बुधवार, 30 मार्च 2011

226. क्रिकेट...

क्रिकेट...

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यहाँ हो रही पूजा, यज्ञ, और मान रहे मनौती
कहीं हो रही होगी दुआ, सज़दा, और माँग रहे मन्नत
अब क्या हो
खेल नहीं जैसे युद्ध हो
आज तो हो ही जाना चाहिए सार्वजनिक अवकाश
हमारे प्रधानमंत्री को भी चढ़ गया क्रिकेट का बुखार
हर छक्का पर एक बीयर बोतल
हर विकेट पर रम का एक बोतल
और ये लगा चौका
अब लगेगा छक्का
जीतना हो गया पक्का !

- जेन्नी शबनम (30 . 3 . 2011)
(हिन्दुस्तान-पाकिस्तान क्रिकेट मैच)

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सोमवार, 28 मार्च 2011

225. फ़ासला बना लिया...

फ़ासला बना लिया...

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खड़ी थी सागर किनारे
मगर लहरों ने डुबो दिया,
दरकिनार नहीं होती ज़िन्दगी
हर जतन करके देख लिया !

उड़ी थी तब आसमान में
जब सीने से तुमने लगाया,
जाने तब तुम कहाँ थे खोये
जब धड़कनों ने तुम्हें बसा लिया !

सबब जीने का मुझे मिला
मगर जुर्माना भी अदा किया,
मुनासिब है हर राज़ बना रहे
ख़ुद मैंने फ़ासला बना लिया !

बदल ही गई मन की फ़िज़ा
जाने ख़ुदा ने ये क्यों किया,
तुमपे न आये कभी कोई आँच
इश्क में मिटना मैंने सीख लिया !

एक नज़र देख लूँ आख़िरी ख़्वाहिश मेरी
बरस पड़ी आँखें जब हुई तुमसे जुदा,
तुम क्या जानो दिल मेरा कितना तड़पा
शायद हो अंतिम मिलन सोच दिल भी रो लिया !

बेकरारी बढ़ती रही मगर कदम को रुकना पड़ा
मालूम है कि न मिलेंगे पर इंतज़ार हर पल रहा,
तुम आओ कि न आओ यह तुम्हारा फ़ैसला
'शब' हुई बेवफा और होंठों को उसने सी लिया !

- जेन्नी शबनम (22 . 3 . 2011)

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रविवार, 27 मार्च 2011

224. ऐ ज़िन्दगी...

ऐ ज़िन्दगी...

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तल्ख़ धूप कितना जलाएगी
अब तो बीत जाए, दिन बुरा,
रहम कर हम पर, ऐ ज़िन्दगी !

बाबस्ता नहीं कोई
दर्द बाँटें, किससे बता,
चुप हो जी ले, ऐ ज़िन्दगी !

दिन के उजाले में स्वप्न पले
ढल गई शाम, अब करें क्या,
किसका रस्ता देखें, ऐ ज़िन्दगी !

वो कहते हैं समंदर में प्यासे रह गए
नदी की तरफ, वो चले ही कब भला,
गिला किससे शिकवा क्यों, ऐ ज़िन्दगी !

न मिज़ाज पूछते न कहते अपनी,
समझें कैसे, उनकी मोहब्बत बता,
तू भी हँस ले, ऐ ज़िन्दगी !

- जेन्नी शबनम (21. 3. 2011)

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शुक्रवार, 25 मार्च 2011

223. प्रवासी मन (प्रथम हाइकु लेखन, 11 हाइकु)

प्रवासी मन
(प्रथम हाइकु लेखन, 11 हाइकु)

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1.
कठिन बड़ा
पर होता है जीना
पूर्ण जीवन !

2.
कुछ ख्वाहिशें
फलीभूत न होती
सदियाँ बीती !

3.
मन तड़पा
भरमाये है जिया
मैं निरुपाय !

4.
पाँव है ज़ख़्मी
राह में फैले काँटे
मैं जाऊँ कहाँ !

5.
प्रेम-बगिया
ये उजड़नी ही थी
सींच न पायी !

6.
दंभ जो टूटा
फिर उल्लास कैसा
विक्षिप्त मन !

7.
मन चहका
घर आए सजन
बावरा मन !

8.
महा-प्रलय
ढह गया अस्तित्व
लीला जीवन !

9.
विनाश होता
चहुँ ओर आतंक
प्रकृति रोती !

10.
लौटता कहाँ
मेरा प्रवासी मन
न कोई घर !

11.
अज़ब भ्रम
कैसे समझे कोई
कौन अपना !

- जेन्नी शबनम (24. 3. 2011)

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शुक्रवार, 18 मार्च 2011

222. आदम और हव्वा...

आदम और हव्वा...

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कुदरत की कारस्तानी है
मर्द-औरत की कहानी है,
फल खाकर आदम-हव्वा ने
की गज़ब नादानी है !

चालाकी कुदरत की या
आदम हव्वा की मेहरबानी है,
बस गई छोटी सी दुनिया जैसे
अंतरिक्ष में चूहेदानी है !

कुदरत ने बसाया ये संसार
जिसमें आदम है हव्वा है,
उन्होंने खाया एक सेब मगर
संतरे-सी छोटी ये दुनिया है !

सोचती हूँ
काश...
एक दो और
आदम-हव्वा आए होते,
आदम-हव्वा ने
बस दो फल तो खाए होते,
दुनिया थोड़ी तो बड़ी होती
गहमा गहमी और बढ़ जाती !

दुनिया दोगुनी लोग दोगुने होते
हर घर में एक ही जगह पर दो आदमी होते,
न कोई अकेला उदास होता
न कोई अनाथ होता,
न कहीं तन्हाई होती
न तन्हा मन कोई रोता !

न सुनसान इलाका होता
हर तरफ इक रौनक होती,
कहीं आदम के ठहाके तो
कहीं चूड़ी की खनक होती !

हर जगह आदम जात होती
जवानों का मदमस्त जमघट होता,
कहीं बच्चों की चहचहाती जमात होती
कहीं बुजुर्गों की ख़ुशहाल टोली होती,
कहीं श्मशान पर शवों का रंगीन कारवाँ होता
क्या न होता और क्या-क्या होता !

सोचो ज़रा ये भी तुम
होता नहीं कोई गुमसुम,
मृत्यु पर भी लोग ग़मगीन न होते
गीत मौत का पुरलय होता,
जीवन-मृत्यु दोनों ही जश्न होता
वहाँ (स्वर्गलोक) के अकेलेपन का भय न होता,
कहीं कोई बिनब्याहा बेसहारा न होता
कहीं कोई निर्वंश बेचारा न होता,
एक नहीं दो डॉक्टर आते
कोई एक अगर बीमार होता !

क्या रंगीन फ़िज़ा होती
क्या हसीन समा होता,
हर जगह काफ़िला होता
हर तरफ त्योहार होता !

सोचती हूँ
काश !
एक और आदम होता
एक और हव्वा होती,
उन्होंने एक और फल खाया होता
दुनिया तरबूज सी बड़ी होती,
सूरज से न डरी होती
तरबूज सी बड़ी होती !

- जेन्नी शबनम (16. 3. 2011)
(होली के अवसर पर)
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बुधवार, 16 मार्च 2011

221. ये कैसी निशानी है...

ये कैसी निशानी है...

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उम्र की स्लेट पर
वक़्त ने कुछ लकीरें खींच दी है
सारे हर्फ़ उलट पलट हैं,
जैसा कि उस दिन हुआ था
जब हाथ में पहली बार
चॉक पकड़ी थी
और स्लेट पर
यूँ ही कुछ लकीरें बना दी थी
जिसका कोई अर्थ नहीं !
लेकिन हाथ में पकड़े चॉक ने
बड़े होने का एहसास कराया था
और सभी के चेहरे पर
खुशियों की लहर दौड़ गई थी !
उस स्लेट को उसी तरह
संभाल कर रख दिया गया
एक यादगार की तरह
जो मेरी और
मेरे उस वक़्त की निशानी है !
बालमन ने उस लकीर में
जाने क्या लिखा था
नहीं पता,
वो टेढ़ी मेढ़ी लकीरें
यथावत पड़ी हैं
आज भी समझ नहीं पाती कि
क्या लिखना चाह रही होऊँगी !
वक़्त की लकीर तो
रहस्य है
कैसे समझूँ ?
क्या लिखना है वक़्त को
क्या कहना है वक़्त को !
स्लेट की निशानी
सिर्फ मुझे ही
क्यों दिख रही?
घबराकर पूछती हूँ -
ये कैसी निशानी है
जिसे बचपन में मैंने लिख दी
और आज वक़्त ने लिख दी !
शायद मेरे लिए
जीवन का कोई सन्देश है
या वक़्त ने इशारा किया कि
अब बस...!

- जेन्नी शबनम (14. 3. 2011)

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रविवार, 13 मार्च 2011

220. कब उजास होता है...

कब उजास होता है...

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जाने कौन है जो आस पास होता है
दर्द यूँ ही तो नहीं ख़ास होता है !

बहकते क़दमों को भला रोकें कैसे
हर तरफ उनका एहसास होता है !

वो समझते नहीं है दिल की सदा
ज़ख़्म दिखाना भी परिहास होता है !

वक़्त की जादूगरी भी क्या खूब है
हँस-हँस कर जीवन उदास होता है !

ज़िन्दगी बसर कैसे हो भला उनकी
जिनके दिल में इश्क का वास होता है !

गैरों के बदन को बेलिबास कर जाए
उनके मन पर कब लिबास होता है !

'शब' सोचती है कल मिलेंगे उजाले से
तकदीर में कब उसके उजास होता है !

- जेन्नी शबनम (11. 3. 2011)

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शुक्रवार, 11 मार्च 2011

219. चलते रहें हम...

चलते रहें हम...

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दूर आसमान के पार तक
या धरती के अंतिम छोर तक
हाथ थामे चलते रहें हम !
आओ कोई गीत गायें
प्रेम की बात करें
चलो यूँ ही चलते रहें हम !
तुम्हारी बाहों का सहारा
आँखें मूँद खो जाएँ
साथ चले स्वप्न चलते रहें हम !
'शब' तो जागती है रोज़
साथ जागो तुम भी कभी
और बस
चलते रहें हम !

- जेन्नी शबनम (10. 3. 2011)

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गुरुवार, 10 मार्च 2011

218. तुम शामिल हो...

तुम शामिल हो...

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तुम शामिल हो
मेरी ज़िन्दगी की
कविता में...

कभी बयार बनकर
जो कल रात चुपके से घुस आई
झरोखे से
और मेरे बदन से लिपटी रही
शब भर!

कभी ठंड की गुनगुनी धूप बनकर
जो मेरी देहरी पर
मेरी बतकही सुनते हुए
मेरे साथ बैठ जाती है अलसाई सी
दिन भर!

कभी फूलों की ख़ुशबू बनकर
जो उस रात
तुम्हारे आलिंगन से मुझमें समा गई
और रहेगी
उम्र भर!

कभी जल बनकर
जो उस दिन
तुमसे विदा होने के बाद
मेरी आँखों से बहता रहा
आँसू बनकर !

कभी अग्नि बनकर
जो उस रात दहक रही थी
और मैं पिघल कर
तुम्हारे साँचे में ढल रही थी
और तुम इन सबसे अनभिज्ञ
महज़ कर्त्तव्य निभा रहे थे !

कभी साँस बनकर
जो मेरी हर थकान के बाद भी
मुझे जीवित रखती है
और मैं फिर से
उमंग से भर जाती हूँ !

कभी आकाश बनकर
जहाँ तुम्हारी बाहें पकड़
मैं असीम में उड़ जाती हूँ
और आकाश की ऊँचाइयाँ
मुझमें उतर जाती है !

कभी धरा बनकर
जिसकी गोद में
निर्भय सो जाती हूँ,
इस कामना के साथ कि
अंतिम क्षणों तक
यूँ ही आँखें मूँदी रहूँ,
तुम मेरे बालों को सहलाते रहो
और मैं सदा केलिए सो जाऊँ !

कभी सपना बनकर
जो हर रात मैं देखती हूँ,
तुम हौले से मेरी हथेली थाम
कहते हो -
''मुझे छोड़ तो न दोगी ?''
और मैं चुपचाप
तुम्हारे सीने पे सिर रख देती हूँ !

कभी भय बनकर
जो हमेशा मेरे मन में पलता है,
और पूछती हूँ -
''मुझे छोड़ तो न दोगे ?''
जानती हूँ तुम न छोड़ोगे
एक दिन मैं ही चली जाऊँगी
तुमसे बहुत दूर
जहाँ से वापस नहीं होता है कोई !

तुम शामिल हो मेरे सफ़र के
हर लम्हों में
मेरे हमसफ़र बनकर
कभी मुझमें मैं बनकर
कभी मेरी कविता बनकर !

- जेन्नी शबनम (5. 3. 2011)

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मंगलवार, 8 मार्च 2011

217. आज़ादी चाहती हूँ बदला नहीं...

आज़ादी चाहती हूँ बदला नहीं...

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तुम कहते हो
अपनी कैद से आज़ाद हो जाओ,
बँधे हाथ मेरे
सींखचे कैसे तोडूँ ?
जानती हूँ उनके साथ
मुझमें भी जंग लग रहा है,
पर अपनी तमाम कोशिशों के बावज़ूद
एक हाथ भी आज़ाद नहीं करा पाती हूँ !

कहते ही रहते हो तुम
अपनी हाथों से
काट क्यों नहीं देते मेरी जंज़ीर,
शायद डरते हो
बेड़ियों ने मेरे हाथ
मज़बूत न कर दिए हों,
या फिर कहीं तुम्हारी अधीनता
अस्वीकार न कर दूँ,
या फिर कहीं ऐसा न हो
मैं बचाव में अपने हाथ
तुम्हारे खिलाफ़ उठा लूँ !

मेरे साथी,
डरो नहीं तुम
मैं महज़ आज़ादी चाहती हूँ बदला नहीं,
किस-किस से लूँगी बदला
सभी तो मेरे ही अंश हैं,
मेरे ही द्वरा सृजित
मेरे ही अपने अंग हैं,
तुम बस मेरा एक हाथ खोल दो
दूसरा मैं ख़ुद छुड़ा लूँगी,
अपनी बेड़ियों का बदला
नहीं चाहती
मैं भी तुम्हारी तरह
आज़ाद जीना चाहती हूँ !

तुम मेरा एक हाथ भी छुड़ा नहीं सकते
तो फिर आज़ादी की बातें
क्यों करते हो ?
कोई आश्वासन न दो
न सहानुभूति दिखाओ,
आज़ादी की बात दोहरा कर
प्रगतिशील होने का ढ़ोंग करते हो,
अपनी खोखली बातों के साथ
मुझसे सिर्फ छल करते हो,
इस भ्रम में न रहो कि
मैं तुम्हें नहीं जानती हूँ,
तुम्हारा मुखौटा
मैं भी पहचानती हूँ !

मैं इंतज़ार करुँगी उस हाथ का जो
मेरा एक हाथ आज़ाद करा दे,
इंतज़ार करुँगी उस मन का जो
मुझे मेरी विवशता बताए बिना
मेरे साथ चले,
इंतज़ार करुँगी उस वक़्त का
जब जंज़ीर कमज़ोर पड़े और
मैं अकेली उसे तोड़ दूँ !

जानती हूँ कई युग और लगेंगे
थकी हूँ पर हारी नहीं,
तुम जैसों के आगे
विनती करने से अच्छा है
मैं वक़्त और उस हाथ का
इंतज़ार करूँ !

- जेन्नी शबनम  (8. 3. 2011)
(अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस पर)

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रविवार, 6 मार्च 2011

216. क्यों होती है आहत...

क्यों होती है आहत...

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लपलपाती जुबां ने
जाने क्या कहा
थर्रा उठी वो बीच सड़क,
गुज़र गए कई लोग
बगल से मुस्कुराकर,
यूँ जैसे देख लिया हो
किसी नव यौवना का नंगा बदन
और फुरफुरी सी
दौड़ गई हो बदन में !

झुक गए सिर
ख़ामोशी से उसके,
फिर आसमान में
ताका उसने,
सुना है कि वो आसमान में रहता है
क्यों नहीं दिखता उसे?
ऐसी रोज़ की शर्मिंदगी से
क्यों नहीं बचाता उसे?
करती तो है रोज़ सज़दा
क्यों नहीं सुनता उसे?

आँखों में पाशविकता
जुबां में बेहयाई
क्या हैं वो सभी
चेतना मर चुकी है उनकी,
सोचती है वो
क्यों होती है आहत
उनके कहे पर
जो महज़ लाश हैं!

- जेन्नी शबनम (8. 3. 2010)
(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर)

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शनिवार, 5 मार्च 2011

215. और कर ली पूरी मुराद...

और कर ली पूरी मुराद...

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वक़्त से माँग लायी
अपने लिए
कुछ चोरी के लम्हात,
मन किया जी लूँ
ज़रा बेफ़िक्र
पा लूँ कुछ
अनोखे एहसास !

कम नहीं होता
किसी का साथ
प्यारी बातें
एक खुशनुमा शाम,
जो बन जाए
तमाम उम्र केलिए
एक हसीन याद !

हाथों में हाथ और
तीन क़दमों में
नाप ली दुनिया हमने,
और कर ली पूरी
मुराद !

जानती हूँ
यह कोई नयी बात नहीं
न होती है परखने की बात,
पर पहली बार
दुनिया ने नहीं
मैंने परखा है दुनिया को !

अपनी आँखों से
देखी थी
पर आज देखी
किसी और की नज़रों से
अपनी ज़िन्दगी !

पहले भी क्या ऐसी ही थी दुनिया ?
फूल तो खिले होते थे
पहले भी,
पर मुरझाए ही
मैं क्यों बटोरती थी ?

क्या ये गैर वाज़िब था?
कैसे मानूँ?
कह कर तो लाई थी वक़्त को,
परवाह क्यों?
जब वक़्त को
रंज नहीं !

- जेन्नी शबनम (27. 02. 2011)

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