गुरुवार, 28 अक्तूबर 2010

184. पहला और आख़िरी वरदान...

पहला और आख़िरी वरदान...

*******

वो हठी ये क्या कर गया
विष माँगी मैं
वो अमृत चखा गया
एक बूंद अमृत
हलक में उतार गया
आह !
ये कैसा ज़ुल्म कर गया !

उस दिन कहा था वो
वक़्त को ललकारा तुमने
मृत्यु माँगी असमय तुमने
इसलिए है ये शाप -
सदा जीवित तुम रहो अब
अमरता का है वरदान तुमको !

अब तो निर्भय जीवन
अविराम चलायमान जीवन
जीवित रहना है
जाने कितनी सदी और
कभी नहीं होगी मृत्यु
कभी नहीं होगी मुक्ति
तड़प-तड़प कर जीना
शायद तब तक
जब तक नष्ट न हो
समस्त कायनात !

लाख़ करूँ प्रार्थना
नहीं होता कोई तोड़
चख भी लो जो अमृत
मुमकिन नहीं
होना कभी मृत !

खौफ़ बढ़ता जा रहा
ये मैंने क्या कर लिया ?
क्यों उसके छल में आ गई ?
क्यों चख लिया अमृत ?
क्यों माँगा था विष ?
क्यों वक़्त से पहले मृत्यु चाही ?
क्यों क्यों क्यों ???

जानती थी कि वो देवदूत है
दे रहा मुझे पहला और
आख़िरी वरदान है,
फिर क्यों अपने लिए
ज़िन्दगी नहीं
मैंने मौत माँग ली !

माँगना था तो
प्रेमपूर्ण दुनिया माँगती,
जबतक जियूँ
बेफिक्र जियूँ,
सभी अपनों का प्रेम पाऊँ
कहीं कोई दुखी न हो
सर्वत्र सुख हो
आनंद हो !

चूक मेरी
भूल मेरी,
ज़िन्दगी नहीं मौत की
चाह की,
अब मौत नहीं बस
जीना है,
कोई न होगा मेरा
सब चले जाएँगे,
मैं कभी
शाप मुक्त न हूँगी,
न शाप मुक्त करने वाला
कोई होगा !

- जेन्नी शबनम (28. 10. 2010)

_______________________________________