सोमवार, 27 अप्रैल 2020

659. निपटाया जाएगा

निपटाया जाएगा  

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विरोध के स्वर को कुछ यूँ दबाया जाएगा  
होश में जो हो उसे पागल बताया जाएगा !  

काट छाँट कर बाँट-बाँट कर यह संसार चलेगा  
रोटी और बेटी का मसला यूँ निपटाया जाएगा !  

क्रूरता और पाश्विकता कई खेमों में बँटे  
चौक चौराहों पर टँगा जिस्म दिखाया जाएगा !  

हदों की परवाह किसे बेहद से हम सब गुज़रे  
मुट्ठियों का इंक्लाब अब बेदम कराया जाएगा !  

नहीं परवाह सबको ज़माने के बदख्याली की  
नफ़रतों में अमन का पौधा खिलाया जाएगा !  

बाट जोहकर समय जब हथेलियों से फिसल जाएगा  
बद्दुआएँ 'शब' को देकर फिर ख़ूब पछताया जाएगा ! 

- जेन्नी शबनम (27. 4. 2020) 

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रविवार, 26 अप्रैल 2020

658. झरोखा

झरोखा

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समय का यह दौर   
जीवन की अहमियत, जीवन की ज़रुरत सिखा रहा है,   
मुश्किल के इस रंगमहल में   
आशाओं का एक झरोखा, जिसे पत्थर का महल बनाने में   
सदियों पहले बंद किया था हमने   
अब खोलने का वक़्त आ गया है,   
ताकि एक बार फिर लौट सके, सपनों का सुन्दर संसार   
सूरज की किरणों की बौछार   
बारिश की बूंदों की फुहार,   
हो सके चाँदनी की आवाजाही   
आ सके हवाएँ झूमती-नाचती-गाती,   
हम ताक सकें आसमान में चाँद-तारों की बैठक   
आकृतियाँ गढ़ती बादलों की जमात   
पक्षियों का कलरव   
रास्ते से गुजरता इंसानी रेला   
हमारी ज़रूरतों के सामानों का ठेला,   
हम सुन सकें हवाओं का नशीला राग   
बादलों की गड़गड़ाहट   
धूल मिट्टी की थाप   
प्रार्थना की गुहार   
पड़ोसी की पुकार   
रँभाते मवेशियों की तान   
गोधूलि में पशुओं के खुरों और घंटियों की धुन,   
हम मिला सकें कोयल के साथ कूउउ-कूउउ   
हम चिढ़ा सके कौओं को काँव-काँव,   
हम कर सकें कोई ऐसी चित्रकारी   
जिसमें खूबसूरत नीला आसमान, गेरुआ रंग धारण कर लेता है   
पौधों की हरियाली में रंग-बिरंगे फूल खिलते हैं   
कोई बच्चा लाड़ दुलार से माँ की गोद में जा सिमटता है,   
हम बसा सकें सपनों के बड़े-बड़े चौबारे पर   
कोई अचम्भित करने वाली कामनाएँ,   
ओह! कितना कुछ था जिसे खोया है हमने   
मन के झरोखों को बंदकर   
कृत्रिमता से लिपटकर   
पत्थर के आशियाने में सिमटकर, 
अब समझ आ गया है   
जीवन की क्षणभंगुरता, कायनात की शिक्षा,   
खोल ही दो सबको   
आने दो झरोखे से वह सब   
जिसे हमने ख़ुद ही गँवाया था,   
खोल दो झरोखा।   

- जेन्नी शबनम (26. 4. 2020) 
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सोमवार, 20 अप्रैल 2020

657. 10 क्षणिकाएँ

1. 
सच  
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न कोई कल था  
न कोई आज है  
जो पाया, सब खोया  
जीवन का यही सच है।  
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2. 
हुनर  
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छोटी-छोटी डिब्बियों में भर कर  
सीलबंद कर दिए मैंने अपने सारे हुनर  
यूँ इसके पहले भी बेशऊर कहलाती थी  
पर अब संतोष है  
मेरा सारा हुनर ओझल है सबसे  
अब उसका अपमान नहीं होता।  
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3. 
संवेदना  
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संवेदनाओं को  
ज़मीन नहीं मिलती  
आकाश चाहिए नहीं  
फिर क्या?  
यूँ ही घुट-घुटकर मर जाए !  
जल सूखता जाता है, नदी उतरती है  
संवेदनशून्यता यूँ ही तो बढ़ती है।  
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4. 
काश !  
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ढ़ेरों काश इकठ्ठा हो गए हैं  
पर मन है कि ठहरता नहीं  
काश! यह किया होता, काश! वह कर पाते  
इकत्रित काश के साथ, भविष्य के और काश न जुड़े  
मन को समझना होगा  
मन को रुकना होगा या मरना होगा  
या फिर सन्यस्त होना होगा।  
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5. 
नींद  
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दिल को जलाया है  
दिल मेरा खाली है  
कोई नहीं जो सुकून दे  
मेरी तल्खियों को नींद दे  
आ जाओ ऐ फरिश्ते  
दिल में एक ख्वाब उगा दो  
रूह को जरा सा चैन दे दो  
आज बस सुला दो।  
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6. 
करवट  
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यादों के बिस्तर पर करवट ही करवट है  
हर करवट में टूटते दिल की सलवट है  
सलवटें तो मिट जाएँगी  
करवटें नींद में समा जाएगी  
पर यादें?  
कितने फूल कितने शूल  
हँसता दिल जख्मी सीना  
क्या ये यादों से दूर जा पाएँगे?  
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7. 
शर्त  
***  

बेशर्त ज़िन्दगी चलती नहीं  
शर्तें मन को फबती नहीं  
इसी उधेड़बुन में ठहरी रही  
करूँ तो अब मैं क्या करूँ  
शर्तें मानूँ या ज़िन्दगी मिटा लूँ  
अपनी बचाऊँ कि साँसें सँभालूँ।  
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8. 
भूल जाते हैं  
***  

चलो आज सारी रात जागते हैं  
आधा आसमान तुम्हारा आधा मेरा  
तुम तारे गिनो  
हम आधे आसमान में  
चाँद को सजाते हैं  
दिन भी निकलेगा भूल जाते हैं।  
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9. 
मुबारक  
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अँधेरों का सैलाब बढ़ता जा रहा है  
रोशनी का एक तिनका भी नहीं, सब डूब रहा है  
हाथ थामने को कुछ नहीं सूझ रहा है  
सूरज ने अँधेरों को थामने से मना कर दिया है  
वह रोशनी भेजने को तैयार नहीं है  
मेरे लिए कुछ भी न इस पार है न उस पार है  
उसने कहा - तुम्हें अँधेरे पसंद थे न  
लो, तुम्हें अँधेरे मुबारक।  
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10. 
मेरा घर  
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रात के सीने में  
हजारों चमकते कोने हैं  
पर वहाँ एक महफूज़ कोना भी है  
जहाँ सबका प्रवेश वर्जित है  
वहाँ अँधेरा ही अँधेरा है  
बस वहीं, घर मेरा है।  
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- जेन्नी शबनम (20. 4. 2020)  
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गुरुवार, 9 अप्रैल 2020

656. फूल यूँ खिले (10 हाइकु)

फूल यूँ खिले 
(10 हाइकु) 

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1.  
फूल यूँ खिले,  
गलबहियाँ डाले  
बैठे हों बच्चे !  

2.  
अम्बर रोया,  
ज्यों बच्चे से छिना  
प्यारा खिलौना !  

3.  
सूरज ने की  
किरणों की बिदाई  
शाम जो आई !  

4.  
फसलें हँसी,  
ज्यों धरा ने पहना  
ढ़ेरों गहना !  

5.  
नाम तुम्हारा  
मन की रेत पर  
गहरा लिखा !  

6.  
देख गगन  
चिहुँकती है धरा  
हो कोई सगा !  

7.  
रूठा है सूर्य  
कैकेयी-सा, जा बैठा  
कोप-भवन !  

8.  
मन झरना  
कल-कल बहता  
पा के अपना !  

9.  
मिश्री-सी बोली  
बहुत ही मँहगी,  
ताले में बंद !  

10.  
चुभता रहा  
खुरदरा-सा रिश्ता  
फिर भी जिया !  

- जेन्नी शबनम (27. 1. 2020)  
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बुधवार, 8 अप्रैल 2020

655. 10 क्षणिकाएँ

10 क्षणिकाएँ 

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1. 
परत
***  
मेरे मौसम में अब कोई नहीं  
न मेरे मिजाज में कोई शामिल है  
मेरे मन पर जो एक नरम परत लिपटा था  
समय की ताप से पककर  
वह अब लोहे का हो गया है।  
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2.
यारी
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फूल तो सबको प्रिय, मैंने काँटों से यारी की  
इस यारी में लाचारी थी, मेरी नहीं मनमानी थी  
नसीब का लेखा जोखा है, सब कुदरत का धोखा है  
यह किस्मत की साज़िश है, नहीं कोई गुंजाइश है  
काँटों की कलम से चाक-चाक, सीना मेरा छलनी है  
दर्द भले पुराना है, लेकिन मेरी कथा बहुत नयी है।  
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3.  
ज़ख्म  
***  
काँटों ने चुभाकर, जब भी ज़ख्म दिए  
एक संतोष-सा मन में ठहर गया  
काँटों ने जख्म दिए हैं, तन छलनी हुआ तो क्या हुआ  
गर फूलों ने जख्म दिया होता, तो मन छलनी होता  
घाव तो भर जाएँगे  
मन तो साबुत रहेगा।
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4.  
पुल  
***  
ढेरों इल्जामों की तरह एक और  
ढेरों कटु वचनों की तरह एक और  
फ़र्क नहीं पड़ता अब दुर्भावनाओं से  
न ही असर होता है, इल्जामों की इन गिनतियों से  
वह जो एक पुल था, हमारे दरम्यान  
उसे वक्त ने ढ़हा दिया है।  
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5.  
चेहरा  
***  
चेहरे तो कई ओढ़े कई उतारे  
कब कौन पहना अब याद नहीं  
सबसे सच्चा वाला चेहरा  
जो गुम हो चुका है, इन चेहरों की भीड़ में  
अब कभी नहीं पहन पाऊँगी  
पर एक टीस तो उठेगी  
जब-जब आईना निहारूँगी।  
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6.  
बेजान सड़क  
***  
बेजान सड़क में जैसे जान आ जाती है
और मेरे पाँव में पहिया पहना देती है
फिर मुझे पहुँचा आती है वहाँ-वहाँ
जहाँ भीड़ में मैं अक्सर गुम हो जाती हूँ
फिर कोई अनजाना हाथ मुझे थाम लेता है
मगर कुछ कदम के फ़ासले पर चलता है
सड़क को सब पता है
कहाँ मेरा सुकून है, कहाँ मेरी मंज़िल
और कहाँ थामने वाले हाथ।  
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7.  
समय चक्र  
***  
समय चक्र और जीवन चक्र  
दोनों घूम रहे हैं  
उन्हें रोकने की कोशिशों में  
मेरे दोनों हाथ छिल चुके हैं  
मैं उन्हें न रोक पाई न साथ चल पाई  
सदा नाकाम रही  
उसी तरह जिस तरह  
खुद को अपने साथ रखने में नाकाम होती हूँ  
मुझे खुद नहीं पता कि मैं कहाँ होती हूँ।
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8.  
तस्वीर  
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काश कि अतीत विस्मृत हो जाए  
ज़ेहन में तस्वीर कुछ ताज़ी आ जाए  
दर्द की ढ़ेरों तहरीर और रिसते ज़ख़्मों के धब्बे हैं  
रिश्तों की ग़ुलामी और अनजीए पहलू की सरगोशी है  
सब बिसरा कर नई तस्वीर बसाना चाहती हूँ  
कुछ नए फूल खिलाना चाहती हूँ  
एक नई ज़िन्दगी जीना चाहती हूँ।  
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9.  
जुर्रत  
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लुंज पुंज से वक्त में, जिंदगी की अफरा तफरी में
इश्क करने की मोहलत मिल गई
समय संजीदा हुआ, पूछा - ऐसी जुर्रत क्यों की?
अब इसका क्या जवाब
जुर्रत तो हो गई
अब हो गई तो हो गई।  
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10.
दवा-दुआ  
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उम्र के इस दौर में, तन्हाइयों के इस ठौर में  
न दवा काम आती है न दुआ काम आती है  
बस किसी अपने की यादें साथ रह जाती हैं  
यूँ सच है खोखले रिश्तों के बेजान शहर में  
कौन किसके वास्ते दुआ करे, करे तो क्यों करे  
कोई किसी को अपना मान ले  
आख़िरी पलों में बस इतना ही काफी है।  
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- जेन्नी शबनम (8. 4. 2020)  

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रविवार, 5 अप्रैल 2020

654. मन का दीया (दीया पर 5 हाइकु)

मन का दीया  
(दीया पर 5 हाइकु)

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1.  
आस्था का दीया  
बुझने मत देना  
ख़ुद के प्रति !  

2. 
देता सन्देश  
जल-जल के दीया -  
रोशनी देना !  

3.  
मन का दीया  
जल ही नहीं पाता  
किसी आग से !  

4.  
नन्हा दीपक  
बिन थके जलता  
हिम्मत देता !  

5.  
दीपक जला  
मन खिलखिलाया  
उजास फैला !  

- जेन्नी शबनम (5. 4. 2020)

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शनिवार, 4 अप्रैल 2020

653. शाम

शाम  

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ऐसी कोई शाम हो  
जब थका हारा जीवन  
अपने अंत पर हो  
एक बड़ा चमत्कार हो जाए  
ढ़लता सूरज सब जान जाए  
भेज दे वो अपने रथ से थोड़ा सुकून
और हर ले उदासी  
भले ही वह पल शाम हो  
पर जीवन की सुबह बन जाए  
शाम से रात तक  
जीवन को अर्थ मिल जाए  
काश ऐसी कोई शाम हो  
ढ़लता सूरज देवता बन जाए।

- जेन्नी शबनम (4. 4. 2020)  

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