूर जा चुकी,
मैं अकेली पुलिया की रेलिंग थामे
पता नहीं ज़िन्दगी जीने या खोने
जाने किस संकल्प की आस
कोई नहीं आस पास
न तुम
न मैं !

- जेन्नी शबनम (11. 1. 2011)

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