Thursday, March 21, 2013

393. यह कविता है...

यह कविता है...

******* 

मन की अनुभूति   
ज़रा-ज़रा जमती 
ज़रा-ज़रा उगती
ज़रा-ज़रा सिमटती  
ज़रा-ज़रा बिखरती  
मन की परछाईं बन
एक रूप है धरती
मन के व्याकरण से 
मन की स्लेट पर 
मन की खल्ली से 
जोड़-जोड़ कर 
कुछ हर्फ़ है गढ़ती,
नहीं मालूम
इस अभिव्यक्ति की भाषा 
नहीं मालूम 
इसकी परिभाषा; 
सुना है
यह कविता है ! 

(विश्व कविता दिवस पर)
- जेन्नी शबनम (21. 3. 2013)


_____________________________